Thursday, August 6, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 139: वतद-ए-मौक़ूफ़ [ ---- क़िस्त 138 से आगे]

 

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 139: वतद-ए-मौक़ूफ़ [ ---- क़िस्त 138 से आगे]


पिछली क़िस्त [चर्चा 004]  में वतद [ 3-हर्फ़ी ] शब्द पर चर्चा की थी जिसमे वतद-ए-मजमुआ और वतद-ए-मौक़ूफ़

पर विशेष चर्चा की थी।

आप जानते है कि वतद-ए-मजमुआ [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] वाले 3-हर्फ़ी शब्द का वज़न 1 2 होता है

जैसे --शजर--सहर--मरज-- अगर--्लहर --आदि

कभी आप ने सोचा है कि इन सबका वज़न 1 2 ही क्यॊ होता है - 1 1 1 - क्यों नहीं होता। आज इसी पर चर्चा करेंगे

जैसा कि पहले ही मैं बता चुका हूँ कि उर्दू ज़बान की हैय्यत [ बनावट] ही ऐसी है कि पहला हर्फ़ मुतहर्रिक और आख़िरी हर्फ़  by default  या लाज़िमन साकिन ही होता है ।

वतद-ए-मजमुआ में आप देख रहे है कि [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] में आख़िरी हर्फ़ साकिन है ही।

एक बात और -[ घड़ी भर के लिए आप कल्पना कर लें --बस कल्पना ही करें आगे और कुछ नही-हा हा हा😆😆 

मुतहर्रिक हर्फ़ --नर और साकिन हर्फ़ -मादा। तो बात समझने में कुछ आसानी हो जाएगी। इत्तिफ़ाक़न यहाँ साकिन वामांगी भी है हिंदी के लिहाज़ से ]😅😅

जब एक मुतहर्रिक हर्फ़ पास वाले साकिन हर्फ़ से मिलता है तो जोड़ा बना लेता है-2- बना लेता है [एक मन-दो बदन] जिसे अरूज़ की भाषा में --सबब- [सबब-ए-ख़फ़ीफ़] कहते है।

ख़फ़ीफ़ क्यों? अरे भाई जिसके बगल में -मादा-खड़ी हो उसकी आवाज़ ख़फ़ीफ़ ही निकलेगी मेरी तरह मीऊँ मीऊँ।

तो मुतहर्रिक का क्या हुआ ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|

वतद-ए-मजमुआ = [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन]= मुतहर्रिक +[ मुतहर्रिक+साकिन]

                    = मुतहर्रिक + सबब=    1 2

इसी लिए वतद-ए-मुजमुआ शब्द का वज़न 1 2 आता है या लिया जाता है। 

अब इसी समूह के कुछ शब्द देखते है--[ ख़याल रहे आख़री हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा]

ख़बर = ख़+बर  =1 2

अबद= अ+बद  = 1 2 [ हमेशा]

हरज = ह+ रज = 1 2 [ क्या हरज है?

सफ़र = स+ फ़र = 1 2 [ ज़िंदगी का सफ़र]

ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़----

ठीक यही बात वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन ] के साथ है -

वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन

                = [ मुतहर्रिक+साकिन] + साकिन 

                = सबब+ साकिन= 2 1 

फिर आख़िर वाले साकिन का क्या हुआ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|

अब कुछ शब्द वतद-ए-मौक़ूफ़ के देखते हैं--ख़याल रहे आख़िरी हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा--और दूसरे मुक़ाम वाला  हर्फ़ भी साकिन [स्वर रहित] है

अस्ल = अस+ ल = 2 1 = ओरिजनल

कब्र  = कब +र    = 2 1 

जुर्म  = जुर  +म    =2 1  [ अपराध]

सर्द  = सर +द    = 2 1  [ ठंडा]

ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़

यही कारण है कि वतद-ए-मौक़ूफ़ वाले शब्द 2 1 के वज़्न पर आते हैं या लिए जाते हैं।

आप ने देखा -1- दोनो ही हर्फ़ के लिए प्रयोग हुआ --हर्फ़ चाहे मुतहर्रिक हो या साकिन। इसी लिए 1 2 12 जैसी

अलामात  अफ़ाइल दिखाने के लिए बहुत मुफ़ीद या full proof व्यवस्थ   नहीं मानते हैं।

 ख़ैर।

अब आगे बढ़्ते है। ऐसा नहीं कि उर्दू में सिर्फ़ 2-हर्फ़ी या 3- हर्फ़ी शब्द ही होते हैं। चार हर्फ़ी शब्द भी होते है जिसे

अरूज़ की भाषा में फ़ासिला कहते  हैं -विशेष रूप से फ़ासिला सुग़्रा।  अगरचे इस की ज़रूरत आप को पड़ेगी नहीं मगर जानने में क्या बुराई। अर्कान का काम वतद और सबब की जानकारी से ही चल जाएगा। अब चूँकि अरूज़ियों ने परिभाषा गढ़ दी तो चर्चा कर ही लेते हैं।

फ़ासिला के दो शब्द लेते है --

हरकत और बरकत --इसी से समझने की कोशिश करते हैं यानी 3- मुतहर्रिक +1 साकिन [आख़िरी वाला]

बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

यानी आख़िर में साकिन तो आना ही था ,बाक़ी सब पर [ ब-र-क पर] जबर की हरकत लगी हुई है।

तो बरकत का वज़न क्या होगा ?

बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

    = मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + [मुतहर्रिक + साकिन ] 

    = मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक  + सबब [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़]

    =  1         1          2    =  112 

अब 1 1 [ मुतहर्रिक+मुतहर्रिक] को क्या बोलें? अरूज़ की भाषा में यह भी सबब  की हैसियत का  1 1 मिल कर दो तो हैं मगर अलग अलग खड़े है

अपने अपने सर पर हरकत का बोझ लिए खड़े है --यानी सकील है भारी है।

इसीलिए 1 1 को सबब-ए-सकील कहते है

यानी बरकत शब्द = सबब-ए-सकील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़  से भी बना माना जा सकता है।

जब हम अफ़ाइल [रुक्न] को सबब--ए-  सकील और सबब-ए- खफ़ीफ़ से दिखा सकते है --तो फ़ासला की  ज़रूरत क्या । इसके बिना भी काम चल जाएगा।

यही बात शब्द ’हरकत’ के लिए भी और ऐसे बहुत से शब्द के लिए भी।

चलते चलते--

आप इन सब अरूज़ के चक्कर में मत पड़िए --आप अपनी शायरी करते चलिए -जैसे कर रहे हैं । यह सब अरूज़ियों के चोचले हैं।

