Tuesday, October 27, 2026

उर्दू बहर पर एक बातचीत :क़िस्त 147: रुबाई बनाम क़ताअ’ बनाम मुक्तक [ भाग 02]

उर्दू बहर पर एक बातचीत :क़िस्त 147: : रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [भाग -02]


पिछली क़िस्त में , रुबाई क्या है - इसकी विशेषता क्या है- पर चर्चा की थी। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज क़ता पर चर्चा करेंगे।

क़ता क्या है - ,इसकी विशेषता क्या है -आदि पर प्रकाश डालने की एक कोशिश करेंगे ।

सामान्यतया क़ता भी चार लाइन की रुबाई की ही तरह  एक रचना है जो अपना स्वत्नन्त इकाई की हैसियत रखता है। क़ता’का लगवी [शब्दकोशीय] अर्थ टुकड़ा, कटा हुआ, होता है यानी ग़ज़ल के अंश का एक असंबद्ध  टुकड़ा जो ग़ज़ल के भाव भूमि से अलग हो , कटा हुआ हो।

लेकिन रुबाई और क़ता में थोड़ा फ़र्क है-

- रुबाई के लिए ख़ास वज़न बह्र मुकर्रर है जब कि क़ता के लिए ऐसी कोई बंदिश नहीं । क़ता ग़ज़ल के किसी भी बह्र में कही जा सकती है।

-रुबाई में पहली ,दूसरी और चौथी लाइन हम क़ाफ़िया होती है। यह एक लाज़िमी शर्त है । मगर क़ता में दो स्थित होती है

--[1] किसी किसी क़ता में भी पहली दूसरी और चौथी लाइन [रुबाई की तरह] हमक़ाफ़िया होती है । इस स्थित में फिर वह शे’र का मतला और एक शे’र हो जाता हओ

   जिसे कुछ शायर मुशायरे में अपनी ग़ज़ल के पहले यह कह कर सुनाते हैं--हज़रात एक मतला एक शे’र पेश कर रहा हूँ--

या फिर 

--[2] किसी किसी  क़ता में दूसरी और चौथी लाइन ही हम क़ाफ़िया होती है।

 -बाक़ी जहाँ तक भाव ख़याल और बुलंदी का सवाल है वह बिलकुल रुबाई की  तरह ही होता है।

--[3] एक स्थिति यह भी होती है कि ग़ज़ल कहते हुए कोई भाव एक शे’र में न आ सका तो मजबूर् उसे चार या उससे अधिक मिसरों में बाँधा जा सकता है 

      और भाव को पूर प्रगट करने वाले ऐसे अश’आर क़ता लिख कर ग़ज़ल के साथ ही लिखते पढ़ते है, जिनका अपना अलग मगर कटा हुआ स्वयं में एक अस्तित्व होता है।

  ज़ाहिर है कि ऐसे कता’त [ क़ता का बहुवचन] कही जा रही ग़ज़ल के बह्र और वज़न के अनुरूप ही होंगे। 

---क़ताअ’ 4- लाइनों का ही यह ज़रूरी नहीं है। कुछ क़ताअ’ 10-12 लाइनों का या उससे भी जियादा का भी हो सकता है।

अब कुछ उदाहरणों के साथ इन को देखते हैं--

[1] क़ता जिसमें पहली दूसरी और चौथी लाइन हम क़ाफ़िया होती है--


वक़्फ़-ए-हिर्मान-ओ-आस रहता है 

दिल है अकसर उदास रहता है

तुम जो ग़म दे के भूल जाते हो

मुझको एहसां का  पास रहता है ।

             -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-

 इसमे पहली दूसरी और चौथी लाइन का --आस--उदास--पास-- हमक़ाफ़िया और बह्र 2122--1212--22 का [ यह रुबाई की बह्र नहीं है]


इक मौज़ मचल जाए तो तूफ़ाँ बन जाए

इक फूल अगर चाहे गुलिस्तां  बन जाए

इक ख़ून के क़तरे में है तासीर  इतनी

इक क़ौम की तारीख़ का उन्वां बन जाए ।

अब्दुल हमीद ’अदम’-

इसमे पहली दूसरी और चौथी लाइन का --तूफ़ां--गुलिस्तां--उन्वां --हम क़फ़िया और बह्र रुबाई की बह्र नहीं है।

[2] क़ता जिसमें  दूसरी और चौथी लाइन हम क़ाफ़िया होती है--


ज़िंदगी की तवील राहों में

मुतकलन पेचो-ख़म नहीं होंगे

एक ऐसा भी वक़्त आएगा 

जब ए दैर-0 हरम नहीं होंगे।

- नरेश कुमार शाद-

इसमे पहली  और चौथी लाइन का -- ख़म -हरम हम क़ाफ़िया है और इस रचना की बह्र --रुबाई की बह्र नहीं है।

