Wednesday, January 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [125] : एक शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल और उसकी बह्र ??


क़िस्त : एक शायरा ताजवर सुलताना की एक ग़ज़ल और उसकी बह्र ?
[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।
यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है
अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात
हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।

इसी मंच पर मेरे एक मित्र ने यह सवाल किया था कि -
ताजवर सुल्ताना साहिबा की नीचे लिखी ग़ज़ल किस बह्र में है?
बह्र इन दो बह्रों में से कौन सी बह्र में है।
[क] =बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
या
[ख] =बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
२१२१-२२२-२१२१-२२२

[ नोट = स्थान की कमी के कारण शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल के 2-3 शे’र ही यहाँ पर लगा रहे है पूरी ग़ज़ल इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]
ग़ज़ल [ शायरा :ताजवर सुलताना ]
हुस्न-ओ-इश्क़ का संगम देर तक नहीं रहता
कोई भी हसीं मौसम देर तक नहीं रहता
लौट जाओ रस्ते से तुम नए मुसाफ़िर हो
प्यार का सफ़र हमदम देर तक नहीं रहता
कौन जाने कब किस पर ज़िंदगी ठहर जाए
कोई रुस्तम-ए-आज़म देर तक नहीं रहता

______ताजवर सुल्ताना---
------- -------------------------------- ---
उत्तर : इस ग़ज़ल की बह्र [मेरे ख़याल से और मेरे हिसाब से]
मुक्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक़्तूअ’ है।
अगर आप इस उत्तर से सन्तुष्ट हैं तो आगे बढ़ें, अन्यथा आगे पढ़े ।
किसी ग़ज़ल की बह्र क्या है यह तो शायर खुद ही सही सही बता सकता है, मगर ग़ज़ल के ऊपर बह्र या वज़न लिखने की परम्परा नहीं है। परम्परा अपनी जगह -Inspectory अपनी जगह।
ख़ैर।
फिर भी मित्र के सवाल का जवाब ब नुक़्त-ए-नज़र यथा संभव यथा शक्ति देने की एक कोशिश कर रहा हूँ।
अगरचे ऊपर दिए हुए दोनो वज़न से इस ग़ज़ल की तक़्तीअ की जा सकती है .शायद उन्होने किया भी होगा। दिए हुए वज़न से तक्तीअ’ तो हो सकती है मगर देखना होगा कि उस वज़न से कोई मान्य मुस्तनद बह्र होती भी है क्या? बनती भी हैं क्या ? देखते है--
--- --- ------
[क] बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
यह तो आप जानते ही हॊंगे बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम का वज़न होता है-
= 1222---1222---1222--1222
अगर इस पर -शतर - का ज़िहाफ़ लगाएँ तो ? शतर एक मुरक़्कब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ [ खरम+ क़ब्ज़ ] से मिलकर बना है
और खरम --एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के मुक़ाम सदर/इब्तिदा पर ही लगता है हस्व या ज़र्ब के मुकाम पर नहीं।
1222 + शतर = अश्तर 212 [ फ़ाइलुन ]
अत: हज़ज के मुसम्मन सालिम से निम्न बहर
212--1222---1222--1222 तो बन सकती है जिसमे हस्व के मुक़ाम पर -212-पर नहीं लाया जा सकता।
अत: निम्न बह्र
212--1222---212---1222 वज़न से एक मान्य बहर नहीं बन सकती।अत: इससे उक्त ग़ज़ल की तक़्तीअ’ करने का कोई अर्थ नहीं।
********** ******
अब दूसरी बह्र देखते है
[ख] बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
= २१२१-२२२-२१२१-२२२
मुक्तज़िब एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम रुक्न [ 2221+ 2212 ] से मिल कर बनता है
और इसका मुसम्मन सालिम बहर होगा--
-A-- --B- ---C--- --D--
=2221---2212----2221----2212
[ यहाँ -A- और -C- एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यहाँ -B- और -D एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यानी 2221= मफ़ ऊ लातु = [ बह्र-ए-मुक़्तज़िब का बुनियादी रुक्न ]
इस पर कुछ ज़िहाफ़ लगा कर देखते है--
A= 2221+ तय्यी = मुतव्वी 2121 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो यहाँ सदर के मुक़ाम पर आया है
B= 2212 + तय्यी = मुतव्वी 2112 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो जो यहाँ हस्व के मुक़ाम पर आया है
अगर इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल [ तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए हैं किया जाए
तो 2112= 222 हो जायेगा और इसे "मुतव्वी मुसक्किन" बोलेंगे।
C = A= 2121
D = 2212 + क़तअ’= मक्तूअ" 222 = मक्तूअ’ एक खास ज़िहाफ़ है जो अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है जो यहाँ अरुज़/ज़र्ब के मुक़ाम पर
= आया है
अत: बह्र [ख] का स्वरूप हो गया
-a-- ---b--- --c-- --d---
[ख] = 2121---222----2121---222- जिससे मित्र ने तक्तीअ’ करने की कोशिश की।
ध्यान रहे-----b-- और --d--- का वज़न समान है पर दोनो का वज़न भिन्न भिन्न अमल से प्राप्त हुआ है।
और इस बह्र क नाम होगा
बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक्तूअ’ --जो एक मुस्तनद[प्रामाणिक] बह्र है।
अच्छा यह बह्र इत्तिफ़ाक़न -बह्र-ए-शिकस्ता भी है । यानी
2121---222-//-2121---222-