यह तो बस बात निकली तो चर्चा कर लिय॥

सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181


Tuesday, August 4, 2026

उर्दू बह्र पर एक बात चीत : क़िस्त 138 : वतद---वतद-ए-मौक़ूफ़

 चर्चा 004: वतद -- वतद-ए-मौक़ूफ़

पिछले चर्चा में मैने वतद-ए-मौक़ूफ़ की बात की थी।

[Disclaimer Caluse: यह मजमून उन अह्बाब के लिए है जों अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ होना चाहते है।

 आप वतद [बहुवचन औदात] के बारे में जानते होंगे। उर्दू में 3-हर्फ़ी अल्फ़ाज़ को ’वतद’ कहते हैं जिसे हिंदी में हम ’त्रिकल’ कहते हैं ।हम यहाँ त्रिकल-द्विकल की चर्चा नहीं करेंगे । हिंदी की बात हिंदीं व्याकरण से--उर्दू की बात उर्दू क़वायद [ उर्दू व्याकरण] से। अगर हम ग़ज़ल की बात करते है, बह्र, अर्कान[ अफ़ाइल] की बात करते है, हर्फ़ के दबाने गिराने [पतन]की बात करते हैं ज़िहाफ़ात की बात करते हैंतो उर्दू व्याकरण ही ’फ़ालो’ करना पड़ेगा। अरूज़ की बात माननी ही पड़ेगी। यह नहीं कि अपनी सुविधानुसार कभी हिंदी, कभी उर्दू व्याकरण की बात करें।हिंदी-उर्दू व्याकरण  के इस प्रकार के ’घाल-मेल’ से एक ला-हासिल  बहस शुरु हो जाती है और पाठको को, नौ-मश्क़ शायरों के मन में भ्रम पैदा हो जाता है।

 एक बात ध्यान रखने की है-- 

-उर्दु ज़ुबान की हैय्यत [बनावट] ही ऐसी है कि उर्दू के किसी शब्द का -पहला हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ और आख़िरी हर्फ़ ’साकिन’ होता है।

अब आप कहेंगे यह मुतहर्रिक-साकिन क्या बला है?साहिब ये बला नहीं --शब्द निर्माण की कला है। चलिए एक संक्षिप्त चर्चा मुतहर्रिक- साकिन हर्फ़ पर कर लेते हैं।

आप जानते है- उर्दू वर्णमाला [ हरूफ़-ए-तहज्जी] में जितने भी हर्फ़ होते हैं सभी मूलत: साकिन [स्वर रहित] होते है। मगर मात्र इन साकिन  हर्फ़ से शब्द नहीं बन सकते जब तक कि इन स्वर रहित हर्फ़[ साकिन] पर कोई ’हरकत’ न लगाएँ। उर्दू में मुख्यत: तीन हरकत [ ज़ेर--ज़बर-पेश] होते है और इन हरकात को लगाते ही हर्फ़ एक ख़ास आवाज़ देने लगता है। हरकत शुदा हर्फ़ को ही ’ मुतहर्रिक’ कहते हैं

जैसे अब-कमल--असर-लहर --बसर--बशर-- सबमें पहले हर्फ़  [ यानी -क -अ-ल-ब ] पर जबर- की हरकत लगी हुई है--चाहे इमला में दिखावें या न दिखावें

उसी तरह - उस-खुश -बुत --के पहले हर्फ़ पर -पेश की हरकत लगी होती है।

यह सब बेसिक बातें किसी भी उर्दू व्याकरण की या इन्टेरेनेट पर आराम से मिल जाएगी।

अब वतद पर आते है-- 3 हर्फ़ी शब्द को ’वतद’ कहते है 

मुतहर्रिक-साकिन इन 3-अदद हर्फ़  से निम्नलिखिता संभावनाएँ [इमकानात] हो सकती है

[अ]  मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

[ब]  मुतहर्रिक+  साकिन   + मुतहार्रिक

[स]  मुतहर्रिक + साकिन   + साकिन


यानी पहले मुक़ाम पर मुतहर्रिक और आख़िरी मुक़ाम पर साकिन लाना ही लाना है। और कोई संभावना बनती हो तो बताएँ।

[अ]  मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन = अरूज़ियों ने इसका नाम --वतद-ए-मज्मुआ  दिया। मज्मुआ इसलिए की दो मुतहर्रिक हर्फ़

एक साथ जमा हो गए-सो मज़मुआ। और इनका वज़न हमेशा - 12- होता है

सहर--लहर--असर--रक़म--बदल--बरस- मरज--गरज़- शजर -  आदि सैकड़ों अल्फ़ाज़

और अर्कान में मफ़ा--इला--इलुन--सब वतद-ए-मज्मुआ हैं


[ब]  मुतहर्रिक+  साकिन   + मुतहार्रिक = अरूज़ियों ने इसका नाम --वतद-ए-मफ़रूक - दिया। कारण की दो मुतहारिक के बीच

फ़र्क आ गया --एक साथ नहीं है--सिलसिलेवार नही है --इसलिए मफ़रूक

उर्दू में ऐसा कोई लफ़्ज़ नहीं मिलेगा जिसके आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो। ऊपर पहले ही यह बात बता दी गई है। तो इसकी ज़रूरत क्या थी ?

ज़रूरत थी --अर्कान बनाने में-

 कभी कभी इज़ाफ़त और अत्फ़ के अमल से ऐसे शब्द बन जाते हैं।

[स]  मुतहर्रिक + साकिन   + साकिन = अरूज़ियों ने  इस arrangement का नाम दिया --वतद-ए-मौक़ूफ़ । यह अर्कान बनाने के काम नही आता

यह किसी अर्कान [ अफ़ाइल ] में आता भी नहीं। ऐसे सैकड़ो अल्फ़ाज़ उर्दू में  आप को मिल जाएंगे और इनका वज़न हमेशा -21- होगा

जैसे अब्र--अक़्ल--अम्न--शह्र--ज़ह्र--चर्ख़ [आसमान] ----

 अब  कुछ और अल्फ़ाज़ वतद-ए-मजमुआ पर पेश करते है--जिसका वज़न - 12-होगा-

अबद--असर--अजल--ख़बर--खिरद--रक़म --शुतुर [ऊँट]--शिकम[पेट] --वग़ैरह वग़ैरह -एक लम्बी फ़ेहरिस्त।

 अब कुछ और अल्फ़ाज़  वतद-ए-मौक़ूफ़ का पेश करते है --जिसका वज़न हमेशा --21 --पर होगा

उर्द-अस्र-ज़ख्म -दर्द-जुर्म--हर्फ़--ख़ुश्क--जिस्म-हर्ब-ज़ुह्द-- वग़ैरह वग़ैर्ग --एक लम्बी फ़ेहरिस्त

उर्दू शब्दों का सही वज़न निकालने के लिए -सही तलफ़्फ़ुज़ जानना ज़रूरी है और इसमे कोई मुस्तनद लुग़त [ उर्दू का प्रामाणिक शब्दकोश] आप की मदद कर सकता है।

अगर आप को हर्फ़ के हरकत -साकिन का आइडिया हो गया तो शब्द का वज़न [ मात्रा भार] ब आसानी निकाला जा सकता है।

आप की मदद कर सकता है।

अब मरजी आप की--कि 

शह्र को शहर कहें 

ज़ह्र को ज़हर कहें

बह्र को बहर कहें

अक़्ल को --अकल कहें

या फिर 

मरज को मर्ज कहते है

गरज को गर्ज कहते है 

या नज़र को नज़्र कहते है --अरे हाँ इसे कह सकते है 😀😀

नज़र[12] निगाह

नज़्र [21] भेंट 

आप कोशिश करेंगे तो बहुत से शब्द मिल जाएँगे। आप चाहें तो ऐसी सूची आप खुद बना सकते हैं--फिर तो आप को पूछने की ज़रूरत ही न पड़ेगी

कि फ़लाना शब्द का वज़्न क्या होगा ?

