Saturday, April 11, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 131 ] : मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़-ए-ज़ाइद [ 1+ ] के छूट पर

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 131 ] : मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़-ए-ज़ाइद [ 1+ ] के छूट पर 

[यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात  से वाक़िफ़ है 
अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात 
हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ]

-हमारे कुछ मित्रों की धारणा है या मान्यता है कि--किसी मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़ बढ़ाने की छूट है --।
आज इसी पर चर्चा करेंगे।
यह धारणा अर्ध सत्य है।
अर्धसत्य इसलिए कि --किसी मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाने की छूट है [ हर्फ़-ए-मुतहर्रिक नहीं]
हर्फ़-ए-मुतहर्रिक क्यों नहीं ? इस पर बाद में कभी चर्चा करेंगे
आज तो यह चर्चा करेंगे कि हर्फ़-ए-साकिन किस मिसरा के आखिर मे बढ़ा सकते हैं? मिसरा उला में कि मिसरा साकिन में ?
पिछ्ली क़िस्त में चर्चा कर चुके हैं कि यह हर्फ़-ए-साकिन शे’र के मिसरा ऊला के आख़िर में ही बढ़ा सकते है। मिसरा सानी में नहीं।
मिसरा सानी में क्यों नहीं ?
मिसरा सानी में इसलिए नहीं कि किसी ग़ज़ल की बहर मतला के मिसरा सानी से तय होती है और वही वज़न वही बह्र -पूरी गज़ल के मिसरा सानी में
क़ायम रखना होगा } कोई ख़ल्त, रद्द-ओ-बदल घटाना /बढ़ाना जायज नहीं होगा। बेबह्र होने का इमकान हो सकता है।
मिसरा उला ही ख़ाली है जहाँ एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाया जा सकता है।
हाँ अलबत्ता --रुबाई और माहिया के वज़न की बात और है
रुबाई = रुबाई के किसी मिसरे के आख़िर मे एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाया जा सकता है। और लोग बढ़ाते भी है।
भाई रुबाई में ऐसी क्या बात है जो ग़ज़ल में नहीं है ?
रुबाई में कोई मतला नहीं होता --मिसरा सानी नहीं होता--मिसरा उला नहीं होता। बल्कि चारो मिसरे                      Independent होते है ,अलग अलग होते है, अत: एक 
हर्फ़-ए-साकिन किसी मिसरा के आख़िर में बढ़ाया जा सकता है/छूट है।
एक दिलचस्प बात यह भी कि इसी छूट के कारण -रुबाई के 24 वज़न दस्तयाब होती है। अगर यह छूट न हो         तो रुबाई के वज़न 12 औज़ान में ही सिमट जाते।
ख़ैए। हम लोगो को इस पर ज़ियादे सोचने की ज़रूरत नही। क्योंकि हम लोग आजकल कौन सी रुबाई लिखते 
माहिया = यही बात माहिया के औजान में भी लागू होती है। वहाँ भी कोई मिसरा उला . मिसरा सानी नहीं होता ।             तीनो मिसरे Independent होते है । अत: इस केस में भी
किसी मिसरा के आख़ीर में एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाया जा सकता है/ या छूट है।

[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
 सादर 


-आनन्द पाठक ’ आनन’
880092 7181

Wednesday, April 8, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : बह्र 221--2121--1221--212 पर एक चर्चा

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : 221--2121--1221--212  पर एक चर्चा 


[यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं और अरूज़ से जौक़-ओ-शौक़फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ]
मेरे एक मित्र ने अपनी ग़ज़ल का एक मतला बाँधा -

हर शै के दाम तय हुए बाज़ार के बग़ैर
हमने कही कहानियाँ किरदार के बग़ैर ।

[ आगे के अश’आर में - के बग़ैर- रदीफ़ क़ायम रखा गया ]

मित्र ने इस मतले का वज़न 221--2121---1221---212 लिखा [ बह्र का नाम नहीं लिखा]
यह बहुत ही मानूस और मक़्बूल [ परिचित और लोकप्रिय ] बह्र है सब लोग इस बह्र का नाम जानते है
और अमूमन सभी शो’अरा नें इस बह्र में शायरी की है।
इस बह्र का नाम है ---
बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ और अर्कान के नाम हैं
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु--मफ़ाईलु--फ़ाइलुन 

ख़ैर
अगर मतला को आप ध्यान से देखें तो अर्कान 221---2121--1221--212{ 1) ठहरता है। 
तो क्या 2121 को 212 कहना उचित ठहरता है? आज इसी पर विचार करेंगे।
मित्र की [ और अन्य मित्रों की भी] धारणा है या मान्यता है --""मिसरा के अन्त में 1+ की छूट जायज है।

[Poetic Liscence] है। आज इसी पर भी विचार करते है

आप 212 और 2121 [ जो शे’र के अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर है] में क्या फ़र्क़ है?
212 --हज़्फ़ ज़िहाफ़ के अमल से  "महज़ूफ़" है 2122 का और नाम है --फ़ाइलुन-
212[1] - कस्र ज़िहाफ़ के अमल से " मक्सूर" है 2122 का और नाम है --म्फ़ाइलान -

दोनो हॊ रेगुलर ज़िहाफ़ है अत: दो अलग अलग नाम भी होगा --

[अ ] 221---2121---1221--212 = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
[ब] 221---2121---1221--212(1) = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्सूर

