Saturday, June 15, 2024

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 101::यह बह्र कौन सी -- 121---22/ 121--22/ 121--22 /121--22

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चर्चा : यह बह्र कौन सी -- 121---22/ 121--22/ 121--22 /121--22

[ यह लेख उनके लिए जो अरूज़ से ज़ौक़-ओ- शौक़ फ़रमाते हैं जो अरूज़ आशना है अरूज़ से दिलचस्पी हैअरूज़ एक दिलचस्प विषय है अगर आप इसमे दिलचस्पी रखते हैं तो।
पिछली किस्तों से कुछ जानी पहचानी बह्रों की चर्चा कर चुके हैं । आज ऊपर वाली बह्र की चर्चा करेंगे।
आप लोग शायद इस बह्र में सामान्यतया अपनी शायरी नही करते । यह भी बड़ी मानूस और मुतर्रिम [ तरन्नुम वाली] बह्र है । हमलोग ज़ियादातर बस 7-8 बह्रों में ही शायरी करते है बह्र-ए-मुतकारिब / बह्र-ए-मुतक़ारिब/ हज़ज/रमल / की सालिम या इसकी कुछ मुजाहिफ़ बह्रें या फ़िर बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ या ऐसी ही 1-2 बह्र और। जब कि बह्रों कि संख्या इससे कही बहुत ज़ियादा है जिसमे शायरी की जा सकती है।
ऊपर वाली बह्र भी ऐसी ही एक लोकप्रिय बह्र है जिसमे कई कदीम[ पुराने शायरों ने शायरी की है।
आज इसी बह्र की चर्चा करेंगे।
अरूज़ में --कुछ बहरों में और कुछ ज़िहाफ़ात पर अरूज़ियॊं में कहीं कहीं इख्तिलाफ़ [ मतभेद ] है। और इस मतभेद के उनकी अपनी अपनी दलीलें है Justifications हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस दलील से मुत्तफ़िक़ [ मतैक्य ] है।
ऊपर वाली बह्र भी उन्ही मतभेदो में से एक बह्र है।
आगे बढ़ने से कुछ मशहूर शायरों की ग़ज़लॊ के 2-4 शे’र पहले लगा रहा हूँ [ पूरी ग़ज़ल रेख्ता य यूट्यूब पर मिल जाएगा ] पहले आप इस बह्र के दिलकश आहंग से परिचित हो लें ।लुत्फ़ अंदोज़ हो लें --मुलाहिज़ा कीजिए
अल्लामा इक़बाल के 2-शे’र--

ज़माना आया है बेहिज़ाबी का आम दीदार-ए-यार होगा
सुकूत था परदावार जिसका वो राज़ अब आशकार होगा

न पूछ ’इक़बाल’ का ठिकाना, अबी वही क़ैफ़ियत है उसकी
कहीं सर-ए-रहगुज़ार बैठा, सितमकशे इंतिज़ार होगा ।

अब्दुल हमीद ’अदम’ के 2 शे’र

जुनूँ का जो भी मुआमला है, वो शुस्ता-ओ-खुशनिज़ाम होगा
बिला तकल्लुफ़ जो चल पड़ेगा, वो राहरौ तेजगाम होगा ।

चलो ये मंज़र भी देख ही लें ,”अदम’ तकल्लुफ़ की गुफ़्तगू का
सुना है ’मूसा’ से ’तूर पर आज फ़िर कोई हमकलाम होगा

शकील बदायूनी के 2 शे’र

लतीफ़ पर्दॊ से थे नुमाया मकीं के जल्वे मकाँ से पहले
मुहब्बत आइना हो चुकी थी , वजूद-बज़्मे-जहाँ से पहले

अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ किस्मत में जौर--ए-पैहम
खुली जो आँखें इस अंजुमन में नज़र मिली आस्माँ से पहले ।

आप कोशिश करेंगे तो आप को और भी ऐसे बहुत से कलाम और शायरों के मिल जाएँगे।
इन तीनों की बहर एक ही है -121--22 /121--22 / 121--22 /121--22
[ फ़ऊलु-फ़अ’लुन]--[ फ़ऊलु-फ़अ’लुन]--[ फ़ऊलु-फ़अ’लुन]--[ फ़ऊलु-फ़अ’लुन]
आप तक्तीअ’ कर के निश्चिन्त हो लें । CONFIDENCE बढ़ेगा |
इस बह्र के नाम लिखने की ज़रूरत तो नहीं है--उलझन ही पैदा करेगा।
चलिए आप कहते हैं तो बाद में लिख दूँगा।

==== मध्यान्तर----INTERVAL -======= मध्यान्तर----INTERVAL ==== मध्यान्तर----INTERVAL