[3} ग़ज़ल के रंग से असंबद्ध भाव --जिसमे क़ता लिखा गया---

ग़ालिब की एक ग़ज़ल है-

दिले-नादाँ तुझे हुआ क्या है 

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।


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   क़ता’अ

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौज़ूद

फिर ये हंगामा, ऎ ख़ुदा ! क्या है ।


ये परी लोग चेहरा कैसे हैं

ग़म्ज़ा-0-इश्वा-0-अदा क्या है 


शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरी क्यों है

निगह-ए-चश्म-ए-सुर्मा सा क्या है

[ 2-3 शे’र और ---]

मतलब क़ताअ’ सिर्फ़ 4- लाइनों का ही नहीं --चार से भी जियादा लाइनों का भी हो सकता है

। चूँकि यह ग़ज़ल के बीच में कताअ" है अत: लाजिमन इसकी बह्र वही है जो ग़ज़ल की है यानी

2122---1212---22


[ब] कोई ज़रूरी नहीं कि कताअ’ ग़ज़ल के बीच में ही हो। स्वतन्त्र रूप से भी कताअ’ कहे जाते है या

कहे जा सकते है।

ग़ालिब का ही एक  INDEPENDENT कताअ’ देखते हैं--6- लाइन की क़ता है---


लख़नऊ आने का बाइस नहीं खुलता यानी

हवस-ए-सैरो-तमाशा सो वो कम है हमको


मक़त-ए-सिलसिला-ए-शौक़ नहीं है ये शहर

अज़्म-ए-सैरे नज़फ़ तौफ़-हरम है हमको


लिए जाती है कहीं एक तवक़्को ”ग़ालिब’

ज़ादा-ए-रह कशिश-ए-क़ाफ़े-करम है हमको।

ग़ालिब-

[यहाँ भी -कम-हरम-करम - सब हम क़ाफ़िया है।

-रुबाई और क़ताअ’ के हैय्यत [बुनावट] में इतनी समानता है कि अगर 4-लाइन की रुबाई और 4-लाइन की क़ता एक साथ सामने  हो तो कभी कभी भ्रम पैदा हो जाता है। मगर जो जानकार है वो फ़र्क समझ लेते हैं

अच्छ यह सब तो ठीक है।

तो फिर मुक्तक क्या है ?

मुक्तक की चर्चा अगले क़िस्त में करेंगे_

सिलसिला जारी है-----


-आनन्द पाठक ’आनन’--

8800927181

उर्दू बह्र पर एक बातचीत क़िस्त 146: रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [ भाग -01]

 

उर्दू बह्र पर एक बातचीत क़िस्त 146: रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [ भाग -01]

पिछली क़िस्त 009 में त्रिपदी बनाम मुसल्लस [3-पंक्तियों वाली रचना/काव्य] पर चर्चा किया था।

आज 4-पंक्तियों वाली रचना पर चर्चा करेंगे जैसे रुबाई-क़ता--मुक्तक- आदि।

 फ़ारसी में रुबाई कहने का रिवाज़ बहुत पुराना है। उमर ख़ैयाम और हाफ़िज़ की रुबाईयात 

फ़ारसी काव्य की अमूल्य निधि है जिसका विश्व के हिंदी सहित कई भाषाओं में [रुबाई का बहुवचन] 

अनुवाद हो चुका है। 

रुबाई  फ़ारसी साहित्य से होते हुए उर्दू साहित्य में आई और बहुत से पुराने शायरों ने ग़ज़ल नज़्म के साथ साथ रुबाईयाँ भी कहीं  और लिखीं । मुशायरों/महफ़िलों को गर्म करने के लिए ग़ज़ल पढ़ने से पहले शायर लोग2-4 रुबाईयाँ ज़रूर पढ़ते थे। मगर आजकल रुबाईयाँ बहुत कम लिखी या पढ़ी जा रही है -लगभग न बराबर।आजकल महफ़िल /मुशायरॊ को गर्म करने के लिए 4-लाईन की क़ता या 4-लाइन का मुक्तक या फिर 1-मतला1-शे’र का रिवाज़ चल पड़ा है। 

सवाल यह कि कि तो क्या रुबाई, क़ता, मुक्तक, 1-मतला 1-शेर या चार लाइना क्या सब एक ही चीज़ हैं? प्रथम दॄष्टया तो ऐसा ही लगता है , मगर ऐसा है नहीं। इसमे बारीक़ फ़र्क भी है । आज इन्ही सब पर चर्चा करेंगे।