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

880092 7181

Wednesday, July 29, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 137: मफ़ऊलातु पर--[क्रमांक से आगे]

क़िस्त 137  : सालिम रुक्न मफ़ऊलातु पर--[ क्रमाकं से आगे]

पिछले चर्चा 002] में एक सालिम रुक्न -मफ़ऊलातु- पर चर्चा किया था जिसमें कहा था कि यह एक सालिम रुक्न होने के बावज़ूदइससे कोई सालिम बह्र नहीं बनती तो फिर इसको बनाया ही क्यों गया?

जी बिलकुल सही। सालिम बह्र में प्रयोग नहीं हो सकता मगर -’मुरक़्क़ब बह्र’-में तो हो सकता है और होता भी है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब में । यह रुक्न बह्र-ए-मुक्तज़िब का बुनियादी रुक्न है।

बह्र-ए-मुक़्तज़िब एक मुरक़्कब बहर है और यह दो सालिम बह्रों से मिलकर बनता है

 2221  + 2212 यानी

मफ़ऊलातु + मुसतफ़इलुन

इत्तिफ़ाक़न यह बह्र-ए-मुन्सरिअ’ बह्र का बरअक्स [ mirror image] बह्र है। ख़ैर

अब इस बह्र पर वो तमाम जायज़ ज़िहाफ़ लग सकते है जो 2221--और 2212 पर अलग अलग लग सकते है। 

यहाँ उन पर चर्चा नहीं करूँगा और न ही इससे बरामद होने वाली अन्य मुज़ाहिफ़ बह्रों की चर्चा करूँगा। वह किसी भी अरूज़ की किताब में मिल जाएगी।

मगर इससे बरामद एक मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा ज़रूर करना चाहूँगा  जो बहुत ही लोकप्रिय है ,मुतर्न्निम है, मानूस है और बहुत से कदीम-ओ- ज़दीद शो;अरा

ने इस मुतर्न्निम बह्र में ग़ज़ल कहीं है। 

वो बह्र है

121--22 / 121-22// 121-22/ 121-22 यानी

फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन यानी

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’ मख़्बून मरफ़ूअ’मुसक्किन मुज़ाइफ़

यह एक 16-रुक्नी बहर है। ध्यान रहे आठ रुक के बाद जो -//- निशान है वो बह्र-ए-शिकस्ता की अलामत नहीं

बल्कि लाज़िमन अरूज़ी वक़फ़ा की अलामत है।

यह बह्र कैसी बनती है --इस पर चर्चा नहीं करूँगा

और साथ ही यह बह्र विवादास्पद भी है

हकुछ लोग इसे -मुतक़ारिब - के तहत रखते है और कुछ लोग इसे -मुक्तज़िब- के। सबके अपनी अपनी

दलीले है। जहाँ तक मेरा सवाल है मैं इसे --मुक्तज़िब- के तहत ही रखता हूँ।

इस बह्र में दो ग़ज़लों के चन्द अश’आर पेश कर रहा हूँ आप भी गुनगुनाएँ--और लुत्फ़अंदोज़ हों

शकील बदायूनी साह्ब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर [पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी\


लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले

मुहब्बत आइना हो चुकी थी वज़ूदे-बज़्मे-जहाँ से पहले


समझ रहा था कि नाउमीदी, न पर्दादारे-उमीद होगी

नज़र उठा कर जो मैने देखा गुबार था कारवाँ से पहले ।


क़सम फ़रेबे-निगाह-ओ-दिल की, हमें तेरी जुस्तजू ने खोया

वहीं थी दरअस्ल अपनी मंज़िल क़दम उठे थे जहाँ से पहले


अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ किस्मत में जौर-ए-पैहम

खुली जो आँखें इस अंजुमन में नज़र मिली आसमां से पहले।


-शकील बदायूनी--

इसकी तक़्तीअ’ कर के आप  एक बार चेक कर लें कि यह ग़ज़ल इस बह्र मैं है भी कि नहीं?]

आप तलाश करेंगे तो इसी बह्र में और भी शायरों के कलाम मिल जाएँगे\


अब  अब्दुल हमीद ’अदम’ साहब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर  इसी बह्र में मुलाहिज़ा फ़रमाएँ--

[पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]


जुनूँ का जो भी मुआमला है वो शुस्ता-ओ-ख़ुशनिज़ाम होगा

बिला तकल्लुफ़ जो चल पड़ेगा, वो राहरौ तेज़गाम  होगा ।


जो हर ख़ताकार राहजन को दुआएँ दे कर चला गया है 

वो शख़्स मेरा ख़याल ये है,  बहुत ही आली-मुकाम होगा


हमे ग़रज़ क्या कि बज़्मे-महशर को हाऊ-हू-में शरीक़ होते

वहाँ गए हैं जो छुप छुपा कर, उन्हें वहाँ कोई काम होगा ।


चलो ये मंज़र भी देख ही लें ’अदम’ तकल्लुफ़ की गुफ़्तगू का

सुना है”मूसा’ से ’तूर’ पर आज फिर कोई हमकलाम होगा ।


-अब्दुल हमीद ’अदम’


इन ग़ज़लों को आप मन ही मन गुनगुनाइए --आनन्द उठाइए

-आनन्द.पाठक ’आनन’

880092 7181


Tuesday, July 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : किस्त 136 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

  चर्चा 002 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

 जो शायरी में अरूज़, वज़न बहर अर्कान से वाक़िफ़ होंगे, वह इस रुक्न से अवश्य परिचित होंगे।

जी हाँ यह सालिम एक रुक्न  का नाम है मगर अफ़सोस की इस सालिम रुक्न से 

कोई सालिम बह्र नहीं बनती। क्यों नहीं बनती? इसकी चर्चा आगे करेंगे।

मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु -प्रथम दृष्टया देखने में एक जैसे लगते है या एक ही लगते हैं। बहुत से हमारे मित्र

अपनी ग़ज़ल की बह्र का नाम लिखते समय एक ही समझ कर प्रयोग करते हैं और लिखते है,लेकिन

जो समझदार  हैं वो इस झंझट में नही पड़ते और बस अर्कान को ’Mathematical Form' में लिख कर आगे बढ़ जाते हैं अब आप समझते रहें कि मफ़ऊलात् है कि -मफ़ऊलातु ।

 इत्तिफ़ाक़न दोनो का Mathematical Form एक ही है यानी  -2221-

जब कि हक़ीक़तन यह एक नहीं है। अरूज़ की ज़ुबान में ये दो अलग अलग रुक्न की हैसियत रखते है।

मफ़ऊलातु - की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? मफ़ऊलात को ही सालिम रुक्न लिखने में क्या समस्या थी?

