Tuesday, September 22, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 144 : चर्चा : वा’दा -इरादा- जैसे क़ाफ़िया -पर एक चर्चा

 

क़िस्त : वा’दा -इरादा- जैसे  क़ाफ़िया  -पर एक चर्चा

किसी  मंच पर मेरे एक मित्र ने परवीन शाकिर का एक मतला लिखा--

उसने भी लौटने का इरादा नही किया

हमने भी भूल जाने का वा’अद: नहीं किया।---परवीन शाकिर


और सवाल किया कि मतले का क़ाफ़िया क्या ठीक है?

मेरे एक अन्य मित्र  ने क़ाफ़िया [और इस ग़ज़ल का दिगर कवाफ़ी--

यानी लबादा--बादा--ज़ियादा--सादा-- वग़ैरह] को दुरुस्त ठहराया।

मेरे मित्र का सवाल था क्यों और कैसे?

आज की चर्चा इसी सवाल पर।

---

इक़बाल साहब का एक शे’र है=--

ख़ामोश ऎ दिल! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा

अदब पहला क़रीना है , मुहब्बत के क़रीनों  में ।‘-अल्लामा इक़बाल

[इस ग़ज़ल की बह्र है -1222---1222--1222--1222]


यानी -क़री्ना और क़रीनो- दोनों का वज़न -122- है।

साथ ही कुछ और दीगर  शब्द  ख़याल में रखें  जैसे--पर्दा--परवाना --आदि।

 ये सभी शब्द [और ऐसे हज़ारो शब्द [उर्दू-अरबी-फ़ारसी में ] के इमला में

आख़िरी हर्फ़ हा-ए-हूज़ [छोटॊ -हे-यानी गोल -हे-आती है} से लिखे जाते हैं।

[मैं यहाँ --उर्दू हा-ए-हुत्ती[ बड़ी हे] --हा-ए- हूज़ , हा-ए-हूज़ की कितनी किस्में होती हैं

हा-ए-मल्फ़ूज़ी--हा-ए-मख्फ़ूफ़ी--दो चश्मी हे-आदि , इनके शब्द पर क्या असरात होते हैं--discuss -नहीं करूँगा -ये उर्दू व्याकरण का विषय है और विस्तार में यहां discuss करने से विषय बोझिल और दुरूह हो जाएगा]

संक्षेप में आप यह समझ लें--


[क[-- जिस लफ़्ज़ के आखिर में हा-ए-हूज़ [ छोटी हे] लगी हो वो अपने पहले आने वाले हर्फ़ को

    मुतहर्रिक[1] कर देता  है।

जैसे वा’दा = वा’द: [21]

    पर्दा  =  पर्द:  [21]

    परवाना= परवान: [21]

    क़रीना = क़रीन: [21]


[ख] -हा-ए-हूज़ की आवाज़ कुछ कुछ -अलिफ़ की आवाज़- के समान होता है । अगर इस को खींच कर [तवील कर] पढ़ा जाए तो--आ- की आवाज़ सुनाई देगा

       जैसे

वा’द: =  वादा [22]

  पर्द: =    पर्दा [22]

       परवान: = परवाना [222] 

       करीन: = करीना  [22 ]

और ऐसे ही  बहुत से हज़ारो लफ़्ज़


मेरे मित्र को इसी बात पर शंका थी और उन्हे 

इरादा--और वा’द: हमक़ाफ़िया नही लग रहा था।

  ऐसे शब्द कभी- 21- की हैसियत रखते है तो कभी 22 की--जैसी बह्र और अर्कान की डिमांड हो।

इक़बाल साहब ने [ क़रीना ]और शाकिर साहिबा ने [वादा ] अपनी  ग़ज़ल में इसे -22- पर बरता है ।

एक बात और--


चूंकि ग़ज़ल उर्दू की विधा है- बह्र-वज़न -रुक-अर्कान अरूज़ आदि सब उर्दू से ही प्रतिपादित है

तो थोड़ा बहुत उर्दू व्याकरण -इमला आदि की भी जानकारी हो तो बेहतर।


 [ इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी

निशानदिहि फ़रमा दें ताकि मैं खुद को दुरुस्त कर सकूँ

-सादर-

-आनन्द.पाठक ’आनन-

8800927181

Friday, September 18, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 143 :बह्र-ए-मुज़ारे’ 221--2121--1221---212 पर एक चर्चा [ भाग-3] और अन्तिम

 चर्चा भाग-3 [अन्तिम]

मित्रो ! 

इस लेख शृंखला के भाग -1 में तस्कीन-ए-औसत और तख़निक़ के अमल की चर्चा की थी

जिसमें यह भी कहा था कि इन दोनों का अमल मुज़ाहिफ़ बह्र पर ही होता है -सालिम बह्र पर नहीं।

सवाल यह कि सालिम बह्र पर क्यों नहीं होता या क्यों नहीं हो सकता? अगर सालिम बह्र पर अमल कर दिया तो क्या होगा क्या कबाहत [ मुश्किल] है कि सालिम बह्र पर इसका अमल मुमकिन नहीं।

आज इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे।

आप जानते है कि उर्दू शायरी में 7- सालिम बह्रें प्रचलन में है जिसका बुनियादी रुक्न निम्नलिखित है

1- मुतक़ारिब = फ़ऊलुन =122

2- मुतदारिक = फ़ाइलुन =212

3- हज़ज    = मफ़ाईलुन =1222

4- रमल    = फ़ाइलातुन =2122

5- रजज़    = मुसतफ़इलुन =2212

6- कामिल  = मुतफ़ाइलुन =11212

7- वाफ़िर   = मफ़ाइलतुन = 12112

----

अगर आप ग़ौर से देखें तो सभी अर्कान के अन्त में -2- आ रहा है यानी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [मुतहर्रिक+साकिन] आ रहा है यानी सभी रुक्न के अन्त में -नून साकिन- हर्फ़ आ रहा है। सालिम बह्र होगी तो अगला रुक्न ’मुतहर्रिक’ से ही शुरु होगा। यानी दो adjacent Rukn मे [आमने सामने रुक्न में] में मुतहारिक+साकिन+मुतहर्रिक हर्फ़ ही हासिल होगा। यानी तीन मुतहर्रिक मुतस्सिल[लगातार ] एक साथ आ ही नहीं सकता तो फिर तखनिक का अमल होगा कैसे? होगा कहाँ?

यही कारण है कि सालिम बह्र पर तख़निक़ का अमल नही होता या यूँ कहें कि नहीं हो सकता।

 तो सालिम बह्र पर तस्कीन-ए-औसत के अमल का क्या ? 

