Tuesday, September 22, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 144 : चर्चा : वा’दा -इरादा- जैसे क़ाफ़िया -पर एक चर्चा

 

क़िस्त : वा’दा -इरादा- जैसे  क़ाफ़िया  -पर एक चर्चा

किसी  मंच पर मेरे एक मित्र ने परवीन शाकिर का एक मतला लिखा--

उसने भी लौटने का इरादा नही किया

हमने भी भूल जाने का वा’अद: नहीं किया।---परवीन शाकिर


और सवाल किया कि मतले का क़ाफ़िया क्या ठीक है?

मेरे एक अन्य मित्र  ने क़ाफ़िया [और इस ग़ज़ल का दिगर कवाफ़ी--

यानी लबादा--बादा--ज़ियादा--सादा-- वग़ैरह] को दुरुस्त ठहराया।

मेरे मित्र का सवाल था क्यों और कैसे?

आज की चर्चा इसी सवाल पर।

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इक़बाल साहब का एक शे’र है=--

ख़ामोश ऎ दिल! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा

अदब पहला क़रीना है , मुहब्बत के क़रीनों  में ।‘-अल्लामा इक़बाल

[इस ग़ज़ल की बह्र है -1222---1222--1222--1222]


यानी -क़री्ना और क़रीनो- दोनों का वज़न -122- है।

साथ ही कुछ और दीगर  शब्द  ख़याल में रखें  जैसे--पर्दा--परवाना --आदि।

 ये सभी शब्द [और ऐसे हज़ारो शब्द [उर्दू-अरबी-फ़ारसी में ] के इमला में

आख़िरी हर्फ़ हा-ए-हूज़ [छोटॊ -हे-यानी गोल -हे-आती है} से लिखे जाते हैं।

[मैं यहाँ --उर्दू हा-ए-हुत्ती[ बड़ी हे] --हा-ए- हूज़ , हा-ए-हूज़ की कितनी किस्में होती हैं

हा-ए-मल्फ़ूज़ी--हा-ए-मख्फ़ूफ़ी--दो चश्मी हे-आदि , इनके शब्द पर क्या असरात होते हैं--discuss -नहीं करूँगा -ये उर्दू व्याकरण का विषय है और विस्तार में यहां discuss करने से विषय बोझिल और दुरूह हो जाएगा]

संक्षेप में आप यह समझ लें--


[क[-- जिस लफ़्ज़ के आखिर में हा-ए-हूज़ [ छोटी हे] लगी हो वो अपने पहले आने वाले हर्फ़ को

    मुतहर्रिक[1] कर देता  है।

जैसे वा’दा = वा’द: [21]

    पर्दा  =  पर्द:  [21]

    परवाना= परवान: [21]

    क़रीना = क़रीन: [21]


[ख] -हा-ए-हूज़ की आवाज़ कुछ कुछ -अलिफ़ की आवाज़- के समान होता है । अगर इस को खींच कर [तवील कर] पढ़ा जाए तो--आ- की आवाज़ सुनाई देगा

       जैसे

वा’द: =  वादा [22]

  पर्द: =    पर्दा [22]

       परवान: = परवाना [222] 

       करीन: = करीना  [22 ]

और ऐसे ही  बहुत से हज़ारो लफ़्ज़


मेरे मित्र को इसी बात पर शंका थी और उन्हे 

इरादा--और वा’द: हमक़ाफ़िया नही लग रहा था।

  ऐसे शब्द कभी- 21- की हैसियत रखते है तो कभी 22 की--जैसी बह्र और अर्कान की डिमांड हो।

इक़बाल साहब ने [ क़रीना ]और शाकिर साहिबा ने [वादा ] अपनी  ग़ज़ल में इसे -22- पर बरता है ।

एक बात और--


चूंकि ग़ज़ल उर्दू की विधा है- बह्र-वज़न -रुक-अर्कान अरूज़ आदि सब उर्दू से ही प्रतिपादित है

तो थोड़ा बहुत उर्दू व्याकरण -इमला आदि की भी जानकारी हो तो बेहतर।


 [ इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी

निशानदिहि फ़रमा दें ताकि मैं खुद को दुरुस्त कर सकूँ

-सादर-

-आनन्द.पाठक ’आनन-

8800927181

Friday, September 18, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 143 :बह्र-ए-मुज़ारे’ 221--2121--1221---212 पर एक चर्चा [ भाग-3] और अन्तिम

 चर्चा भाग-3 [अन्तिम]

मित्रो ! 