आज हम इसी पर चर्चा करेंगे।

आप निम्नलिखित अर्कान को तो जानते पहचानते होंगे?

मफ़ाईलुन् = 1 2 2 2  = बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम रुक्न

फ़ाइलातुन् = 2 1 2 2  = बह्र-ए-रमल का बुनियादी सालिम रुक्न

मुसतफ़इलुन् =2 2 1 2  = बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी सालिम रुक्न

अगर आप ध्यान से देखें तो-1- का लोकेशन क्रमश: एक स्टेप दाएँ खिसकता जा रहा है।

 तो फिरवह वहीं क्यों रुक गया? जब कि  उसे एक स्टेप और दाएँ खिसकने का हक़ भी है और गुंजाइश भी है।

जी हाँ बिलकुल सही। तो लीजिए एक स्टेप दाएँ और खिसका देते हैं।

यानी  2 2 2 1 कर देते है। जी हाँ यह भी एक सालिम रुक्न है और इसी का नाम -मफ़ऊलातु- है।

मफ़ऊलातु क्यों? मफ़ऊलात क्यों नहीं ?

 आप ऊपर के अर्कान में जो -1- देख रहे है वास्तव में वह मुतहर्रिक हर्फ़ का लोकेशन है।

चाहे मफ़ा में मीम हो, फ़ाइला में -ऐन- हो ,इलुन में -ऐन- हो, इस लोकेशन पर सब मुतहर्रिक की हैसियत में है 

और हर रुक के आख़िर में -न- [ नून ] है वो सब साकिन [ स्वर रहित] की हैसियत में क़ाबिज़ हैं

मैने  साकिन हर्फ़ को हलन्त  लगा कर् दिखा दिया है।

 अगर हम मफ़ऊलात् [ मफ़ऊलात ] लिखते तो यह भ्रम् हो जाता कि आख़िरी हर्फ़् साकिन्

है जब् कि 2221 में वस्तुत्: आख़िरी हर्फ़ मुतहर्रिक [1] है। इसी बात को differentiate करने के लिए [-ते पर पेश =तु]- लगा देते हैं  कि कहीं कोई भ्रम न रहे कि इस सालिम रुक  का आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक - है [ न कि सालिम] और यही ख़ासियत इसे अपने समूह के अन्य सालिम रुक्न से इसे अलग खड़ा करती है

जितने भी सालिम रुक्न है--चाहे--फ़ऊलुन--फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन --फ़ाइलातुन--मुसतफ़इलुन- मुतफ़ाइलुन-मुफ़ाइलतुन सबके आखिर में न- [नून] है जो साकिन है।

मगर मफ़ऊलातु में --आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक है और किसी को कोई  confusion न रहे इसलिए -ते के ऊपर पेश-लगा कर जता दिया।

अब तो स्पष्ट हो गया होगा कि-- मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु-- same नहीं है देखने में भले एक लगता हो वज़न भले ही दोनो एक जैसी  2221 हैसियत रखते हों।

ऊपर मैने कहा था कि -मफ़ऊलातु - एक सालिम रुक्न् ज़रूर है मगर इससे सालिम बहर नही बनती।

यानी 2221---2221---2221---2221 में कोई ग़ज़ल नहीं कही जा सकती?

क्यों नहीं कही जा सकती?

कारण है।

 उर्दू ज़बान की हैयत [बनावट] ही ऐसी है कि इसका हर लफ़्ज़ मुतहर्रिक से शुरु होता है और साकिन पर गिरता है

और मिसरा के आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ नहीं आ सकता । आप ऊपर देखे--जितने भी सालिम अर्कान अरूज़ में डिजाइन किए गए सब के आखिर में हर्फ़-ए-साकिन  [स्वर रहित हर्फ़] है [ सिवा मफ़ऊलातु को छोड़ कर} अत: मिसरा के आख़िर में -मफ़ऊलातु- कैसे ला दे- मुतहर्रिक हर्फ़ कैसे ला दें।

एक बात और  उर्दू ज़बान में आप को कोई ऐसा लफ़्ज़ भी न मिलेगा जिसके आख़िर मे--मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो।

तो सवाल यह कि --कि फिर -मफ़ऊलातु- रुक्न बनाने की ज़रूरत क्या थी?

अरे भाई मिसरा के आखिर में नहीं आ सकता तो कोई बात नहीं--मिसरा के बीच में --शुरुआत में तो आ सकता है और आता भी है जैसे बह्र-ए-मुक्तज़िब में --। इसी लिए इसे बह्र-ए-मुक्तजिब का बुनियादी रुक्न भी कहते है

अगर मिसरा के आख़िर में आयेगा भी तो अपनी मुज़ाहिफ़ शकल [ ज़िहाफ़ शुदा शकल] में ही आएगा जो -आख़िरी हर्फ़ -तु-[ मुतहर्रिक] को साकिन कर देता हो।


-आनन्द.पाठक ;आनन’-

880092 7181


Tuesday, July 7, 2026

उर्दू बहर पर एक बातचीत [क़िस्त 135]: बह्र 2121--222---2121---222 और बह्र 212---1222----212--1222 में अन्तर

  [क़िस्त 135]:  बह्र  2121--222---2121---222  और बह्र   212---1222----212--1222 में अन्तर

सवाल : मेरे एक मित्र ने सवाल किया था नीचे लिखे हुए बह्रों में क्या अन्तर है ?

 [अ] 2121--222---2121---222

[ब]   212---1222----212--1222

उत्तर सीधा है  -यह दो अलग अलग [मुख्तलिफ़] बह्र हैं और दोनों के अलग अलग अरूज़ी नाम भी हैं

[अ]  -यह एक मुरक़्क़ब बहर है जो बह्र-ए-मुक्तज़िब से निकलती या बरामद होती है

[ब] -- यह सालिम बह्र, बह्र-ए- हज़ज से निकलती है।

 मगर--मेरे मित्र को यह दुविधा क्यों उत्पन्न हुई?