वह भी देख लेते हैं

ऊपर के अर्कान में सिर्फ़ दो-रुक्न ऐसे है जिसके ’एकल रुक्न" में तीन मुतहर्रिक एक साथ आते हैं। और वह है

कामिल  =11212

वाफ़िर =12112 

कामिल की सालिम मुसम्मन बह्र

= 11212---11212---11212---11212- अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल करें तो

=  2212 ---2212---2212----2212

=  बह्र-ए-रज़ज = यानी बह्र ही बदल गई

यानी चले थे कामिल से--अमल करते करते पहुंच गए रज़ज में

सब कि इस अमल में बहर न बदले की मनाही है

यही कारण है कि सालिम बह्र में तस्कीन-ए-औसत का भी अमल नहीं हो सकता।

यही बात वाफ़िर के साथ भी है। आप खुद कर के चेक कर सकते है।

चलते चलते एक बात और--

कुछ लोग Loosely and Casually यह कह देते है कि शायरी में 1-1 को 2 लिया जा सकता है

जी हाँ लिया जा सकता है लेकिन हमेशा नहीं, कुछ विशेष परिस्थितियों में ही। और वो विशेष स्थिति यही है।

 एक सवाल --तो क्या -2- को 1-1 लिया जा सकता है? 

सोचिएगा।

 वार्ता समाप्त

-आनन्द.पाठक’आनन’-

8800927181



उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 142:बह्र-ए-मुज़ारे’ 221--2121--1221---212 पर एक चर्चा [ भाग-2]

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त     [ भाग -2]

पिछली क़िस्त [भाग-1]  में बह्र-ए-मुज़ारे’ पर चर्चा चल रहा था और उस पर तखनिक़ के अमल की भी बात हो रही थी। उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए--

-A-------B----------C----------D

221-   --2121----1221---    212

[ बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मफ़ज़ूफ़ ]

पर अगर तख़निक़ का अमल किया जाए तो क्या हासिल होगा? कारण कि  

---B----और ------C---- दो adjacanet Rukn [आमने सामने के रुक्न ] पर 

तीन मुतहर्रिक हर्फ़ (1-1-1) एक साथ मुतस्सिल [ लगातार]  आ गए हैं तो ’तख़्निक़ ’ का अमल हो सकता है और इस तरीके से निम्न लिखित वज़न बरामद हो सकती है ।

[X]  221---2122----221----212-

------- -----   ---- 

  अब दूसरा तरीक़ा भी देख लेते हैं--

मुज़ारे’ एक मुरक़्क़ब बहर है जो दो सालिम रुक्न से मिल कर बनता है और उसका बुनियादी रुक्न

1222----2122 होता है।

 और  इसकी मुसम्मन शकल

 1222---2122---1222---2122- होती है}

अब इन अर्कान पर खर्ब  और हज़्फ़ का ज़िहाफ़ लगाएँ तो --

1222 + खर्ब = अख़रब 221

2122         = सालिम शकल 2122 [ no zihaaf]

2122 + हज़्फ़   = महज़ूफ़ 212

तो निम्न लिखित  वज़न बरामद हो सकती है

[Y] 221----2122----221---212

[ मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब ,सलिम,अख़रब, महज़ूफ़ ]

कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब ने इसे एक Independent बह्र के रूप में माना है।

----- ------- ---- 

अब आप दोनॊ वज़न [X] and [Y] दोनों को  compare कीजिए । दोनो वज़न same है पर हासिल करने के तरीक़े अलग अलग हैं।

[X]  तखनिक़ के अमल से हासिल हुआ है जो मुज़ाहिफ़ बह्र पर अमल किया जा सकता है। आखिर रुबाई और मीर की बह्र में किया ही जाता है।

जब कि 

[Y] मुज़ारे’ मुसम्मन पर वाज़िब ज़िहाफ़ लगाने से हासिल हुआ है। 

तो फिर--

[Y] को आप ग़ौर से देखें तो अख़रब [221] दोनो मुक़ाम सदर और हस्व पर आया है । आरिफ़ हसन खाँ साहब का मानना है  कि खर्ब ज़िहाफ़ एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो सदर/इब्तिदा के लिए ही मखसूस हैं --हस्व के मुकाम के लिए नहीं [और मैं इससे मानता हूँ]  अत: मेरे खयाल से [Y] का तरीका  सही नहीं लगता 

जब कि  [X]   के तरीके [ तखनिक़ के अमल में] कोई कमी नहीं, कोई खिलाफ़वर्ज़ी भी नहीं।

अत: मेरे हिसाब से और मेरे ख़याल से  221--2121---1221--212 पर तख़्निक का अमल किया जा सकता है।

्यानी 2121 को 2122 लिया जा सकता है। खयाल रहे यह - 2122--सालिम रुक्न नहीं बल्कि तखनिक़ के अमल से हासिल हुआ हौ अत: यह मुख़न्निक़ है।

क्रमश: --चर्चा जारी है --

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181


उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 141: बह्र-ए-मुज़ारे’ 221--2121--1221---212 पर एक चर्चा [ भाग-1]

क़िस्त 141 : बह्र-ए-मुज़ारे’  221--2121---1221---212 पर एक चर्चा

इस बह्र का नाम -मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ है।

किसी  मंच पर मेरे एक मित्र ने एक मतला कहा जिसका

 मिसरा उला =221--2121---1221--212 में था

मिसरा सानी  = 221--2122--221---212 में था।

सवाल यह है कि  क्या यह तरक़ीब सही है? 

आज इसी पर चर्चा करेंगे।

 क्या ऊपर दी हुई तरक़ीब सही है?

मित्र ने शायद इसमे ’तख़्निक़’ के अमल का सहारा लिया होगा और इस केस में उचित समझा होगा।

यानी 

-A-  ---B--      --C---  --D-

221--2121---1221--212  के रुक्न  B & C  तख़निक़ का अमल करें तो ज़रूर निम्न लिखित

221---2122---221--212 ्वज़न प्राप्त होगा।

सवाल यह कि क्या यह अमल इस बह्र में सही होगा ?

[ वैसे तखनिक़ और तस्कीन के अमल के बारे में विस्तार से मैने इसी ब्लाग पर क़िस्त  50,60,76 में लिख चुका हूँ  आप चाहें तो वहाँ पढ़ सकते है समझ सकते हैं। फिर भी यहाँ संक्षेप में एक बार फिर लिख रहा हूँ।

तस्कीन-ए-औसत का अमल =

 अगर किसी मुज़ाहिफ़ बह्र के एक रुक्न में [Single Rukn meN] तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ 

 [मुतस्सिल] आ जाएँ तो बीच वाला[औसत वाला] मुतहर्रिक हर्फ़ साकिन किया जा सकता है यानी may be, may not be] जैसे 

212---212---212---212- पर ख्ब्न ज़िहाफ़ ्के अमल से एक मुज़ाहिफ़ बह्र

 112---112--112--112 बरामद होती है [ 2= मुतहर्रिक+ साकिन =सबब ]

यानी 112 में तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक ही रुक्न [एकल रुक्मेंन]   एक साथ [ मुतस्सिल] आ गए तो औसत वाला हर्फ़ साकिन किया जा सकता है। यानी एक रुक्न पर अमल करें या किसी रुक्न पर अमल करें या एक ही साथ सभी रुक्न पर  अमल करे--मरजी आप की।

तो मैं सभी अर्कान ्पर एक साथ अमल कर रहा हूँ देखते हैं  क्या होता है।

यानी

22----22----22---22  हासिल होगा और बहुत से मेरे मित्र इसे मीर की बह्र समझ लेते है और अगर आप इसका मुज़ाइफ़ [ दो गुना ] कर दे यानी 22--22--22--22-// 22--22--22--22 बरामद होगा तो फिर इसे मीर की बह्र कह देने में कोई झिझक भी नही होती  जब कि यह मीर की बह्र नहीं है।

