उर्दू बह्र पर एक बात्चीत :क़िस्त 148 : रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [भाग -3] -अन्तिम क़िस्त
पिछली क़िस्त में हमने रुबाई और क़ता पर एक चर्चा की थी ।आज इस क़िस्त में -मुक्तक-पर विचार करेंगे।
मुक्तक का शाब्दिक अर्थ तो ’मुक्त’ करने वाला होता है पर साहित्यिक सन्दर्भ मेंवह 4-लाइन की रचना जो ’छन्द या बह्र विशेष से मुक्त हो, अर्थ और भाव कीदूष्टि से स्वतन्त्र अस्तित्व का हो। बह्र विशेष का आशय यहाँ रुबाई की तरह इशारा है
हम जानते हैं कि रुबाई की अपनी एक ख़ास[विशेष] बह्र होती है जो बह्र-ए-हज़ज से निकलती है औरइसके 24- वैकल्पिक औज़ान [ वज़न का बहुवचन] होत्ते हैं। रुबाई के मिसरे इन्हॊ 24-वज़न के किसी न किसी वज़न मेंही होंगे । यह एक लाज़िमी शर्त है ,बंधन है या बंदिश है।
मगर ’मुक्तक’ में ऐसी कोई बंदिश नहीं ,मुक्त है ऐसी किसी बंदिश से। इसीलिए ’मुक्तक है। आप ग़ज़ल के किसी भी मान्य बह्र और वज़न मेंमुक्तक कह सकते है। कभी कभी इसे ’चौपदे’ या चतुष्पदी भी कहते हैं । मगर मुक्तक ज़ियादा ही लोकप्रिय शब्द है
प्रचलन में है। आजकल हर कवि सम्मेलन के पहले कवि या शायर मुक्तक सुनाना पसंद करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि यह नाम गोपाल दास” नीरज’ जी का दिया हुआ है।
मुक्तक की बुनावट, कुछ कुछ रुबाई और क़ता ही जैसी होती है।
चार पंक्तियों की वह स्वतन्त्र रचना जिसमें पूर्ण अर्थ और एकल भाव हो, पहली ,दूसरी और चौथी पंक्ति सानुप्रास[ तुकान्त] हो विशिष्ट लय में निबद्ध हो और चौथी लाईन विशिष्ट गम्भीरता लिए हुए हो-मुक्तक कह सकते है ।
हिंदी के बहुत से साहित्यकारों ने इस विधा में अपने अपने मुक्तक कहे और लिखे हैं जिसमें-गोपाल दास नीरज बलबीर सिंह रंग, शिशुपाल सिंह ’शिशु’, शमशेर बहादुर सिंह, शेर जंग गर्ग .नन्दलाल पाठक आदि बहुत से लोग।
यहां उदाहरण के तौर पर कुछ मुक्तक अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप भी आनन्द उठाएं~
अय्याम-ए-गुजिश्तां की निशानी दे दे
कुछ गुंच-0-शबनम की जुबानी दे दे
माना की मुसीबत है सरासर लेकिन
इक बार मुझे और जवानी दे दे ।
- महेन्द्र सिंह बेदी ’ सहर’-
ग़ैर को आशना समझ बैठा
क्या समझना था क्या समझ बैठा
था मेरे डूबने का राज़ यही
नाख़ुदा को ख़ुदा समझ बैठा।
- सरदार होशयारपुरी-
मन बहुत अनमना है चले आइए
गीत की प्रार्थना है चले आइए
आँसुओं के उमड़ते हुए छंदे में
मौन की व्यंजना है चले आइए ।
-डा0 कुँअर बेचैन-
हर बशर साधू नहीं है, हर बशर गाँधी नहीं है
वस्त्र हर रेशम नहीं हैं , सूत हर खादी नहीं है
नीति की लेकर कसौटी मत कसॊ इन्सान को
आदमी है आदमी , सोना नहीं, चाँदी नही हैं ।
-गोपाल दास नीरज-
और चलते चलते अपना भी एक मुक्तक पेश कर रहा हूँ .बर्दास्त कर लें--
हो भले तीरगी, रास्ता पुरख़तर
दूर मंज़िल न आती कहीं हो नज़र
हम चिराग़ों का क्या है जहाँ भी रखो
हम वहीं से करें रोशनी का सफ़र ।
-आनन्द पाठक ’आनन’-
यह चर्चा और यह श्रॄंखला यही समाप्त कर रहा हूं।
अब आप तय करें कि आप क्या कहना लिखना चाहेंगे---रुबाई --क़ता--मुक्तक-
पाठकों से सविनय निवेदन है कि अगर कुछ ग़लत लिख गया हो तो निशानदिही ज़रूर करें ताकि
मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ
आप अपनी राय ज़रूर बताएइएगा।
सादर
-आनन्द.पाठक ’आनन’-