इस लेख शृंखला के भाग -1 में तस्कीन-ए-औसत और तख़निक़ के अमल की चर्चा की थी

जिसमें यह भी कहा था कि इन दोनों का अमल मुज़ाहिफ़ बह्र पर ही होता है -सालिम बह्र पर नहीं।

सवाल यह कि सालिम बह्र पर क्यों नहीं होता या क्यों नहीं हो सकता? अगर सालिम बह्र पर अमल कर दिया तो क्या होगा क्या कबाहत [ मुश्किल] है कि सालिम बह्र पर इसका अमल मुमकिन नहीं।

आज इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे।

आप जानते है कि उर्दू शायरी में 7- सालिम बह्रें प्रचलन में है जिसका बुनियादी रुक्न निम्नलिखित है

1- मुतक़ारिब = फ़ऊलुन =122

2- मुतदारिक = फ़ाइलुन =212

3- हज़ज    = मफ़ाईलुन =1222

4- रमल    = फ़ाइलातुन =2122

5- रजज़    = मुसतफ़इलुन =2212

6- कामिल  = मुतफ़ाइलुन =11212

7- वाफ़िर   = मफ़ाइलतुन = 12112

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अगर आप ग़ौर से देखें तो सभी अर्कान के अन्त में -2- आ रहा है यानी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [मुतहर्रिक+साकिन] आ रहा है यानी सभी रुक्न के अन्त में -नून साकिन- हर्फ़ आ रहा है। सालिम बह्र होगी तो अगला रुक्न ’मुतहर्रिक’ से ही शुरु होगा। यानी दो adjacent Rukn मे [आमने सामने रुक्न में] में मुतहारिक+साकिन+मुतहर्रिक हर्फ़ ही हासिल होगा। यानी तीन मुतहर्रिक मुतस्सिल[लगातार ] एक साथ आ ही नहीं सकता तो फिर तखनिक का अमल होगा कैसे? होगा कहाँ?

यही कारण है कि सालिम बह्र पर तख़निक़ का अमल नही होता या यूँ कहें कि नहीं हो सकता।

 तो सालिम बह्र पर तस्कीन-ए-औसत के अमल का क्या

वह भी देख लेते हैं

ऊपर के अर्कान में सिर्फ़ दो-रुक्न ऐसे है जिसके ’एकल रुक्न" में तीन मुतहर्रिक एक साथ आते हैं। और वह है

कामिल  =11212

वाफ़िर =12112 

कामिल की सालिम मुसम्मन बह्र

= 11212---11212---11212---11212- अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल करें तो

=  2212 ---2212---2212----2212

=  बह्र-ए-रज़ज = यानी बह्र ही बदल गई

यानी चले थे कामिल से--अमल करते करते पहुंच गए रज़ज में

सब कि इस अमल में बहर न बदले की मनाही है

यही कारण है कि सालिम बह्र में तस्कीन-ए-औसत का भी अमल नहीं हो सकता।

यही बात वाफ़िर के साथ भी है। आप खुद कर के चेक कर सकते है।

चलते चलते एक बात और--

कुछ लोग Loosely and Casually यह कह देते है कि शायरी में 1-1 को 2 लिया जा सकता है

जी हाँ लिया जा सकता है लेकिन हमेशा नहीं, कुछ विशेष परिस्थितियों में ही। और वो विशेष स्थिति यही है।

 एक सवाल --तो क्या -2- को 1-1 लिया जा सकता है? 

सोचिएगा।

 वार्ता समाप्त

-आनन्द.पाठक’आनन’-

8800927181