यही वज़न मैं  बहर-ए-मुतक़ारिब से भी हासिल कर सकता हूँ। 

इसी लिए मैं बार बार कहता हूँ कि किसी ग़ज़ल में सिर्फ़ 

22--22--22--22- लिखने से ही काम नहीं चलेगा ।अगर आप लिख रहे हैं तो बताएँ कि यह वज़न आप ने मुतदारिक से हासिल किया है या मुतक़ारिब से। ख़ैर।

 तख़्निक़ का अमल :=

 अगर किसी मुज़ाहिफ़ बह्र के दो adjacent Rukn [यानी आमने-सामने वाले रुक्न में ] तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ [ मुतस्सिल] आ जाएँ तो बीच वाला मुतहर्रिक हर्फ़ साकिन किया जा सकता है यानी may be, may not be।

इस का अमल रुबाई की बह्र, मीर की बह्र में खूब किया जाता है। और मीर के बह्र का एक वज़न 

22--22--22--22-// 22--22--22-2  भी बरामद होता है । ख़ैर।

तो मेरे मित्र ने यही अमल शायद अपने मतला के मिसरा सानी में कर दिया

तो  221---2122--221--212 बरामद हुआ। 

 ज़रा  ठहरिए 

इस अमल के साथ एक दो राइडर [शर्त ,क़ैद, बंधन’] भी है

- ये दोनो अमल मुज़ाहिफ़ बह्र पर ही होते है} सालिम बह्र/रुक्न पर नहीं होता [ इस पर आगे चर्चा करेंगे]

- इस बह्र के अमल से मूल बह्र[ जिस पर अमल किया किया जा रहा है] ही न कहीं बदल जाए।

यह बात ध्यान में रखने की ज़रूरत है।

क्रमश:

[ चर्चा जारी है----]

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

8800927181

Friday, August 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 140: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा

चर्चा : साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा
मेरे एक मित्र ने एक ’क़ता’[क़िता’] लिखा और उसका वज़न लिखा--
22--22--22--2
और जानना चाहा कि ’साढ़े तीन’ रुक्न पर यह क़ता हुआ कि नहीं ?
यह चर्चा इसी ’साढ़े-तीन’ रुक्न पर है।
----
मित्र ने -22- को शायद एक रुक्न मान लिया और -2- को आधा रुक्न समझ लिया होगा ।
आप जानते है-
-रुक्न या तो सालिम होगा [अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] या फिर मुज़ाहिफ़ [ ज़िहाफ़ शुदा ] होगा अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] उसका नाम भी होगा।कोई रुक्न ’ अपने पूरे शकल और वज़न में होता है। आधा --डेढ़ा--पौना--ढैया-- नही होता।
चाहे 2 हो, 22 हो, 222 हो, ये सब Independent रुक्न है वज़न है और इनके नाम भी हैं। हम यह नहीं कह सकते कि -2- रुक्न -22- का आधा है या 222 का एक तिहाई है।
112---1212---121---12--1122- आदि-ये सब रुक्न किसी न किसी सालिम रुक्न के मुज़ाहिफ़ शकल है और अपनी Independent हैसियत रखते है। ये किसी सालिम रुक्न के न अद्धा है न पौना।
एक स्थिति की कल्पना कीजिए
22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसद्दस बह्र।
22-22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसम्मन बह्र।
तो
22-22-22-2 को आप क्या कहेंगे?
डेढ मुसद्दस या साढ़े मुसद्दस या पौना मुसम्मन?
यह भी एक मुसम्मन बह्र ही होगी। अद्धा--डेढ़ा--पौना रुक्न नही ।
इस -"साढ़े तीन रुक्न"-पर मित्र का अगला तर्क था-तो -फिर मीर की बहर साढ़े सात रुकनी और साढ़े पांच रुकनी क्यूँ कहते हैं ?
मेरा जवाब था--भाई मैं तो नहीं कहता। अरूज़ की किताब भी यह बात नहीं कहती। कौन लोग कहते हैं ,मालूम नहीं। वैसे हर मोड़ पर
किरदार बहुत हैं, कहते होंगे।
मीर की बह्र हमेशा 16-रुक्नी होती है और उसकी मूल बह्र यूँ होती है--
21-121-121-122// 21-121-121-12 यानी 16//14
इसमें तो कही साढ़े सात या साढ़े पाँच रुक्न दिखाई नहीं दे रहा है
बाएँ साइड मे-4 रुक्न और दाएँ साइड में भी -4 रुक्न यानी एक मिसरा में -8- रुक्न मुकम्मल दिखाई दे रहा है।
ख़ैर
-2- का नाम -फ़ा- भी और फ़े’अ भी [ फ़े-ऐन बसकून यानी -ऎन साकिन ] हो सकता है। यह सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है।
एक दिलचस्प बात और --इन अर्कान को अरबी में -अफ़ाइल-[फ़े’ल -यानी फ़े--एन---लाम ] भी कहते है॥
क्यों?
क्यों कि हमारे जितने भी सालिम या मुज़ाहिफ़ रुक्न हैं उनके नाम में--उसमें इन 3-हर्फ़[ फ़े--एन---लाम] में से -2- हर्फ़ ज़रूर मिलेंगे।
चाहे वह फ़ऊल [122] हो---फ़ाइलुन [212] हो -मुस्तफ़इलुन [2212] हो या कोई और।--फ़े-एन-लाम में से कोई न कोई 2 हर्फ़ ज़रूर आप को मिलेगा।
न हो तो आप चेक कर लें। यहाँ तक कि -222--[ मफ़-ऊ-लुन ] भी ।
यही बात मुज़ाहिफ़ रुक्न में भी है। ज़िहाफ़ लगाने से सालिम रुक्न की शक्ल-ओ-सूरत बदल जाती है कतर-ब्योंत हो जाती है तो फिर उसे किसी standard मान्य और मानूस रुक्न से बदल लेते हैं जिसमें -फ़े--एन---लाम में से कोई -2- हर्फ़ ज़रूर हो
।
इसीलिए मैन -2- को फ़े-अ’ [ ऐन साकिन] लिखा। हालाँकि -फ़ा [2] भॊ कोई बुरा नहीं है।
[ मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लतबयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी निशानदिही फ़रमाएँ कि यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके।
सादर
-आनन्द पाठक-’आनन’-

Thursday, August 6, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 139: वतद-ए-मौक़ूफ़ [ ---- क़िस्त 138 से आगे]

 

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 139: वतद-ए-मौक़ूफ़ [ ---- क़िस्त 138 से आगे]


पिछली क़िस्त [चर्चा 004]  में वतद [ 3-हर्फ़ी ] शब्द पर चर्चा की थी जिसमे वतद-ए-मजमुआ और वतद-ए-मौक़ूफ़

पर विशेष चर्चा की थी।

आप जानते है कि वतद-ए-मजमुआ [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] वाले 3-हर्फ़ी शब्द का वज़न 1 2 होता है

जैसे --शजर--सहर--मरज-- अगर--्लहर --आदि

कभी आप ने सोचा है कि इन सबका वज़न 1 2 ही क्यॊ होता है - 1 1 1 - क्यों नहीं होता। आज इसी पर चर्चा करेंगे