रुबाई : रुबाई अरबी शब्द -अर्बा’ से बना है जिसका शब्दकोशीय अर्थ चार या चार की संख्या होती है ।अत: रुबाई4-लाइनों कॊ एक काव्य रचना होती है। एक बात और इसी अर्बा’ शब्द से :मुरब्ब:" भी बना है यानी शे’र का वह स्वरूप जिसके दोनों मिसरों में कुला मिला कर 4-अर्कान होते हैं [ यानी एक मिसरा में 2-अर्कान --ऐसे शे’र को मुरब्ब: कहते हैं।

रुबाई की एक ख़ास बह्र होती है जो बहर-ए-हज़ज से निकलती है या बनती है। और इसके 24-वैकल्पिक औज़ान होते है। रुबाई के चारों मिसरा एक ही वज़न में हो सकते या फिर हर मिसरा इन्ही 24-औज़ान के  किसी एक वज़न पर हो सकता ।

रुबाई के मिसरों को एक मतला एक शे’र नहीं बल्कि ’मिसरीन’[ मिसरा का बहुवचन] कहते है।

इसके बारे में विशेष  मेरे ब्लाग उर्दू बह्र पर एक बातचीत 

www.arooz.co.in 

क़िस्त 60 पर या यहाँ पढ़ सकते हैं--

https://www.arooz.co.in/2020/06/60_2.html

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 रुबाई का पहला ,दूसरा और चौथा मिसरा हमक़ाफ़िया होता है। तीसरा मिसरा भी हम क़ाफ़िया हो सकता है पर न ही हो तो बेहतर

कुछ मशहूर शायरों के 1-2 रुबाई यहां उदाहरण के तौर पर लगा रहा हूं--


बुतखाने से दिल अपने उठाए न गए

का’बे की तरफ़ मिजाज़ लाए न गए

तौर-ए-मसजिद्न्को बिरहमन क्या जाने

याँ मुद्दत-ए-उम्र में हम आए न गए ।

--मीर तक़ी ’मीर’-


करते नहीं कुछ तो काम करना क्या आए

जीते जी जान से गुजरना क्या आए 

रो रो के मौत माँगने वालों को

जीना नहीं आ सका तो मरना क्या आए।

-फ़िराक़ गोरखपुरी-


ये रुबाईयां एक ख़ास औज़ान [रुबाई की बह्र ] में होती है जो बहर-ए-हज़ज से निकलती या बनती है।

ध्यान से देखे तो पहलॊ, दूसरी  और चौथी लाइन -हम क़ाफ़िया है।

रुबाई [या क़ता यहाँ तक की मुक्तक भी ] कहने के लिये सिर्फ़ यही शर्त काफी नहीं बल्कि और भी कुछ है

जो ज़रूरी होता है। अख़्तर अंसारी साहब फ़रमाते हैं--

पहले मिसरे मे जो बात कही गई उसे अगला मिसरा आगे बढ़ाए और चौथे मिसरे तक जाते जाते विषय 

की गहराई और प्रभाव ऊँचा से ऊँचा होता जाए। ख़याल बुलंद से बुलंदतर होता जाए  -भाव की दॄष्टि से और काव्य 

सौष्ठव की दॄष्टि से भी । यह नहीं कि शायर आखिरी मिसरा कह कर ऊपर तीन मिसरा चिपका दे। 

अगर ऊपर के दो मिसरे को हटा दे और उसके बाद भी अगर रुबाई [या क़ता ] का मफ़हूम या प्रभाव नष्ट या बेअसर नही होता है तो इसका मतलब या हुआ कि रुबाई या क़ता बेकार व्यर्थ औए कलाहीन है।यह एक स्वयं में इकाई की हैसियत रखता है। रुबाई या तो सब कुछ है या कुछ भी नहीं।

ख़ैर

पुराने ज़माने में कई शायरों ने रुबाईयाँ कहीं है जिसमे मीर , अकबर इलाहाबादी, अनीस लखनवी, शाद अजीमाबादी, फ़ानी बदायूनी,  जोश मलीहाबादी, आसी ग़ाज़ीपुरी फ़िराक़ गोरखपुरी आदि उल्लेखनीय है।

आजकल रुबाई कहने के प्रचलन कम हो गया है उसकी जगह एक मतला एक शे’र या चार लाइना या मुक्तक सुनाने का प्रचलन बढ़ रहा है।दौर-ए-हाज़िर में अभी भी  कुछ लोग हैं जो इस विधा को जीवित या पुन: प्रचलन में लाने का काम कर रहे है-जिसमे हमारे एक मित्र राम अवध विश्वकर्मा जी [ग्वालियर] इस दिशा में विशेष रूप से सक्रिय हैं और हाल ही में उनका एक रुबाई संग्रह--जदीद रुबाईयात-

प्रकाशित हुआ है।

तो फिर क़ता क्या है ??

इस पर अगले अंक में चर्चा करेंगे--

[ सिलसिला जारी है----]


-आनन्द कुमार पाठक ’आनन’-

8800927181