यह दोनों हॊ रेगुलर बह्र हैं मान्य बह्र है और अरूज़ के ऐन मुताबिक से हासिल हुए हैं।’

 यह बात अलग है कि  अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो -महज़ूफ़ या मक्सूर- दिख रहा है इनका आपस में ख़्ल्त जायज है यानी इनका आपस में अदला बदली किया जा सकता है ।
 मगर कब? 
बह्र के नाम का निर्धारण --मतला के मिसरा सानी से ही तय होता है और जब आप ने मिसरा सानी में मक्सूर [2121] बाँध ही दिया है तो फ़िर
इसका वज़न -212-[ अरूज़/जर्ब] दिखाने का कोई मतलब ही नही। 
हाँ अगर आप 212--लाना ही चाहते है तो अब मिसरा ऊला में ही लाया जा सकता है -जो जायज भी है और अलाऊ भी है ।
ठीक इसका उल्टा केस भी सोचें--
अगर मतला के मिसरा सानी में -212--बाँधा है तो --फ़िर मिसरा उला ही बचा जहाँ आप 2121 ला सकते हैं -जो जायज भी है और अलाऊ भी है 
क्यों कि मिसरा सानी से बहर फ़िक्स हो गई --रदीफ़ क़ायम हो गया --तो फिर जो भॊ अदल-बदल करना होगा वह मिसरा ऊला में होगा। सानी में नहीं।

शकील बदायूनी-की ग़ज़ल के 2-3 अश’आर देखते हैं

221---2121---1221--2121
[1] आँखें उनको देखती है नज़ारा किए बग़ैर
पर्दे में छुप गए हैं वो परदा किए  बग़ैर ।-1 [मतला]

हरचंद दर्द-ए-इश्क़ का दरमा नहीं मगर
बनती नहीं है फ़िक्र-ए-मदावा किए बग़ैर । -2

[ बाक़ी अश"आर मिसरा सानी के  221---2121---1221--2121  वज़न पर ही निभाया गया है]

मगर शे’र 2 के मिसरा उला का वज़न तो  221--2121-1221--212 है।

 जब कि  मिसरा सानी का वज़न तो          221---2121---1221--2121 है।

मतलब बात यह कि --212 [ महज़ूफ़] --मिसरा उळा मे ही लाया गया है --सानी में नहीं। क्योंकि मिसरा सानी का तो बह्र 
/वज़न तो पहले से ही तय है। जो भी खल्त करना है वह अब मिसरा उला के मुक़ाम पर ही होगा।

अब इसका उल्टा केस लेते है-- [शकील बदायूनी साहब की ग़ज़ल का ]

221--2121-1221--212
[2] मंज़िल की धुन में होश-ओ-ख़बर से गुज़र गए
सौ बार तेरी राहगुज़र से  गुज़र गए ।          -1 [मतला ]

हरचंद फ़र्श-ए-राह थी उनके लिए निगाह
फिर भी ख़बर नहीं वो किधर से गुज़र गए। -2

क्या पूछते हो लुत्फ़-ए-हुजूम-ए-नज़र ’शकील’
कुछ तीर थे जो कल्ब-ए-नज़र से गुज़र गए । -3

[ [ बाक़ी अश"आर के मिसरा सानी में 221---2121---1221--212 यही वज़न निभाया गया है]

शे’र 2 और शे’र 3 पर मिसरा उला [ अरूज़ के मुक़ाम पर ध्यान दें]
तो वज़न 2121 उतरेगा।

यानी कहने का मतलब यह है कि महज़ूफ़/मक्सूर [ 212/2121] का जो भी खल्त [ अदल बदल ] होगा वह मिसरा ऊला में ही होगा--मिसरा सानी में नहीं।
क्योकि मिसरा सानी का वज़न और बह्र तो मतला से Already fix हो चुकी है --उसे ही पूरी ग़ज़ल में निभाना होगा । जो छूट की बात होगी वह मिसरा उला
में ही होगी।
वैसे यहाँ इस वज़न में [1+] वाली छूट की ज़रूरत नहीं है,। जो भी उला-सानी में बदलाव दिख रहा है वह =’ज़िहाफ़’ के अमल के कारण है न कि छूट के कारण है
 आप कोशिश करेंगे तो और भी शायरों के सुखन में भी यह बात मिल जाएगी/नज़र आएगी।
ऐसी ही स्थिति कुछ अन्य बह्रों में भी होती है।

जहाँ तक मिसरा के एक हर्फ़ 1+] के छूट वाली बात है वह भी मिसरा ’उला में होगी। सही पूछें तो वह हर्फ़ मिसरा के आख़िर में --एक हर्फ़-ए-साकिन - 
ज़ाइद की बात होती है--किसी मुतहर्रिक हर्फ़ की बात नहीं होती। 
ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि हर शे’र का मिसरा का आख़िर हर्फ़ -साकिन हर्फ़- पर गिरता है । अगर मिसरा के आख़िर में आप एक साकिन हर्फ़ और बढ़ा देंगे तो क्या होगा?
कुछ नहीं--मिसरा के अन्त में -दो हर्फ़-ए-साकिन -एक साथ हो जायेंगे} कोई बात नहीं।
जब मिसरा के आख़िर में -दो हरफ़-ए- साकिन एक साथ आ जाता है तो तक़्तीअ में एक ही हर्फ़-ए-साकिन शुमार होता है--अत: बह्र वही की वही रहती है।

[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 
ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-