- हो सकता है कि उन्होने या उनके  किसी अन्य मित्र ने  ग़ज़ल की तक्तीअ’ दोनों बहरों से कर दी हो और दोनो का वज़न सही उतरा हो 

- शायद उन्होने सोचा हो कि बह्र [अ] का 2121 का -1- अगर सामने वाले रुक्न से जोड़ दिया जाए तो बह्र[ब] बरामद हो जाएगी। तो अन्तर क्या?

 इस आलेख में इन्हीं सब बातों की चर्चा करेंगे। यह लेख उन अहबाब के मद्दे नज़र लिखा गया है जो अरूज़ से ज़ौक़-0-शौक़ फ़रमाते है

अरूज़ आशना है।

उर्दू वाले रुक्न को उनके नाम से --जैसे फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन--जानते पहचानते पुकारते  हैं

हम हिंदी वाले  212--1222 से जानते पहचानते है ।  ऐसे Numerical अलामत एक रुक्न की नुमाईंदगी करते है

1- 2 फ़ार्म में दिखाना-- आसान लगता है -लघु-दीर्घ-दीर्घ --

[ हमा्री भोजपुरी भाषा में एक कहावत है---अन्हरा बिना रहियो न जाय, अन्हरा से अँखियों पिराय। 

इसका अर्थ/भाव/मतलब आप सब जानते होंगे]


ख़ैर अपनी अपनी सुविधा है। कभी कभी हम इस पर Mathematical Operation भी कर देते हैं

1+1=2 कर देते हैं । हाँ कर सकते [ विशेष परिस्थितियों में] 

मगर -2-को हम 1 -1 नहीं कर सकते। क्यों ? इसकी चर्चा कभी बाद में करेंगे।

हाँ मूल विषय पर आते हैं-

[अ] 2121--222---2121--222  बह्र  पर चर्चा करते है

यह एक मुरक़्कब बह्र है और यह दो-सालिम रुक्न से बनता है

2221  + 2212 यानी मफ़ऊलातु + मुस तफ़ इलुन

और इस पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगाने से 

2121---222---2121---222 बरामद होती है 

फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन--फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन

और नाम है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी, मुतव्वी मुसक्किन, मुतव्वी, मक़्तूअ’

[ इस बह्र में और भी कुछ नुकते की बात है जो अभी या यहाँ ज़िक्र करना न ज़रूरी है, न मुनासिब है। 


अब दूसरी बह्र पर आते हैं।

[ब] : 212--1222--212--1222

यह बह्र , बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम से बरामद होती है यानी

1222---1222--1222--1222- पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगा दें तो 


  221---1222---221---1222

मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन--मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन

यानी   हज़ज मुसम्म्न अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुसम्मन सालिम अलअखिर

[ इस बह्र में और भी कुछ नुकते की बात है जो अभी या यहाँ ज़िक्र करना न ज़रूरी है, न मुनासिब है। ]

सवाल का जवाब यही तक ।


मगर एक सवाल मेरा --

अगर किसी ग़ज़ल या शे’र की तक्तीअ दो या दो से अधिक तरीके से की जा सकती है तो कौन सा तक्तीअ सही

मानना चाहिए क़ुबूल करना चाहिए।

मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा। ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ

सादर 

-आनन्द पाठक ’आनन’-


Sunday, June 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 134: शायरी में ’चर्बा’- सर्क़ा--तवारूद या प्रेरणा ?

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 134: शायरी में ’चर्बा’- सर्क़ा--तवारूद या प्रेरणा ? 


मेरे एक शायर मित्र ने एक गज़ल कहीं। इत्तिफ़ाक़न और ग़ैर कस्दन[ बिना जानबूझ कर]

उनका एक मिसरा किसी नामचीन शायर के एक मशहूर मिसरे से ’टकरा’ गया।

जब उन्हे पता चला तो काफी नदामतजदा हुए। उन्होने इस वाक़िया पर मेरी राय पूछी।

यह आलेख उसी संदर्भ में है।

वैसे भी ’चर्बा’--सर्क़ा--तवारुद  और प्रेरणा में बहुत बारीक़ अन्तर होता है।

[ इस विषय पर कभी विस्तार से और अलग से चर्चा करूँगा ]

पहले भी ऐसे कई शायरों ने इत्तिफ़ाक़न या सयास ऐसी कोशिश की है उमीदन आगे भी ऐसा होता रहेगा।

उदाहरण के तौर पर

ऎ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है ,

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता  है ।

 यह- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़-   साहब का शे’र है


मगर इसी शे’र को किसी [ नामालूम] शायर ने यूँ लिखा/सुनाया

मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है 

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? या प्रेरणा?

एक दूसरा उदाहरण देखिए--

दीवार-ए-चमन पर ज़ाग़-ओ-ज़गन

मसरूफ़ हैं नौहाख़्वानी में ’

हर शाख में उल्लू बैठा है

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा ।

[ ज़ाग-ओ-ज़गन = चील कौआ]

[ नौहाख़्वानी में = रोने धोने में ]

 यह शे’र -क़माल सालारपूरी-साहब का है 

मगर इसी शे’र को-

शौक़ बहराइचवी ने इसे यूँ कहा--

र्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी है

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा?

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? प्रेरणा?

एक तीसरा उदाहरण और लेते हैं--

गए दोनों ज़हान के काम से हम ,न इधर के रहे,न उधर के रहे ।

न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे ,न उधर के रहे ।

यह शे’र -मिर्ज़ा सादिक़ ’शरर’- साहब का है

मगर रेख़्ता में इसे किसी ना मालूम शायर के नाम से यूँ दिया है

न ख़ुदा ही मिला ,न विसाल-ए-सनम, न इधर के हुए न उधर के हुए

रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम , न इधर के हुए न उधर के हुए।

[ मूल शे’र मे -रहे - और इस शे’र में -हुए- ]

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? प्रेरणा ?


ऐसी ग़लतियाँ इस लिए हो जाती है कि जब हम किसी मशहूर मिसरे पर --गिरह- लगाते है 

और वह गिरह इतना शानदार हो जाता है 

और मशहूर हो जाता है कि मूल शे’र नेपथ्य [ पस-ए-पर्दा] में चला जाता है।

और भी बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे

एक शे;र और --बशीर बद्र साहब का एक शे’र है--

उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो

न जाने ज़िंदगी के किस गली में शाम हो जाए।


{सुना है]--जब बद्र साहब से कहा गया कि जनाब इसमे एक मिसरा तो किसी और का है

 तो उनका जवाब था --तो क्या हुआ। मैने वह मिसरा उठा कर इस शे’र को कितना कीमती कर दिया।

बड़े लोग की बड़ी बात

मेरी तो यही सलाह होगी

--  हमें ऐसी स्थितियों से मुमकिना तौर पर बचना चाहिए

-- अगर किसी की मिसरा ले ही लिया है तो उसे पूरा का पूरा मुसल्लम ही उठाना चाहिए और 

अपने कलाम मे "----" दिखाना चाहिए जिसका मतलब यह होता कि यह मिसरा हमारा नहीं फ़लाना साहब का है। 

