Monday, March 30, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : [क़िस्त 129]: बह्र 221--1212--122 के बारे में

 

बह्र : 221--1212---122 के बारे में

ग़ालिब की एक ग़ज़ल है [पूरी ग़ज़ल गूगल पर मिल जाएगी]

चर्चा की सुविधा के लिए यहाँ मात्र उसके 3 शे’र ही लगा रहा हूँ


फ़रियाद की कोई लै नहीं है

नाला पाबंद-ए-नै नहीं है [मतला]


हरचन्द हर एक शै में तू है

पर तुझ-सी तो कोई शै नहीं है।


हस्ती है न कुछ अदम है ’ग़ालिब’

आख़िर तू क्या है,’ऎ’ नहीं है । [मक़्ता ]


अगर मतला की तक्तीअ’ किया जाए तो

मिसरा ऊला की बह्र = 221--1212--122 पर ठहरती है [
बह्र-ए-हज़ज मुसद्द्स अख़रब मक़्बूज़ महज़ूफ़]


जब कि

मिसरा सानी की बह्र = 222---212--122 पर ठहरती है

इसी मंच के एक मित्र ने यह सवाल किया है -


-क्या दोनों मिसरों की बह्र अलग अलग है? क्या मिसरा सानी में बह्र बदल रही है

और वो भी ग़ालिब की ग़ज़ल में।


आज इसी पर विचार करते है।

-----

- प्रथम दृष्टया देखने में तो ऐसा ही लगता है । मगर ऐसा है नहीं।


बहर-ए-हज़ज का बुनियादी रुक्न 1222 [ मफ़ाईलुन ] है । इस सालिम रुक्न के साथ एक समस्या है या कहें कि एक ख़ूबी है ।

इस सालिम रुक्न [1222 ] पर ख़र्ब का भी ज़िहाफ़ लग सकता है और ख़रम का भी ज़िहाफ़ लग सकता है और इत्तिफ़ाक़न दोनो हॊ ज़िहाफ़ ’सदर/इब्तिदा-

के लिए मख्सूस [ निर्धारित है] यानी मिसरा के प्रथम मुक़ाम पर ही ये दोनों ज़िहाफ़ लग सकते हैं। यानी


1222+ ख़र्ब से = अख़रब 221[ मफ़ ऊ लु ] हासिल हो सकता है ।


1222+ ख़्ररम से = अख़रम 222 [ मफ़ ऊ लुन]हासिल हो सकता है

और एक बात और

इस बह्र का मिसरा अख़रब से भी शुरु हो सकता है और अख़रम से भी।


[A] अगर मिसरा ’अखरब ’ से शुरु होगा तो

221--1212--122 वज़्न होगा और नाम होगा बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस अखरब मक़बूज़ महज़ूफ़

[B] अगर मिसरा ’अख़रम’ से शुरु होगा तो

222---1212--122 होगा और नाम होगा -बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रम मक़्बूज़ महज़ूफ़

यह दोनॊ बह्रें ज़िहाफ़ के ऐन मुताबिक [विधिवत अमल ] से हासिल हुई है । मान्य है।


अब बह्र [A] को ध्यान से देखें--- इस बह्र में दो adjacent रुक्न [ 221 + 1212 ] में दो 1-1- आमने सामने आ गए यानी तीन मुतहर्रिक हर्फ़

[लाम-मीम-फ़े ] एक साथ आ गए तो ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और दो नया रुक्न 222 --212 बन सकता है और यही बना भी है इस वज़न में।


मगर यह रुक्न- 222 --अख़रम से नही बना है यानी यह अख़रम वाले 222 से जुदा है अलग है, मुख्तलिफ़ है । अगरचे देखने में दोनो की शकल एक जैसी है --जैसे सीता-गीता फ़िल्म में।

कभी कभी अरूज़ में ज़िहाफ़ के अमल से ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक बरामद होते रहते है, जो भ्रम पैदा करते रहते हैं।

सामान्य जन धोखा खा जाते है मगर जो सत्य जानते है, फ़ितरत पहचानते है वो बख़ूबी जानते है कि कौन सीता है कौन गीता है। इन मुज़ाहिफ़ अर्कान पैदाइश कैसे हुई है।

मगर ऐसे अर्कान नाम एक जैसा ही रखा जाता है । इन दोनों केस में -222- का नाम - मफ़ऊलुन-ही रहेगा , बरामद चाहे जैसे हुआ हो। आप को मुतमुईन होना है कि ’रामनरायन’--गाजियाबाद वाले हैं --या बनारस वाले।

ख़ैर

अब बह्र [B] को ध्यान से देखें 222---1212---122 इस वज़न में तख़्नीक़ के अमल की कोई स्थिति ही नही है, न गुंजाइश है, न ज़रूरत है। यह सामान्य प्रक्रिया से हासिल हुई है।


तो ?