जैसा कि पहले ही मैं बता चुका हूँ कि उर्दू ज़बान की हैय्यत [ बनावट] ही ऐसी है कि पहला हर्फ़ मुतहर्रिक और आख़िरी हर्फ़  by default  या लाज़िमन साकिन ही होता है ।

वतद-ए-मजमुआ में आप देख रहे है कि [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] में आख़िरी हर्फ़ साकिन है ही।

एक बात और -[ घड़ी भर के लिए आप कल्पना कर लें --बस कल्पना ही करें आगे और कुछ नही-हा हा हा😆😆 

मुतहर्रिक हर्फ़ --नर और साकिन हर्फ़ -मादा। तो बात समझने में कुछ आसानी हो जाएगी। इत्तिफ़ाक़न यहाँ साकिन वामांगी भी है हिंदी के लिहाज़ से ]😅😅

जब एक मुतहर्रिक हर्फ़ पास वाले साकिन हर्फ़ से मिलता है तो जोड़ा बना लेता है-2- बना लेता है [एक मन-दो बदन] जिसे अरूज़ की भाषा में --सबब- [सबब-ए-ख़फ़ीफ़] कहते है।

ख़फ़ीफ़ क्यों? अरे भाई जिसके बगल में -मादा-खड़ी हो उसकी आवाज़ ख़फ़ीफ़ ही निकलेगी मेरी तरह मीऊँ मीऊँ।

तो मुतहर्रिक का क्या हुआ ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|

वतद-ए-मजमुआ = [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन]= मुतहर्रिक +[ मुतहर्रिक+साकिन]

                    = मुतहर्रिक + सबब=    1 2

इसी लिए वतद-ए-मुजमुआ शब्द का वज़न 1 2 आता है या लिया जाता है। 

अब इसी समूह के कुछ शब्द देखते है--[ ख़याल रहे आख़री हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा]

ख़बर = ख़+बर  =1 2

अबद= अ+बद  = 1 2 [ हमेशा]

हरज = ह+ रज = 1 2 [ क्या हरज है?

सफ़र = स+ फ़र = 1 2 [ ज़िंदगी का सफ़र]

ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़----

ठीक यही बात वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन ] के साथ है -

वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन

                = [ मुतहर्रिक+साकिन] + साकिन 

                = सबब+ साकिन= 2 1 

फिर आख़िर वाले साकिन का क्या हुआ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|

अब कुछ शब्द वतद-ए-मौक़ूफ़ के देखते हैं--ख़याल रहे आख़िरी हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा--और दूसरे मुक़ाम वाला  हर्फ़ भी साकिन [स्वर रहित] है

अस्ल = अस+ ल = 2 1 = ओरिजनल

कब्र  = कब +र    = 2 1 

जुर्म  = जुर  +म    =2 1  [ अपराध]

सर्द  = सर +द    = 2 1  [ ठंडा]

ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़

यही कारण है कि वतद-ए-मौक़ूफ़ वाले शब्द 2 1 के वज़्न पर आते हैं या लिए जाते हैं।

आप ने देखा -1- दोनो ही हर्फ़ के लिए प्रयोग हुआ --हर्फ़ चाहे मुतहर्रिक हो या साकिन। इसी लिए 1 2 12 जैसी

अलामात  अफ़ाइल दिखाने के लिए बहुत मुफ़ीद या full proof व्यवस्थ   नहीं मानते हैं।

 ख़ैर।

अब आगे बढ़्ते है। ऐसा नहीं कि उर्दू में सिर्फ़ 2-हर्फ़ी या 3- हर्फ़ी शब्द ही होते हैं। चार हर्फ़ी शब्द भी होते है जिसे

अरूज़ की भाषा में फ़ासिला कहते  हैं -विशेष रूप से फ़ासिला सुग़्रा।  अगरचे इस की ज़रूरत आप को पड़ेगी नहीं मगर जानने में क्या बुराई। अर्कान का काम वतद और सबब की जानकारी से ही चल जाएगा। अब चूँकि अरूज़ियों ने परिभाषा गढ़ दी तो चर्चा कर ही लेते हैं।

फ़ासिला के दो शब्द लेते है --

हरकत और बरकत --इसी से समझने की कोशिश करते हैं यानी 3- मुतहर्रिक +1 साकिन [आख़िरी वाला]

बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

यानी आख़िर में साकिन तो आना ही था ,बाक़ी सब पर [ ब-र-क पर] जबर की हरकत लगी हुई है।

तो बरकत का वज़न क्या होगा ?

बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

    = मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + [मुतहर्रिक + साकिन ] 

    = मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक  + सबब [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़]

    =  1         1          2    =  112 

अब 1 1 [ मुतहर्रिक+मुतहर्रिक] को क्या बोलें? अरूज़ की भाषा में यह भी सबब  की हैसियत का  1 1 मिल कर दो तो हैं मगर अलग अलग खड़े है

अपने अपने सर पर हरकत का बोझ लिए खड़े है --यानी सकील है भारी है।

इसीलिए 1 1 को सबब-ए-सकील कहते है

यानी बरकत शब्द = सबब-ए-सकील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़  से भी बना माना जा सकता है।

जब हम अफ़ाइल [रुक्न] को सबब--ए-  सकील और सबब-ए- खफ़ीफ़ से दिखा सकते है --तो फ़ासला की  ज़रूरत क्या । इसके बिना भी काम चल जाएगा।

यही बात शब्द ’हरकत’ के लिए भी और ऐसे बहुत से शब्द के लिए भी।

चलते चलते--

आप इन सब अरूज़ के चक्कर में मत पड़िए --आप अपनी शायरी करते चलिए -जैसे कर रहे हैं । यह सब अरूज़ियों के चोचले हैं।

यह तो बस बात निकली तो चर्चा कर लिय॥

सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181


Tuesday, August 4, 2026

उर्दू बह्र पर एक बात चीत : क़िस्त 138 : वतद---वतद-ए-मौक़ूफ़

 चर्चा 004: वतद -- वतद-ए-मौक़ूफ़

पिछले चर्चा में मैने वतद-ए-मौक़ूफ़ की बात की थी।

[Disclaimer Caluse: यह मजमून उन अह्बाब के लिए है जों अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ होना चाहते है।

 आप वतद [बहुवचन औदात] के बारे में जानते होंगे। उर्दू में 3-हर्फ़ी अल्फ़ाज़ को ’वतद’ कहते हैं जिसे हिंदी में हम ’त्रिकल’ कहते हैं ।हम यहाँ त्रिकल-द्विकल की चर्चा नहीं करेंगे । हिंदी की बात हिंदीं व्याकरण से--उर्दू की बात उर्दू क़वायद [ उर्दू व्याकरण] से। अगर हम ग़ज़ल की बात करते है, बह्र, अर्कान[ अफ़ाइल] की बात करते है, हर्फ़ के दबाने गिराने [पतन]की बात करते हैं ज़िहाफ़ात की बात करते हैंतो उर्दू व्याकरण ही ’फ़ालो’ करना पड़ेगा। अरूज़ की बात माननी ही पड़ेगी। यह नहीं कि अपनी सुविधानुसार कभी हिंदी, कभी उर्दू व्याकरण की बात करें।हिंदी-उर्दू व्याकरण  के इस प्रकार के ’घाल-मेल’ से एक ला-हासिल  बहस शुरु हो जाती है और पाठको को, नौ-मश्क़ शायरों के मन में भ्रम पैदा हो जाता है।