सुनाते वक़्त ता हाशिए पर उन साहब का नाम भॊ ले लें तो सोने में सुहागा।


-आनन्द पाठक ’आनन’ -

8800927181


Tuesday, June 23, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133]: मुन्तज़िर--मुन्तज़र

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133] : मुन्तज़िर--मुन्तज़र


मुन्तज़िर और मुन्तज़र दोनों उर्दू के लफ़्ज़ है और दोनो में ही "इन्तज़ार" का भाव छुपा हुआ है ।

मुन्तज़िर = किसी का इन्तज़ार करने वाला , प्रतीक्षा करने वाला, प्रतीक्षक

मुन्तज़र  = जिसका इन्तज़ार किया जाए ,जिसकी राह देखी जाए, जिसकी प्रतॊक्षा की जाए 

हाँ तो? इसमें कौन सी नई बात है?यह तो सब जानते है।

 बिलकुल जानते होंगे।

अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल है। आप सबने पढ़ा सुना होगा।

  कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़िर, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

  कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मिरी जबीने-नियाज़  में । 

-इक़बाल-

यह ग़ज़ल बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यानी

11212---11212----11212---11212 का ।

 यह ग़ज़ल इतनी मानूस है कि तमाम ग़ज़ल के  मज़्मूआ में पाया जाता है और बहुत से गायकों ने इसे गाया है।

हाँ तो?

मगर कई जगह --मिसर उला में---मुंतज़िर--छपा हुआ मिलेगा--तो कहीं -मुंतज़र--छपा मिलेगा।

और गायकों ने भी कहीं इसे - मुंतज़िर-गाया है और कहीं-- मुंतज़र- गाया है।

तो सही क्या है फिर? रेख़्ता में सही दिया गया है।

सही मिसरा है--

 कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

यानी आप की प्रतॊक्षा है--

 तो ऐसा क्यों हो जाता है? ख़ल्त मल्त क्यों हों जाता है फिर?

दोनॊ शब्द इतने आस पास है कि खल्त मल्त का इमकान बना रहता है

दूसरी बात यह कि दोनो ही शब्दो का वज़्न एक सा ही है- 212 -

मुन्तज़िर = मुन त ज़िर = 2 1 2

मुन्तज़र = मुन त  ज़र =2 1 2

अगर आप गाएंगे तो ग़लती पकड़ में न आएगी --गाने में खटका न लगेगा--कारण कि दोनो केस मे

लय समान गति -प्रवाह में रहेगी। 

मगर भाव??

[असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है  अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा।

ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181


उर्दू बह्र पर एक बातचीत [ किस्त 132] : बह्र 212--212--212-2122 पर एक चर्चा

 :   बह्र 212--212--212-2122 पर एक चर्चा

मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया  था कि बह्र
212---212---212---2122 एक वैध और मान्य बह्र है या हो सकती है ?

यह आलेख उसी संदर्भ में लिखा गया है ।

 Technically and strictly  यह बह्र और यह वज़न मुमकिन तो है मगर

pragmatically  और व्यावाहारिक रूप से इस बह्र के साथ कुछ संकोच भी है।

तरफ़ैल-एक ज़िहाफ़ का नाम है जिसका इस्तेमाल 212 पर किया जा सकता है।

यह ज़िहाफ़ ख़ास तौर से शे’र के अरूज़/ज़र्ब  मुक़ाम के लिए होता है यानी शे’र के आख़िरी रुक्न के मुक़ाम के लिए। अगर इसका अमल 212 पर करें तो।

212 + तरफ़ैल = मुरफ़्फ़ल 2122 होगा और ऐसा अमल किया तो जा सकता है मनाही नही।

मगर--

-तरफ़ैल- ज़िहाफ़ वस्तुत: अरबी का ख़ास ज़िहाफ़ है, फ़ारसी में इसका इस्तेमाल बहुत कम  हुआ है और उर्दू में भी इसका रिवाज नहीं है, लगभग -न- के बराबर । अरूज़ मे इस बह्र में यह ज़िहाफ़’मतरूक’ [ छोड़ा हुआ ,त्यागा हुआ] की हैसियत रखता है। अत: यह बह्र और यह वज़न  बहुत प्रचलन में नहीं है। लोकप्रिय भी नही है।

लोग इस बह्र में शायरी करने से गुरेज़ करते है।

प्रचलन में या रिवाज़ में होना न होना अलग बात है। और अरूज़ के ऐन क़ायदे के मुताबिक वज़ूद में होना अलग बात है।

अगर आप इस वज़न/ बह्र में शायरी कर सकते है तो कर सकते है -मनाही नहीं।

" लीक छाड़ि तीनौ चलें--’शायर’-सिंह -सपूत

[ नोट- असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही फ़रमा दे जिससे 

मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।

सादर

आनन्द पाठक ’आनन’-

8800927181


Saturday, April 11, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 131 ] : मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़-ए-ज़ाइद [ 1+ ] के छूट पर

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 131 ] : मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़-ए-ज़ाइद [ 1+ ] के छूट पर 

[यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात  से वाक़िफ़ है 
अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात 
हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ]

-हमारे कुछ मित्रों की धारणा है या मान्यता है कि--किसी मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़ बढ़ाने की छूट है --।
आज इसी पर चर्चा करेंगे।
यह धारणा अर्ध सत्य है।
अर्धसत्य इसलिए कि --किसी मिसरा के आख़िर में एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाने की छूट है [ हर्फ़-ए-मुतहर्रिक नहीं]
हर्फ़-ए-मुतहर्रिक क्यों नहीं ? इस पर बाद में कभी चर्चा करेंगे
आज तो यह चर्चा करेंगे कि हर्फ़-ए-साकिन किस मिसरा के आखिर मे बढ़ा सकते हैं? मिसरा उला में कि मिसरा साकिन में ?
पिछ्ली क़िस्त में चर्चा कर चुके हैं कि यह हर्फ़-ए-साकिन शे’र के मिसरा ऊला के आख़िर में ही बढ़ा सकते है। मिसरा सानी में नहीं।
मिसरा सानी में क्यों नहीं ?
मिसरा सानी में इसलिए नहीं कि किसी ग़ज़ल की बहर मतला के मिसरा सानी से तय होती है और वही वज़न वही बह्र -पूरी गज़ल के मिसरा सानी में
क़ायम रखना होगा } कोई ख़ल्त, रद्द-ओ-बदल घटाना /बढ़ाना जायज नहीं होगा। बेबह्र होने का इमकान हो सकता है।
मिसरा उला ही ख़ाली है जहाँ एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाया जा सकता है।
हाँ अलबत्ता --रुबाई और माहिया के वज़न की बात और है
रुबाई = रुबाई के किसी मिसरे के आख़िर मे एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाया जा सकता है। और लोग बढ़ाते भी है।
भाई रुबाई में ऐसी क्या बात है जो ग़ज़ल में नहीं है ?
रुबाई में कोई मतला नहीं होता --मिसरा सानी नहीं होता--मिसरा उला नहीं होता। बल्कि चारो मिसरे                      Independent होते है ,अलग अलग होते है, अत: एक 
हर्फ़-ए-साकिन किसी मिसरा के आख़िर में बढ़ाया जा सकता है/छूट है।
एक दिलचस्प बात यह भी कि इसी छूट के कारण -रुबाई के 24 वज़न दस्तयाब होती है। अगर यह छूट न हो         तो रुबाई के वज़न 12 औज़ान में ही सिमट जाते।
ख़ैए। हम लोगो को इस पर ज़ियादे सोचने की ज़रूरत नही। क्योंकि हम लोग आजकल कौन सी रुबाई लिखते 
माहिया = यही बात माहिया के औजान में भी लागू होती है। वहाँ भी कोई मिसरा उला . मिसरा सानी नहीं होता ।             तीनो मिसरे Independent होते है । अत: इस केस में भी
किसी मिसरा के आख़ीर में एक हर्फ़-ए-साकिन बढ़ाया जा सकता है/ या छूट है।