बह्र [A] अगर मिसरा उला 221-[ अख़रब] - से शुरु हुआ है तो मिसरा सानी में 222-[ तख़नीक के अमल से] लाने की इज़ाजत है। और मिसरा सानी में इसके साथ

के अर्कान यानी 212--122 भी निभाना ज़रूरी होगा। बहर का नाम नहीं बदलेगा मात्रा भार Same ही रहेगा यानी 16 का 16 ही रहेगा।


बह्र [B] अगर मिसरा अख़रम से शुरु हुआ है तो फिर ऐसी कोई सुविधा इसमें हासिल नहीं होगी और तमाम मिसरा उला-या सानी सब इसी वज़न में निभाने होंगे ।

[ यह मेरा ख़याल है]


आप चाहे तो ग़ालिब की इस ग़ज़ल की पूरी तक्तीअ’ कर मुतमुईन हो सकते हैं।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर


-आनन्द पाठक ’आनन’-

Friday, March 27, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128] : तस्कीन-ए-औसत के बारे में

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128]  : तस्कीन-ए-औसत के बारे में


पिछले अंक में ’तस्कीन-ए-औसत’ पर एक चर्चा की थी। उसी चर्चा को ज़रा और विस्तार देते हैं।

उन पाठकों के लिए जो उस परिचर्चा से वंचित रह गए थे उनके लिए इस अमल की परिभाषा पुन: लिख रहा हूँ।

"---जब किसी -"एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न में तीन मुतहर्रिक एक साथ आ जाए तो *औसत* [ बीच वाला] मुतहर्रिक 

साकिन हो जाता है और एक नया रुक्न बनता है। यह फ़ारसी का अमल है मगर इसके साथ एक शर्त [rider]

भी  है कि इस अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से वह बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए--"


यह कोई नियमित [ रेगुलर]  ज़िहाफ़ नहीं हैं--बल्कि फ़ारसी का एक अमल मात्र  है। परिभाषा पर ध्यान दें--

एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न ? --क्या मतलब?

एकल रुक्न ही क्यों ?अगर दो मुज़ाहिफ़ रुक्न आमने सामने आ जाए तो? यानी दो adjacent रुक्न आ जाए और तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ आ जाएँ तो?

तो क्या ? तब भी तस्कीन ए औसत का अमल हो सकता है । मगर फिर उसे तस्कीन-ए-औसत का अमल न कह कर ’ तख़्नीक़ का अमल’ कहेंगे।

इस पर कभी बाद में चर्चा करेंगे।

एक बार फिर परिभाषा पर ध्यान दें--

मुज़ाहिफ़ रुक्न ही क्यों ? सालिम रुक्न पर इसका अमल क्यों नही कर सकते?? देखते हैं

हम जानते है कि सालिम अर्कान में सिर्फ़ दो ही एकल रुक्न ऐसे है जिसमे 3- मुतहर्रिक एक साथ आते हैं--

[1] बह्र-ए-कामिल का 1 1 2 1 2 [ मु त फ़ा इ लुन] यानी [मीम-ते-फ़े -तीन मुतहर्रिक-एक साथ]

[2] बह्र-ए-वाफ़िर  का 1 2 1 1 2 [ मु फ़ा इ ल तुन ] यानी [ ऐन-लाम- ते  तीन मुतहर्रिक--एक साथ]

अब एक एक कर के देखते है ।

इस बह्र को तो आप पहचानते होंगे

11212---11212----11212---11212

बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम ।


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

बह्र-ए-कामिल की शकल कुछ निम्न लिखित हो जाएगी

2212---2212---2212-------2212


अरे यह क्या हो गया ?? यह तो बह्र ही बदल गई। यह तो  बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम हो गई । और वही शर्त [rider] 

सामने आ गई कि अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए]

यहां तो बह्र कामिल से चल कर रजज़ में चली गईं। यही कारण है तस्कीन का अमल ’सालिम रुक्न/सालिम बह्र-पर नहीं की जाती है


अब दूसरी बह्र वाफ़िर को देखते है 

12112 ---12112---12112---12112 को देखते है

[ बह्र-ए-वाफ़िर मुसम्मन सालिम ]


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

 1222---1222--1222---1222 हो गई

अरे यह क्या हो गया?? यहाँ तो बह्र ही बदल गई। यह बहर तो हज़ज में चली गई।


इसीलिए तस्कीन के अमल के साथ एक Rider ,एक शर्त लगा दिया गया है जिससे बह्रों का आपस में गडमगड न हो, ख़्ल्तमल्त न हों।

यही कारण है कि इस का अमल ’सालिम रुक्न’ पर नही करते हैं। जब भी करते है तो किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न पर ही करते हैं, एकल रुक्न पर करते हैं।


अगली चर्चा में इसी अमल पर अभी कुछ और चर्चा करेंगे,  दिलचस्प बात करेंगे।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

--------