 एक बात ध्यान रखने की है-- 

-उर्दु ज़ुबान की हैय्यत [बनावट] ही ऐसी है कि उर्दू के किसी शब्द का -पहला हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ और आख़िरी हर्फ़ ’साकिन’ होता है।

अब आप कहेंगे यह मुतहर्रिक-साकिन क्या बला है?साहिब ये बला नहीं --शब्द निर्माण की कला है। चलिए एक संक्षिप्त चर्चा मुतहर्रिक- साकिन हर्फ़ पर कर लेते हैं।

आप जानते है- उर्दू वर्णमाला [ हरूफ़-ए-तहज्जी] में जितने भी हर्फ़ होते हैं सभी मूलत: साकिन [स्वर रहित] होते है। मगर मात्र इन साकिन  हर्फ़ से शब्द नहीं बन सकते जब तक कि इन स्वर रहित हर्फ़[ साकिन] पर कोई ’हरकत’ न लगाएँ। उर्दू में मुख्यत: तीन हरकत [ ज़ेर--ज़बर-पेश] होते है और इन हरकात को लगाते ही हर्फ़ एक ख़ास आवाज़ देने लगता है। हरकत शुदा हर्फ़ को ही ’ मुतहर्रिक’ कहते हैं

जैसे अब-कमल--असर-लहर --बसर--बशर-- सबमें पहले हर्फ़  [ यानी -क -अ-ल-ब ] पर जबर- की हरकत लगी हुई है--चाहे इमला में दिखावें या न दिखावें

उसी तरह - उस-खुश -बुत --के पहले हर्फ़ पर -पेश की हरकत लगी होती है।

यह सब बेसिक बातें किसी भी उर्दू व्याकरण की या इन्टेरेनेट पर आराम से मिल जाएगी।

अब वतद पर आते है-- 3 हर्फ़ी शब्द को ’वतद’ कहते है 

मुतहर्रिक-साकिन इन 3-अदद हर्फ़  से निम्नलिखिता संभावनाएँ [इमकानात] हो सकती है

[अ]  मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

[ब]  मुतहर्रिक+  साकिन   + मुतहार्रिक

[स]  मुतहर्रिक + साकिन   + साकिन


यानी पहले मुक़ाम पर मुतहर्रिक और आख़िरी मुक़ाम पर साकिन लाना ही लाना है। और कोई संभावना बनती हो तो बताएँ।

[अ]  मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन = अरूज़ियों ने इसका नाम --वतद-ए-मज्मुआ  दिया। मज्मुआ इसलिए की दो मुतहर्रिक हर्फ़

एक साथ जमा हो गए-सो मज़मुआ। और इनका वज़न हमेशा - 12- होता है

सहर--लहर--असर--रक़म--बदल--बरस- मरज--गरज़- शजर -  आदि सैकड़ों अल्फ़ाज़

और अर्कान में मफ़ा--इला--इलुन--सब वतद-ए-मज्मुआ हैं


[ब]  मुतहर्रिक+  साकिन   + मुतहार्रिक = अरूज़ियों ने इसका नाम --वतद-ए-मफ़रूक - दिया। कारण की दो मुतहारिक के बीच

फ़र्क आ गया --एक साथ नहीं है--सिलसिलेवार नही है --इसलिए मफ़रूक

उर्दू में ऐसा कोई लफ़्ज़ नहीं मिलेगा जिसके आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो। ऊपर पहले ही यह बात बता दी गई है। तो इसकी ज़रूरत क्या थी ?

ज़रूरत थी --अर्कान बनाने में-

 कभी कभी इज़ाफ़त और अत्फ़ के अमल से ऐसे शब्द बन जाते हैं।

[स]  मुतहर्रिक + साकिन   + साकिन = अरूज़ियों ने  इस arrangement का नाम दिया --वतद-ए-मौक़ूफ़ । यह अर्कान बनाने के काम नही आता

यह किसी अर्कान [ अफ़ाइल ] में आता भी नहीं। ऐसे सैकड़ो अल्फ़ाज़ उर्दू में  आप को मिल जाएंगे और इनका वज़न हमेशा -21- होगा

जैसे अब्र--अक़्ल--अम्न--शह्र--ज़ह्र--चर्ख़ [आसमान] ----

 अब  कुछ और अल्फ़ाज़ वतद-ए-मजमुआ पर पेश करते है--जिसका वज़न - 12-होगा-

अबद--असर--अजल--ख़बर--खिरद--रक़म --शुतुर [ऊँट]--शिकम[पेट] --वग़ैरह वग़ैरह -एक लम्बी फ़ेहरिस्त।

 अब कुछ और अल्फ़ाज़  वतद-ए-मौक़ूफ़ का पेश करते है --जिसका वज़न हमेशा --21 --पर होगा

उर्द-अस्र-ज़ख्म -दर्द-जुर्म--हर्फ़--ख़ुश्क--जिस्म-हर्ब-ज़ुह्द-- वग़ैरह वग़ैर्ग --एक लम्बी फ़ेहरिस्त

उर्दू शब्दों का सही वज़न निकालने के लिए -सही तलफ़्फ़ुज़ जानना ज़रूरी है और इसमे कोई मुस्तनद लुग़त [ उर्दू का प्रामाणिक शब्दकोश] आप की मदद कर सकता है।

अगर आप को हर्फ़ के हरकत -साकिन का आइडिया हो गया तो शब्द का वज़न [ मात्रा भार] ब आसानी निकाला जा सकता है।

आप की मदद कर सकता है।

अब मरजी आप की--कि 

शह्र को शहर कहें 

ज़ह्र को ज़हर कहें

बह्र को बहर कहें

अक़्ल को --अकल कहें

या फिर 

मरज को मर्ज कहते है

गरज को गर्ज कहते है 

या नज़र को नज़्र कहते है --अरे हाँ इसे कह सकते है 😀😀

नज़र[12] निगाह

नज़्र [21] भेंट 

आप कोशिश करेंगे तो बहुत से शब्द मिल जाएँगे। आप चाहें तो ऐसी सूची आप खुद बना सकते हैं--फिर तो आप को पूछने की ज़रूरत ही न पड़ेगी

कि फ़लाना शब्द का वज़्न क्या होगा ?

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

880092 7181

Wednesday, July 29, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 137: मफ़ऊलातु पर--[क्रमांक से आगे]

क़िस्त 137  : सालिम रुक्न मफ़ऊलातु पर--[ क्रमाकं से आगे]

पिछले चर्चा 002] में एक सालिम रुक्न -मफ़ऊलातु- पर चर्चा किया था जिसमें कहा था कि यह एक सालिम रुक्न होने के बावज़ूदइससे कोई सालिम बह्र नहीं बनती तो फिर इसको बनाया ही क्यों गया?