[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
 सादर 


-आनन्द पाठक ’ आनन’
880092 7181

Wednesday, April 8, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : बह्र 221--2121--1221--212 पर एक चर्चा

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : 221--2121--1221--212  पर एक चर्चा 


[यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं और अरूज़ से जौक़-ओ-शौक़फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ]
मेरे एक मित्र ने अपनी ग़ज़ल का एक मतला बाँधा -

हर शै के दाम तय हुए बाज़ार के बग़ैर
हमने कही कहानियाँ किरदार के बग़ैर ।

[ आगे के अश’आर में - के बग़ैर- रदीफ़ क़ायम रखा गया ]

मित्र ने इस मतले का वज़न 221--2121---1221---212 लिखा [ बह्र का नाम नहीं लिखा]
यह बहुत ही मानूस और मक़्बूल [ परिचित और लोकप्रिय ] बह्र है सब लोग इस बह्र का नाम जानते है
और अमूमन सभी शो’अरा नें इस बह्र में शायरी की है।
इस बह्र का नाम है ---
बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ और अर्कान के नाम हैं
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु--मफ़ाईलु--फ़ाइलुन 

ख़ैर
अगर मतला को आप ध्यान से देखें तो अर्कान 221---2121--1221--212{ 1) ठहरता है। 
तो क्या 2121 को 212 कहना उचित ठहरता है? आज इसी पर विचार करेंगे।
मित्र की [ और अन्य मित्रों की भी] धारणा है या मान्यता है --""मिसरा के अन्त में 1+ की छूट जायज है।

[Poetic Liscence] है। आज इसी पर भी विचार करते है

आप 212 और 2121 [ जो शे’र के अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर है] में क्या फ़र्क़ है?
212 --हज़्फ़ ज़िहाफ़ के अमल से  "महज़ूफ़" है 2122 का और नाम है --फ़ाइलुन-
212[1] - कस्र ज़िहाफ़ के अमल से " मक्सूर" है 2122 का और नाम है --म्फ़ाइलान -

दोनो हॊ रेगुलर ज़िहाफ़ है अत: दो अलग अलग नाम भी होगा --

[अ ] 221---2121---1221--212 = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
[ब] 221---2121---1221--212(1) = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्सूर

यह दोनों हॊ रेगुलर बह्र हैं मान्य बह्र है और अरूज़ के ऐन मुताबिक से हासिल हुए हैं।’

 यह बात अलग है कि  अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो -महज़ूफ़ या मक्सूर- दिख रहा है इनका आपस में ख़्ल्त जायज है यानी इनका आपस में अदला बदली किया जा सकता है ।
 मगर कब? 
बह्र के नाम का निर्धारण --मतला के मिसरा सानी से ही तय होता है और जब आप ने मिसरा सानी में मक्सूर [2121] बाँध ही दिया है तो फ़िर
इसका वज़न -212-[ अरूज़/जर्ब] दिखाने का कोई मतलब ही नही। 
हाँ अगर आप 212--लाना ही चाहते है तो अब मिसरा ऊला में ही लाया जा सकता है -जो जायज भी है और अलाऊ भी है ।
ठीक इसका उल्टा केस भी सोचें--
अगर मतला के मिसरा सानी में -212--बाँधा है तो --फ़िर मिसरा उला ही बचा जहाँ आप 2121 ला सकते हैं -जो जायज भी है और अलाऊ भी है 
क्यों कि मिसरा सानी से बहर फ़िक्स हो गई --रदीफ़ क़ायम हो गया --तो फिर जो भॊ अदल-बदल करना होगा वह मिसरा ऊला में होगा। सानी में नहीं।

शकील बदायूनी-की ग़ज़ल के 2-3 अश’आर देखते हैं

221---2121---1221--2121
[1] आँखें उनको देखती है नज़ारा किए बग़ैर
पर्दे में छुप गए हैं वो परदा किए  बग़ैर ।-1 [मतला]

हरचंद दर्द-ए-इश्क़ का दरमा नहीं मगर
बनती नहीं है फ़िक्र-ए-मदावा किए बग़ैर । -2

[ बाक़ी अश"आर मिसरा सानी के  221---2121---1221--2121  वज़न पर ही निभाया गया है]

मगर शे’र 2 के मिसरा उला का वज़न तो  221--2121-1221--212 है।

 जब कि  मिसरा सानी का वज़न तो          221---2121---1221--2121 है।

मतलब बात यह कि --212 [ महज़ूफ़] --मिसरा उळा मे ही लाया गया है --सानी में नहीं। क्योंकि मिसरा सानी का तो बह्र 
/वज़न तो पहले से ही तय है। जो भी खल्त करना है वह अब मिसरा उला के मुक़ाम पर ही होगा।

अब इसका उल्टा केस लेते है-- [शकील बदायूनी साहब की ग़ज़ल का ]

221--2121-1221--212
[2] मंज़िल की धुन में होश-ओ-ख़बर से गुज़र गए
सौ बार तेरी राहगुज़र से  गुज़र गए ।          -1 [मतला ]

हरचंद फ़र्श-ए-राह थी उनके लिए निगाह
फिर भी ख़बर नहीं वो किधर से गुज़र गए। -2

क्या पूछते हो लुत्फ़-ए-हुजूम-ए-नज़र ’शकील’
कुछ तीर थे जो कल्ब-ए-नज़र से गुज़र गए । -3

[ [ बाक़ी अश"आर के मिसरा सानी में 221---2121---1221--212 यही वज़न निभाया गया है]