मतभेद --इस बह्र के नाम पर और इसकी बरामदगी पर कुछ अरूज़ियों में मतभेद हैं--

1- कुछ अरूज़ी इसे बह्र-ए-मुतक़ारिब फ़ैमिली से उत्पन्न मानते है ।कहते हैं यह मुतक़ारिब मक़्बूज़ असलम मुसम्मन मुज़ाइफ़ है।, घबराए नहीं
दलील यह कि मुतक़ारिब की बुनियादी रुक्न 122 [ फ़ऊलुन] है और इसपर निम्न ज़िहाफ़ लगा दें तो
122+ ज़िहाफ़ कब्ज़ = मुज़ाहिफ़ मक़्बूज़ 121
122 + ज़िहाफ़ सलम = मुज़ाहिफ़ असलम 22
यानी [121--22 ] = मक़्बूज़ असलम
अब आप समझ गए होंगे कि इस बह्र का नाम --मुतक़ारिब मक़्बूज़ असलम मुसम्मन मुज़ाइफ़ -क्यॊं कहा।

2- कुछ अरूज़ी इसे बह्र-ए-मुक्तज़िब फ़ैमिली से उत्पन्न मानते हैं--
दलील यह कि ज़िहाफ़ सलम --शे’र के ’इब्तिदा/सदर’ के मुक़ाम का ज़िहाफ़ है जो ’हस्व’ के मुक़ाम पर नहीं लाया जा सकता। तो फ़िर?
तो इसे बह्र-ए- मुक्तज़िब[ मुरक़्कब बह्र] से उत्पन्न मानते हैं । क्यों ?
बह्र-ए -मुक्तज़िब का बुनियादी रुक्न है --2221--2212---2221---2212
यानी [ मफ़ऊलातु ---मुसतफ़इलुन---मफ़ऊलातु--मुसतफ़इलुन }
[ आप को याद होगा कभी मैने कहा था कि ’ मफ़ऊलातु- एक सालिम रुक्न होते हुए भी --से कोई सालिम बह्र नहीं बनती। कारण भी बताया था।
ख़ैर कोई बात नहीं। सालिम बह्र नहीं बन सकती तो क्या--मुरक़्कब [ मिश्रित ] बह्र तो बन सकती है। लीजिए यहाँ बन भी गई।
आख़िर काम आ ही गया-मफ़ऊलातु-
तो फिर इसक नाम ?
नाम तो लम्बा चौड़ा है --याद करने की ज़रूरत नहीं। आप ने पूछा तो बताना ही पड़ेगा--इस बह्र का नाम होगा
बह्र-ए-मुक्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’., मख़्बून मरफ़ूअ’ मुसक्किन मज़ाइफ़-- ।
यह नाम कैसे पड़ा --अब छोडिए ।
3- कुछ अरूज़ी इसे 8- रुक्नी [ 12122 ] से बनी सालिम बह्र मानते है
दलील यह कि 121--22 को वो लोग दो-रुक्न नहीं मानते । उनका कहना है कि यह एक 8-हर्फ़ी सालिम रुक्न 12122 जिसका नाम ’ज़मील है।
[ 8-हर्फ़ी रुक्न के बारे में विस्तार से अपने ब्लाग -उर्दू बह्र पर एक बातचीत- में विशेष चर्चा की है । दरअस्ल क्लासिकल अरूज़ मे 7-हर्फ़ी रुक्न [ जैसे -मफ़ाईलुन [1222]-- फ़ाइलातुन-[2122]- --मुस तफ़ इलुन[ 2212 ]---मु त फ़ाइलुन [11212] --मुफ़ा इ ल तुन [ 12112]-का ही जिक्र है। 8-हर्फ़ी रुक्न का नहीं।
[ नोट 8-हर्फ़ी रुक्न के बारे में मैने अपने ब्लाग --उर्दू बह्र पर एक बातचीत --पर विस्तार से लिखा है। आप चाहें तो वहाँ से विशेष जानकारी ले सकते है --कि 8-हर्फ़ी रुक्न क्या है ये कैसे बनते बनते है ।प्रचलन में क्यों नहीं है? क्या लिमिटेशन है? आदि आदि]
8- हर्फ़ी सालिम रुक्न के बारे में कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब ने अपनी किताब -आहंग और अरूज़ - में इसकी चर्चा की है और इनका सालिम अर्कान का
बाक़ायदा नाम भी दिया है । यहाँ मैं विस्तार से नहीं जा रहा हूँ । मैं यहां~ केवल इस रुक्न 12112 की ही बात करुँगा। इस लिहाज़ से इस बह्र का नाम होगा
बह्र-ए-जमील मुसम्मन सालिम।
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आप ने देखा कि आहंग एक है मगर मतैक्य न होने के कारण इस आहंग के 3-नाम हो सकते है।
।हमे क्या ? हमें तो आम खाने से मतलब - आम गिनने से नहीं । नाम जो भी हो --आहंग तो एक ही होगा।
अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस दलील से अपने आप को ज़ियादा नज़दीक पाते हैं
जहाँ तक मेरा सवाल है मैं व्यक्तिगत रूप से दलील नं -2- के ज़ियादा नज़दीक हूँ।
आज इतना ही ।

[इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर इस हक़ीर फ़क़ीर से कुछ ग़लतबयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी निशानदिही फ़रमाए कि यह राकिम आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सके ।
सादर

-आनन्द.पाठक-

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 100:: 22--22---22---22 जैसी बह्र के बारे मे [ क़िस्त 02 अन्तिम]

  एक चर्चा : 22--22--22--22--- जैसी बह्र पर--[ क़िस्त 02 ]


पिछली क़िस्त में चर्चा किया था कि कैसे
212--212---212---212 [ बह्र-ए-मुतदारिक] से ज़िहाफ़ की बदौलत
112---112---112--112- या फ़िर
22---22----22---22 बह्र/ वज़न प्राप्त की जा सकती है। या इसकी मुज़ाइफ़ [ दो गुनी] शकल [ 16-रुक्नी]
22--22--22--22--// 22--22---22--22 भी प्राप्त की जा सकती है जिसे हम लोग गलती से मीर की बह्र समझ लेते है।
एक बात ज़ाहिर कर दूँ ---अरूज़ के RULEs एक तरह-- शायरों द्वारा USE एक तरफ़।
Technically 112---112---112---112--// 112---112---112---112 वज़न बरामद तो हो सकती है और होती भी है और इसके कई
मुतबादिल [ आपस में बदले जाने वाले] वज़न भी हासिल किए जा सकते हैं ।
मगर
शायरों ने इसके एक ख़ास मानूस और मक़्बूल वज़न ही प्रयोग किए है जो बड़ा ही दिलकश आहंग है। जैसे
[1] [ 22--112]---[22--112 ] ---[22--112 ] ---[ 22-112 ]
अब्दुल हमीद ’अदम’ साहब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर आप के लिए पेश कर रहा हूँ [ तक्तीअ’ कर के आप मुतमुईन हो लें ]

मयख़ान-ए-हस्ती में अकसर हमअपना ठिकाना भूल गए
या होश में जाना भूल गए या होश में आना भूल गए

मालूम नही आइने में चुपके से हँसा था कौन "अदम"
हम जाम उठाना भूल गए वो साज बजाना भूल गए ।

एक और उदाहरण शकील बदायूनी साह्ब की ग़ज़ल के चन्द अश;आर देखते हैं [ तक्तीअ’ आप कर लें]

करने दो अगर कत्ताल-ए-जहाँ तलवार की बातें करते है
अर्जाँ नहीं होता उनका लहू जो प्यार की बातें करते हैं

ये अहल-ए-क़लम, ये अहल-ए-हुनर देखो तो ’शकील इन सबके जिगर
फ़ाकों से हैं दिल मुरझाए हुए, दिलदार की बातें करते है ।

ऐसे और बहुत से शे’र-ओ-सुखन मिल जाएंगे ।
एक बात और
जब कि उसी तस्कीन-ए-औसत के अमल से यह भी बह्र बरामद हो सकती थी
[112---22] --[112--22]--[112--22 ] --[112--22]
आप चाहें तो इस वज़न में शायरी कर सकते हैं यदि कर सकते हैं तो ।
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कल एक माननीय सदस्या ने इसी संदर्भ में एक प्रश्न किया था--
"--22 22 22 22 को 112 112 112 112 के अलावा 121 121 112 112 या 112 121 211 211 आदि तरह से यानी मीर की बह्र जैसा लिया जा सकता है ?या नही"
जिसका मैने जवाब दिया था---नहीं
हाँ ऐसी ही एक मिलती जुलती एक मुज़ाहिफ़[ ज़िहाफ़ लगा हुआ ] और मुज़ाइफ़ [ दो गुनी की हुई] एक बह्र और है
121---22 / 121--22 / 121--22 / 121--22
इस पर बाद में कभी विस्तार से बात करूंगा ।
आज इतना ही ।
[इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर इस हक़ीर फ़क़ीर से कुछ ग़लतबयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी
निशानदिही फ़रमाए कि यह राकिम आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सके ।
सादर
-आनन्द.पाठक-