जी बिलकुल सही। सालिम बह्र में प्रयोग नहीं हो सकता मगर -’मुरक़्क़ब बह्र’-में तो हो सकता है और होता भी है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब में । यह रुक्न बह्र-ए-मुक्तज़िब का बुनियादी रुक्न है।

बह्र-ए-मुक़्तज़िब एक मुरक़्कब बहर है और यह दो सालिम बह्रों से मिलकर बनता है

 2221  + 2212 यानी

मफ़ऊलातु + मुसतफ़इलुन

इत्तिफ़ाक़न यह बह्र-ए-मुन्सरिअ’ बह्र का बरअक्स [ mirror image] बह्र है। ख़ैर

अब इस बह्र पर वो तमाम जायज़ ज़िहाफ़ लग सकते है जो 2221--और 2212 पर अलग अलग लग सकते है। 

यहाँ उन पर चर्चा नहीं करूँगा और न ही इससे बरामद होने वाली अन्य मुज़ाहिफ़ बह्रों की चर्चा करूँगा। वह किसी भी अरूज़ की किताब में मिल जाएगी।

मगर इससे बरामद एक मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा ज़रूर करना चाहूँगा  जो बहुत ही लोकप्रिय है ,मुतर्न्निम है, मानूस है और बहुत से कदीम-ओ- ज़दीद शो;अरा

ने इस मुतर्न्निम बह्र में ग़ज़ल कहीं है। 

वो बह्र है

121--22 / 121-22// 121-22/ 121-22 यानी

फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन यानी

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’ मख़्बून मरफ़ूअ’मुसक्किन मुज़ाइफ़

यह एक 16-रुक्नी बहर है। ध्यान रहे आठ रुक के बाद जो -//- निशान है वो बह्र-ए-शिकस्ता की अलामत नहीं

बल्कि लाज़िमन अरूज़ी वक़फ़ा की अलामत है।

यह बह्र कैसी बनती है --इस पर चर्चा नहीं करूँगा

और साथ ही यह बह्र विवादास्पद भी है

हकुछ लोग इसे -मुतक़ारिब - के तहत रखते है और कुछ लोग इसे -मुक्तज़िब- के। सबके अपनी अपनी

दलीले है। जहाँ तक मेरा सवाल है मैं इसे --मुक्तज़िब- के तहत ही रखता हूँ।

इस बह्र में दो ग़ज़लों के चन्द अश’आर पेश कर रहा हूँ आप भी गुनगुनाएँ--और लुत्फ़अंदोज़ हों

शकील बदायूनी साह्ब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर [पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी\


लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले

मुहब्बत आइना हो चुकी थी वज़ूदे-बज़्मे-जहाँ से पहले


समझ रहा था कि नाउमीदी, न पर्दादारे-उमीद होगी

नज़र उठा कर जो मैने देखा गुबार था कारवाँ से पहले ।


क़सम फ़रेबे-निगाह-ओ-दिल की, हमें तेरी जुस्तजू ने खोया

वहीं थी दरअस्ल अपनी मंज़िल क़दम उठे थे जहाँ से पहले


अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ किस्मत में जौर-ए-पैहम

खुली जो आँखें इस अंजुमन में नज़र मिली आसमां से पहले।


-शकील बदायूनी--

इसकी तक़्तीअ’ कर के आप  एक बार चेक कर लें कि यह ग़ज़ल इस बह्र मैं है भी कि नहीं?]

आप तलाश करेंगे तो इसी बह्र में और भी शायरों के कलाम मिल जाएँगे\


अब  अब्दुल हमीद ’अदम’ साहब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर  इसी बह्र में मुलाहिज़ा फ़रमाएँ--

[पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]


जुनूँ का जो भी मुआमला है वो शुस्ता-ओ-ख़ुशनिज़ाम होगा

बिला तकल्लुफ़ जो चल पड़ेगा, वो राहरौ तेज़गाम  होगा ।


जो हर ख़ताकार राहजन को दुआएँ दे कर चला गया है 

वो शख़्स मेरा ख़याल ये है,  बहुत ही आली-मुकाम होगा


हमे ग़रज़ क्या कि बज़्मे-महशर को हाऊ-हू-में शरीक़ होते

वहाँ गए हैं जो छुप छुपा कर, उन्हें वहाँ कोई काम होगा ।


चलो ये मंज़र भी देख ही लें ’अदम’ तकल्लुफ़ की गुफ़्तगू का

सुना है”मूसा’ से ’तूर’ पर आज फिर कोई हमकलाम होगा ।


-अब्दुल हमीद ’अदम’


इन ग़ज़लों को आप मन ही मन गुनगुनाइए --आनन्द उठाइए

-आनन्द.पाठक ’आनन’

880092 7181


Tuesday, July 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : किस्त 136 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

  चर्चा 002 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

 जो शायरी में अरूज़, वज़न बहर अर्कान से वाक़िफ़ होंगे, वह इस रुक्न से अवश्य परिचित होंगे।

जी हाँ यह सालिम एक रुक्न  का नाम है मगर अफ़सोस की इस सालिम रुक्न से 

कोई सालिम बह्र नहीं बनती। क्यों नहीं बनती? इसकी चर्चा आगे करेंगे।

मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु -प्रथम दृष्टया देखने में एक जैसे लगते है या एक ही लगते हैं। बहुत से हमारे मित्र

अपनी ग़ज़ल की बह्र का नाम लिखते समय एक ही समझ कर प्रयोग करते हैं और लिखते है,लेकिन

जो समझदार  हैं वो इस झंझट में नही पड़ते और बस अर्कान को ’Mathematical Form' में लिख कर आगे बढ़ जाते हैं अब आप समझते रहें कि मफ़ऊलात् है कि -मफ़ऊलातु ।

 इत्तिफ़ाक़न दोनो का Mathematical Form एक ही है यानी  -2221-

जब कि हक़ीक़तन यह एक नहीं है। अरूज़ की ज़ुबान में ये दो अलग अलग रुक्न की हैसियत रखते है।

मफ़ऊलातु - की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? मफ़ऊलात को ही सालिम रुक्न लिखने में क्या समस्या थी?

आज हम इसी पर चर्चा करेंगे।

आप निम्नलिखित अर्कान को तो जानते पहचानते होंगे?

मफ़ाईलुन् = 1 2 2 2  = बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम रुक्न

फ़ाइलातुन् = 2 1 2 2  = बह्र-ए-रमल का बुनियादी सालिम रुक्न

मुसतफ़इलुन् =2 2 1 2  = बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी सालिम रुक्न

अगर आप ध्यान से देखें तो-1- का लोकेशन क्रमश: एक स्टेप दाएँ खिसकता जा रहा है।

 तो फिरवह वहीं क्यों रुक गया? जब कि  उसे एक स्टेप और दाएँ खिसकने का हक़ भी है और गुंजाइश भी है।

जी हाँ बिलकुल सही। तो लीजिए एक स्टेप दाएँ और खिसका देते हैं।

यानी  2 2 2 1 कर देते है। जी हाँ यह भी एक सालिम रुक्न है और इसी का नाम -मफ़ऊलातु- है।

मफ़ऊलातु क्यों? मफ़ऊलात क्यों नहीं ?

