उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : 221--2121--1221--212 पर एक चर्चा
[यह आलेख उनके लिए है जो अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं और अरूज़ से जौक़-ओ-शौक़फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ]
मेरे एक मित्र ने अपनी ग़ज़ल का एक मतला बाँधा -
हर शै के दाम तय हुए बाज़ार के बग़ैर
हमने कही कहानियाँ किरदार के बग़ैर ।
[ आगे के अश’आर में - के बग़ैर- रदीफ़ क़ायम रखा गया ]
मित्र ने इस मतले का वज़न 221--2121---1221---212 लिखा [ बह्र का नाम नहीं लिखा]
यह बहुत ही मानूस और मक़्बूल [ परिचित और लोकप्रिय ] बह्र है सब लोग इस बह्र का नाम जानते है
और अमूमन सभी शो’अरा नें इस बह्र में शायरी की है।
इस बह्र का नाम है ---
बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ और अर्कान के नाम हैं
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु--मफ़ाईलु--फ़ाइलुन
ख़ैर
अगर मतला को आप ध्यान से देखें तो अर्कान 221---2121--1221--212{ 1) ठहरता है।
तो क्या 2121 को 212 कहना उचित ठहरता है? आज इसी पर विचार करेंगे।
मित्र की [ और अन्य मित्रों की भी] धारणा है या मान्यता है --""मिसरा के अन्त में 1+ की छूट जायज है।
[Poetic Liscence] है। आज इसी पर भी विचार करते है
आप 212 और 2121 [ जो शे’र के अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर है] में क्या फ़र्क़ है?
212 --हज़्फ़ ज़िहाफ़ के अमल से "महज़ूफ़" है 2122 का और नाम है --फ़ाइलुन-
212[1] - कस्र ज़िहाफ़ के अमल से " मक्सूर" है 2122 का और नाम है --म्फ़ाइलान -
दोनो हॊ रेगुलर ज़िहाफ़ है अत: दो अलग अलग नाम भी होगा --
मेरे एक मित्र ने अपनी ग़ज़ल का एक मतला बाँधा -
हर शै के दाम तय हुए बाज़ार के बग़ैर
हमने कही कहानियाँ किरदार के बग़ैर ।
[ आगे के अश’आर में - के बग़ैर- रदीफ़ क़ायम रखा गया ]
मित्र ने इस मतले का वज़न 221--2121---1221---212 लिखा [ बह्र का नाम नहीं लिखा]
यह बहुत ही मानूस और मक़्बूल [ परिचित और लोकप्रिय ] बह्र है सब लोग इस बह्र का नाम जानते है
और अमूमन सभी शो’अरा नें इस बह्र में शायरी की है।
इस बह्र का नाम है ---
बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ और अर्कान के नाम हैं
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु--मफ़ाईलु--फ़ाइलुन
ख़ैर
अगर मतला को आप ध्यान से देखें तो अर्कान 221---2121--1221--212{ 1) ठहरता है।
तो क्या 2121 को 212 कहना उचित ठहरता है? आज इसी पर विचार करेंगे।
मित्र की [ और अन्य मित्रों की भी] धारणा है या मान्यता है --""मिसरा के अन्त में 1+ की छूट जायज है।
[Poetic Liscence] है। आज इसी पर भी विचार करते है
आप 212 और 2121 [ जो शे’र के अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर है] में क्या फ़र्क़ है?
212 --हज़्फ़ ज़िहाफ़ के अमल से "महज़ूफ़" है 2122 का और नाम है --फ़ाइलुन-
212[1] - कस्र ज़िहाफ़ के अमल से " मक्सूर" है 2122 का और नाम है --म्फ़ाइलान -
दोनो हॊ रेगुलर ज़िहाफ़ है अत: दो अलग अलग नाम भी होगा --
[अ ] 221---2121---1221--212 = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
[ब] 221---2121---1221--212(1) = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्सूर
यह दोनों हॊ रेगुलर बह्र हैं मान्य बह्र है और अरूज़ के ऐन मुताबिक से हासिल हुए हैं।’
यह बात अलग है कि अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो -महज़ूफ़ या मक्सूर- दिख रहा है इनका आपस में ख़्ल्त जायज है यानी इनका आपस में अदला बदली किया जा सकता है ।
मगर कब?
बह्र के नाम का निर्धारण --मतला के मिसरा सानी से ही तय होता है और जब आप ने मिसरा सानी में मक्सूर [2121] बाँध ही दिया है तो फ़िर
इसका वज़न -212-[ अरूज़/जर्ब] दिखाने का कोई मतलब ही नही।
हाँ अगर आप 212--लाना ही चाहते है तो अब मिसरा ऊला में ही लाया जा सकता है -जो जायज भी है और अलाऊ भी है ।
ठीक इसका उल्टा केस भी सोचें--
अगर मतला के मिसरा सानी में -212--बाँधा है तो --फ़िर मिसरा उला ही बचा जहाँ आप 2121 ला सकते हैं -जो जायज भी है और अलाऊ भी है
क्यों कि मिसरा सानी से बहर फ़िक्स हो गई --रदीफ़ क़ायम हो गया --तो फिर जो भॊ अदल-बदल करना होगा वह मिसरा ऊला में होगा। सानी में नहीं।
मिसरा के आख़िर में जो एक हर्फ़ बढ़ाने की [1+] बात है --उस पर अलग से अगली क़िस्त में चर्चा करेंगे।
[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही
ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
सादर
-आनन्द.पाठक ’आनन’-