अब ताजवर सुलताना की ग़ज़ल की तक़्तीअ इस वज़न पर कर के देखते है। अगर तक़्तीअ’ इस बह्र और इस वज़न पर सही सही उतर जाए
तो ग़ज़ल की बहर यह हो सकती है।
सादर
-आनन्द पाठक ’आनन’
[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
x

Tuesday, January 13, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [124]: बह्र का वज़न एक और नाम दो

उर्दू बह्र पर एक बातचीत: क़िस्त 124  : बह्र का वज़न एक और नाम दो

[ यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है 

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात 

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।


मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया था कि बह्र-ए-मदीद क्या एक शिकस्ता: बह्र है ?

मैने इसका जवाब तो उन्हे दे दिया वह सन्तुष्ट हुए या नहीं  मालूम नहीं, पर जवाब देने और अध्ययन के दौरान एक

दिलचस्प वाक़िया भी पेश नज़र आया । और वह यह कि दो बह्र की वज़न तो एक है मगर नाम मुख्तलिफ़ है।

ऐसा ही एक वाक़िया पहले भी नज़र आया था जिसको मैने अपने ब्लाग 

www.arooz.co.in  [क़िस्त 74 ] लिखा था।आप वहाँ पढ़ सकते हैं

ऐसा ही एक मसला  -22--22--22--22- वाली बह्र पर उठता है ।


मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि सिर्फ़ यह वज़न मात्र लिख देने से ही काम न चलेगा। लोग बह्र का नाम नहीं लिखते बस इसी  numerical system से ग़ज़ल लिख लेते हैं । मगर मेरे एक सवाल है कि  आप के सभी मिसरे 22--22--22--22 पर होते हैं क्या? मिसरे मे कहीं -1- नहीं आता क्या ? तो फिर 22--22--22--22 का मतलब क्या?

मैं बार बार कहत हूँ कि 22--22--22--22 खुद में बह्र नहीं ।अपितु मात्र किसी मूल बह्र का एक वज़न /एक स्वरूप मात्र है  यही वज़न दो- मुख्तलिफ़ मूल बह्र से बरामद हो सकती है।


[क] --मुतक़ारिब खानदान से भी

[ख] -- मुतदारिक खानदान से भी


मात्र 22--22--22--22-- लिख देने से यह पता नहीं चलता कि आप किस खानदान वाली बह्र की बात कर रहे है या ग़ज़ल लिख रहे हैं और उस पर अफ़सोस यह कि कुछ दोस्त इसे मीर की बह्र कह देते है या से मन्सूब कर देते है।

ख़ैर इस विषय पर कभॊ बाद में विस्तार से बात करेंगे।

अरूज़ एक बहुत आसान विषय है और जब आप इससे खेलते हैं तो ऐसे ही दिलचस्प वाक़ियात नमूद [ प्रगट] होते रहते है।

आज का आलेख इसी विषय पर है। आप भी आनन्द उठाएँ और अपनी राय दें ।  

अब अपने मित्र के मूल प्रश्न पर आते है  बह्र-ए-मदीद के बारे में

 आप जानते है कि बह्र-ए-मदीद उर्दू के प्रचलित बह्रों में से एक मान्य बह्र है । यह बात अलग है कि इस बह्र[मदीद] में बहुत कम शायरी 

हुई } मगर मान्य बहर तो है ही।

 बह्र-ए-मदीद एक मुरक़्कब बहर है और इसका बुनियादी  वज़न होता है--

2122---212  [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन ]

और इसकी सालिम मुसम्मन  शकल होती है 


[क] 2122--212---2122---212 = नाम होगा बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम

अच्छा 2122---2122 [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ] इस  बह्र को आप ज़रूर पहचानते होंगे? 

अरे वही बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम

अच्छा अब आख़िरी वाले [ ज़र्ब/अरूज के मुकाम वाले] 2122 पर एक ज़िहाफ़[ हज़्फ़ का ज़िहाफ़ ]लगा कर देखते है --क्या होता है

2122+ हज़फ़ = 212 [ फ़ाइलुन ] महज़ूफ़  होगा

यानी 

बह्र 2122 -2122  अब 

2122-212 हो गई । मतलब बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ हो गई

अब इसे दोगुना कर दें यानी मुज़ाइफ़ कर दे तो क्या होगा "?

[ख]   2122-212- 2122--212

बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ मुज़ाइफ़

फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन // फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन  

और इसका नाम होगा      

अब [क] और [ख] की तुलना कीजिए

क्या दोनो बह्र  का वज़न एक नहीं है ? और नाम मुख्तलिफ़ नहीं है ?

इसी लिए कहता हूँ कि सिर्फ़ वज़न लिख देने से ही काम नहीं चलेगा --बह्र का नाम भी लिख दे तो बेहतर।

और न लिखें तो और भी बेहतर?

अच्छा तो एक सवाल -- हम पहचानेंगे कैसे कि

2122--212---2122--212  यह बह्र मदीद से हासिल हुआ कि रमल से हासिल हुआ ?

इसका जवाब कभी अगले क़िस्त में।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 

ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-