 आप ऊपर के अर्कान में जो -1- देख रहे है वास्तव में वह मुतहर्रिक हर्फ़ का लोकेशन है।

चाहे मफ़ा में मीम हो, फ़ाइला में -ऐन- हो ,इलुन में -ऐन- हो, इस लोकेशन पर सब मुतहर्रिक की हैसियत में है 

और हर रुक के आख़िर में -न- [ नून ] है वो सब साकिन [ स्वर रहित] की हैसियत में क़ाबिज़ हैं

मैने  साकिन हर्फ़ को हलन्त  लगा कर् दिखा दिया है।

 अगर हम मफ़ऊलात् [ मफ़ऊलात ] लिखते तो यह भ्रम् हो जाता कि आख़िरी हर्फ़् साकिन्

है जब् कि 2221 में वस्तुत्: आख़िरी हर्फ़ मुतहर्रिक [1] है। इसी बात को differentiate करने के लिए [-ते पर पेश =तु]- लगा देते हैं  कि कहीं कोई भ्रम न रहे कि इस सालिम रुक  का आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक - है [ न कि सालिम] और यही ख़ासियत इसे अपने समूह के अन्य सालिम रुक्न से इसे अलग खड़ा करती है

जितने भी सालिम रुक्न है--चाहे--फ़ऊलुन--फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन --फ़ाइलातुन--मुसतफ़इलुन- मुतफ़ाइलुन-मुफ़ाइलतुन सबके आखिर में न- [नून] है जो साकिन है।

मगर मफ़ऊलातु में --आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक है और किसी को कोई  confusion न रहे इसलिए -ते के ऊपर पेश-लगा कर जता दिया।

अब तो स्पष्ट हो गया होगा कि-- मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु-- same नहीं है देखने में भले एक लगता हो वज़न भले ही दोनो एक जैसी  2221 हैसियत रखते हों।

ऊपर मैने कहा था कि -मफ़ऊलातु - एक सालिम रुक्न् ज़रूर है मगर इससे सालिम बहर नही बनती।

यानी 2221---2221---2221---2221 में कोई ग़ज़ल नहीं कही जा सकती?

क्यों नहीं कही जा सकती?

कारण है।

 उर्दू ज़बान की हैयत [बनावट] ही ऐसी है कि इसका हर लफ़्ज़ मुतहर्रिक से शुरु होता है और साकिन पर गिरता है

और मिसरा के आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ नहीं आ सकता । आप ऊपर देखे--जितने भी सालिम अर्कान अरूज़ में डिजाइन किए गए सब के आखिर में हर्फ़-ए-साकिन  [स्वर रहित हर्फ़] है [ सिवा मफ़ऊलातु को छोड़ कर} अत: मिसरा के आख़िर में -मफ़ऊलातु- कैसे ला दे- मुतहर्रिक हर्फ़ कैसे ला दें।

एक बात और  उर्दू ज़बान में आप को कोई ऐसा लफ़्ज़ भी न मिलेगा जिसके आख़िर मे--मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो।

तो सवाल यह कि --कि फिर -मफ़ऊलातु- रुक्न बनाने की ज़रूरत क्या थी?

अरे भाई मिसरा के आखिर में नहीं आ सकता तो कोई बात नहीं--मिसरा के बीच में --शुरुआत में तो आ सकता है और आता भी है जैसे बह्र-ए-मुक्तज़िब में --। इसी लिए इसे बह्र-ए-मुक्तजिब का बुनियादी रुक्न भी कहते है

अगर मिसरा के आख़िर में आयेगा भी तो अपनी मुज़ाहिफ़ शकल [ ज़िहाफ़ शुदा शकल] में ही आएगा जो -आख़िरी हर्फ़ -तु-[ मुतहर्रिक] को साकिन कर देता हो।


-आनन्द.पाठक ;आनन’-

880092 7181


Tuesday, July 7, 2026

उर्दू बहर पर एक बातचीत [क़िस्त 135]: बह्र 2121--222---2121---222 और बह्र 212---1222----212--1222 में अन्तर

  [क़िस्त 135]:  बह्र  2121--222---2121---222  और बह्र   212---1222----212--1222 में अन्तर

सवाल : मेरे एक मित्र ने सवाल किया था नीचे लिखे हुए बह्रों में क्या अन्तर है ?

 [अ] 2121--222---2121---222

[ब]   212---1222----212--1222

उत्तर सीधा है  -यह दो अलग अलग [मुख्तलिफ़] बह्र हैं और दोनों के अलग अलग अरूज़ी नाम भी हैं

[अ]  -यह एक मुरक़्क़ब बहर है जो बह्र-ए-मुक्तज़िब से निकलती या बरामद होती है

[ब] -- यह सालिम बह्र, बह्र-ए- हज़ज से निकलती है।

 मगर--मेरे मित्र को यह दुविधा क्यों उत्पन्न हुई?

- हो सकता है कि उन्होने या उनके  किसी अन्य मित्र ने  ग़ज़ल की तक्तीअ’ दोनों बहरों से कर दी हो और दोनो का वज़न सही उतरा हो 

- शायद उन्होने सोचा हो कि बह्र [अ] का 2121 का -1- अगर सामने वाले रुक्न से जोड़ दिया जाए तो बह्र[ब] बरामद हो जाएगी। तो अन्तर क्या?

 इस आलेख में इन्हीं सब बातों की चर्चा करेंगे। यह लेख उन अहबाब के मद्दे नज़र लिखा गया है जो अरूज़ से ज़ौक़-0-शौक़ फ़रमाते है

अरूज़ आशना है।

उर्दू वाले रुक्न को उनके नाम से --जैसे फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन--जानते पहचानते पुकारते  हैं

हम हिंदी वाले  212--1222 से जानते पहचानते है ।  ऐसे Numerical अलामत एक रुक्न की नुमाईंदगी करते है

1- 2 फ़ार्म में दिखाना-- आसान लगता है -लघु-दीर्घ-दीर्घ --

[ हमा्री भोजपुरी भाषा में एक कहावत है---अन्हरा बिना रहियो न जाय, अन्हरा से अँखियों पिराय। 

इसका अर्थ/भाव/मतलब आप सब जानते होंगे]


ख़ैर अपनी अपनी सुविधा है। कभी कभी हम इस पर Mathematical Operation भी कर देते हैं

1+1=2 कर देते हैं । हाँ कर सकते [ विशेष परिस्थितियों में] 

मगर -2-को हम 1 -1 नहीं कर सकते। क्यों ? इसकी चर्चा कभी बाद में करेंगे।

हाँ मूल विषय पर आते हैं-

[अ] 2121--222---2121--222  बह्र  पर चर्चा करते है

यह एक मुरक़्कब बह्र है और यह दो-सालिम रुक्न से बनता है

2221  + 2212 यानी मफ़ऊलातु + मुस तफ़ इलुन

और इस पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगाने से 

2121---222---2121---222 बरामद होती है 

फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन--फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन

और नाम है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी, मुतव्वी मुसक्किन, मुतव्वी, मक़्तूअ’

[ इस बह्र में और भी कुछ नुकते की बात है जो अभी या यहाँ ज़िक्र करना न ज़रूरी है, न मुनासिब है। 


अब दूसरी बह्र पर आते हैं।

[ब] : 212--1222--212--1222

यह बह्र , बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम से बरामद होती है यानी

1222---1222--1222--1222- पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगा दें तो 


  221---1222---221---1222

मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन--मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन

यानी   हज़ज मुसम्म्न अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुसम्मन सालिम अलअखिर

[ इस बह्र में और भी कुछ नुकते की बात है जो अभी या यहाँ ज़िक्र करना न ज़रूरी है, न मुनासिब है। ]

सवाल का जवाब यही तक ।


मगर एक सवाल मेरा --

अगर किसी ग़ज़ल या शे’र की तक्तीअ दो या दो से अधिक तरीके से की जा सकती है तो कौन सा तक्तीअ सही

मानना चाहिए क़ुबूल करना चाहिए।

मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा। ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ

सादर 

-आनन्द पाठक ’आनन’-


Sunday, June 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 134: शायरी में ’चर्बा’- सर्क़ा--तवारूद या प्रेरणा ?

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 134: शायरी में ’चर्बा’- सर्क़ा--तवारूद या प्रेरणा ? 


मेरे एक शायर मित्र ने एक गज़ल कहीं। इत्तिफ़ाक़न और ग़ैर कस्दन[ बिना जानबूझ कर]

उनका एक मिसरा किसी नामचीन शायर के एक मशहूर मिसरे से ’टकरा’ गया।

जब उन्हे पता चला तो काफी नदामतजदा हुए। उन्होने इस वाक़िया पर मेरी राय पूछी।

यह आलेख उसी संदर्भ में है।

वैसे भी ’चर्बा’--सर्क़ा--तवारुद  और प्रेरणा में बहुत बारीक़ अन्तर होता है।

[ इस विषय पर कभी विस्तार से और अलग से चर्चा करूँगा ]

पहले भी ऐसे कई शायरों ने इत्तिफ़ाक़न या सयास ऐसी कोशिश की है उमीदन आगे भी ऐसा होता रहेगा।

उदाहरण के तौर पर

ऎ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है ,

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता  है ।

 यह- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़-   साहब का शे’र है


मगर इसी शे’र को किसी [ नामालूम] शायर ने यूँ लिखा/सुनाया

मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है 

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? या प्रेरणा?

एक दूसरा उदाहरण देखिए--

दीवार-ए-चमन पर ज़ाग़-ओ-ज़गन

मसरूफ़ हैं नौहाख़्वानी में ’

हर शाख में उल्लू बैठा है

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा ।

[ ज़ाग-ओ-ज़गन = चील कौआ]

[ नौहाख़्वानी में = रोने धोने में ]

 यह शे’र -क़माल सालारपूरी-साहब का है 

मगर इसी शे’र को-

शौक़ बहराइचवी ने इसे यूँ कहा--

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी है

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा?

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? प्रेरणा?

एक तीसरा उदाहरण और लेते हैं--

गए दोनों ज़हान के काम से हम ,न इधर के रहे,न उधर के रहे ।

न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे ,न उधर के रहे ।

यह शे’र -मिर्ज़ा सादिक़ ’शरर’- साहब का है

मगर रेख़्ता में इसे किसी ना मालूम शायर के नाम से यूँ दिया है

न ख़ुदा ही मिला ,न विसाल-ए-सनम, न इधर के हुए न उधर के हुए

रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम , न इधर के हुए न उधर के हुए।

[ मूल शे’र मे -रहे - और इस शे’र में -हुए- ]

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? प्रेरणा ?


ऐसी ग़लतियाँ इस लिए हो जाती है कि जब हम किसी मशहूर मिसरे पर --गिरह- लगाते है 

और वह गिरह इतना शानदार हो जाता है 

और मशहूर हो जाता है कि मूल शे’र नेपथ्य [ पस-ए-पर्दा] में चला जाता है।

और भी बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे

एक शे;र और --बशीर बद्र साहब का एक शे’र है--

उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो

न जाने ज़िंदगी के किस गली में शाम हो जाए।


{सुना है]--जब बद्र साहब से कहा गया कि जनाब इसमे एक मिसरा तो किसी और का है

 तो उनका जवाब था --तो क्या हुआ। मैने वह मिसरा उठा कर इस शे’र को कितना कीमती कर दिया।

बड़े लोग की बड़ी बात

मेरी तो यही सलाह होगी

--  हमें ऐसी स्थितियों से मुमकिना तौर पर बचना चाहिए

-- अगर किसी की मिसरा ले ही लिया है तो उसे पूरा का पूरा मुसल्लम ही उठाना चाहिए और 

अपने कलाम मे "----" दिखाना चाहिए जिसका मतलब यह होता कि यह मिसरा हमारा नहीं फ़लाना साहब का है। 

सुनाते वक़्त ता हाशिए पर उन साहब का नाम भॊ ले लें तो सोने में सुहागा।


-आनन्द पाठक ’आनन’ -

8800927181


Tuesday, June 23, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133]: मुन्तज़िर--मुन्तज़र

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133] : मुन्तज़िर--मुन्तज़र


मुन्तज़िर और मुन्तज़र दोनों उर्दू के लफ़्ज़ है और दोनो में ही "इन्तज़ार" का भाव छुपा हुआ है ।

मुन्तज़िर = किसी का इन्तज़ार करने वाला , प्रतीक्षा करने वाला, प्रतीक्षक

मुन्तज़र  = जिसका इन्तज़ार किया जाए ,जिसकी राह देखी जाए, जिसकी प्रतॊक्षा की जाए 

हाँ तो? इसमें कौन सी नई बात है?यह तो सब जानते है।

 बिलकुल जानते होंगे।

अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल है। आप सबने पढ़ा सुना होगा।

  कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़िर, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

  कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मिरी जबीने-नियाज़  में । 

-इक़बाल-

यह ग़ज़ल बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यानी

11212---11212----11212---11212 का ।

 यह ग़ज़ल इतनी मानूस है कि तमाम ग़ज़ल के  मज़्मूआ में पाया जाता है और बहुत से गायकों ने इसे गाया है।

हाँ तो?

मगर कई जगह --मिसर उला में---मुंतज़िर--छपा हुआ मिलेगा--तो कहीं -मुंतज़र--छपा मिलेगा।

और गायकों ने भी कहीं इसे - मुंतज़िर-गाया है और कहीं-- मुंतज़र- गाया है।

तो सही क्या है फिर? रेख़्ता में सही दिया गया है।

सही मिसरा है--

 कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

यानी आप की प्रतॊक्षा है--

 तो ऐसा क्यों हो जाता है? ख़ल्त मल्त क्यों हों जाता है फिर?

दोनॊ शब्द इतने आस पास है कि खल्त मल्त का इमकान बना रहता है

दूसरी बात यह कि दोनो ही शब्दो का वज़्न एक सा ही है- 212 -

मुन्तज़िर = मुन त ज़िर = 2 1 2

मुन्तज़र = मुन त  ज़र =2 1 2

अगर आप गाएंगे तो ग़लती पकड़ में न आएगी --गाने में खटका न लगेगा--कारण कि दोनो केस मे

लय समान गति -प्रवाह में रहेगी। 

मगर भाव??

[असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है  अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा।

ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181