शे’र 2 और शे’र 3 पर मिसरा उला [ अरूज़ के मुक़ाम पर ध्यान दें]
तो वज़न 2121 उतरेगा।

यानी कहने का मतलब यह है कि महज़ूफ़/मक्सूर [ 212/2121] का जो भी खल्त [ अदल बदल ] होगा वह मिसरा ऊला में ही होगा--मिसरा सानी में नहीं।
क्योकि मिसरा सानी का वज़न और बह्र तो मतला से Already fix हो चुकी है --उसे ही पूरी ग़ज़ल में निभाना होगा । जो छूट की बात होगी वह मिसरा उला
में ही होगी।
वैसे यहाँ इस वज़न में [1+] वाली छूट की ज़रूरत नहीं है,। जो भी उला-सानी में बदलाव दिख रहा है वह =’ज़िहाफ़’ के अमल के कारण है न कि छूट के कारण है
 आप कोशिश करेंगे तो और भी शायरों के सुखन में भी यह बात मिल जाएगी/नज़र आएगी।
ऐसी ही स्थिति कुछ अन्य बह्रों में भी होती है।

जहाँ तक मिसरा के एक हर्फ़ 1+] के छूट वाली बात है वह भी मिसरा ’उला में होगी। सही पूछें तो वह हर्फ़ मिसरा के आख़िर में --एक हर्फ़-ए-साकिन - 
ज़ाइद की बात होती है--किसी मुतहर्रिक हर्फ़ की बात नहीं होती। 
ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि हर शे’र का मिसरा का आख़िर हर्फ़ -साकिन हर्फ़- पर गिरता है । अगर मिसरा के आख़िर में आप एक साकिन हर्फ़ और बढ़ा देंगे तो क्या होगा?
कुछ नहीं--मिसरा के अन्त में -दो हर्फ़-ए-साकिन -एक साथ हो जायेंगे} कोई बात नहीं।
जब मिसरा के आख़िर में -दो हरफ़-ए- साकिन एक साथ आ जाता है तो तक़्तीअ में एक ही हर्फ़-ए-साकिन शुमार होता है--अत: बह्र वही की वही रहती है।

[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 
ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


Monday, March 30, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : [क़िस्त 129]: बह्र 221--1212--122 के बारे में

 

बह्र : 221--1212---122 के बारे में

ग़ालिब की एक ग़ज़ल है [पूरी ग़ज़ल गूगल पर मिल जाएगी]

चर्चा की सुविधा के लिए यहाँ मात्र उसके 3 शे’र ही लगा रहा हूँ


फ़रियाद की कोई लै नहीं है

नाला पाबंद-ए-नै नहीं है [मतला]


हरचन्द हर एक शै में तू है

पर तुझ-सी तो कोई शै नहीं है।


हस्ती है न कुछ अदम है ’ग़ालिब’

आख़िर तू क्या है,’ऎ’ नहीं है । [मक़्ता ]


अगर मतला की तक्तीअ’ किया जाए तो

मिसरा ऊला की बह्र = 221--1212--122 पर ठहरती है [
बह्र-ए-हज़ज मुसद्द्स अख़रब मक़्बूज़ महज़ूफ़]


जब कि

मिसरा सानी की बह्र = 222---212--122 पर ठहरती है

इसी मंच के एक मित्र ने यह सवाल किया है -


-क्या दोनों मिसरों की बह्र अलग अलग है? क्या मिसरा सानी में बह्र बदल रही है

और वो भी ग़ालिब की ग़ज़ल में।


आज इसी पर विचार करते है।

-----

- प्रथम दृष्टया देखने में तो ऐसा ही लगता है । मगर ऐसा है नहीं।


बहर-ए-हज़ज का बुनियादी रुक्न 1222 [ मफ़ाईलुन ] है । इस सालिम रुक्न के साथ एक समस्या है या कहें कि एक ख़ूबी है ।

इस सालिम रुक्न [1222 ] पर ख़र्ब का भी ज़िहाफ़ लग सकता है और ख़रम का भी ज़िहाफ़ लग सकता है और इत्तिफ़ाक़न दोनो हॊ ज़िहाफ़ ’सदर/इब्तिदा-

के लिए मख्सूस [ निर्धारित है] यानी मिसरा के प्रथम मुक़ाम पर ही ये दोनों ज़िहाफ़ लग सकते हैं। यानी


1222+ ख़र्ब से = अख़रब 221[ मफ़ ऊ लु ] हासिल हो सकता है ।


1222+ ख़्ररम से = अख़रम 222 [ मफ़ ऊ लुन]हासिल हो सकता है

और एक बात और

इस बह्र का मिसरा अख़रब से भी शुरु हो सकता है और अख़रम से भी।


[A] अगर मिसरा ’अखरब ’ से शुरु होगा तो

221--1212--122 वज़्न होगा और नाम होगा बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस अखरब मक़बूज़ महज़ूफ़

[B] अगर मिसरा ’अख़रम’ से शुरु होगा तो

222---1212--122 होगा और नाम होगा -बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रम मक़्बूज़ महज़ूफ़

यह दोनॊ बह्रें ज़िहाफ़ के ऐन मुताबिक [विधिवत अमल ] से हासिल हुई है । मान्य है।


अब बह्र [A] को ध्यान से देखें--- इस बह्र में दो adjacent रुक्न [ 221 + 1212 ] में दो 1-1- आमने सामने आ गए यानी तीन मुतहर्रिक हर्फ़

[लाम-मीम-फ़े ] एक साथ आ गए तो ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और दो नया रुक्न 222 --212 बन सकता है और यही बना भी है इस वज़न में।


मगर यह रुक्न- 222 --अख़रम से नही बना है यानी यह अख़रम वाले 222 से जुदा है अलग है, मुख्तलिफ़ है । अगरचे देखने में दोनो की शकल एक जैसी है --जैसे सीता-गीता फ़िल्म में।

कभी कभी अरूज़ में ज़िहाफ़ के अमल से ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक बरामद होते रहते है, जो भ्रम पैदा करते रहते हैं।

सामान्य जन धोखा खा जाते है मगर जो सत्य जानते है, फ़ितरत पहचानते है वो बख़ूबी जानते है कि कौन सीता है कौन गीता है। इन मुज़ाहिफ़ अर्कान पैदाइश कैसे हुई है।

मगर ऐसे अर्कान नाम एक जैसा ही रखा जाता है । इन दोनों केस में -222- का नाम - मफ़ऊलुन-ही रहेगा , बरामद चाहे जैसे हुआ हो। आप को मुतमुईन होना है कि ’रामनरायन’--गाजियाबाद वाले हैं --या बनारस वाले।

ख़ैर

अब बह्र [B] को ध्यान से देखें 222---1212---122 इस वज़न में तख़्नीक़ के अमल की कोई स्थिति ही नही है, न गुंजाइश है, न ज़रूरत है। यह सामान्य प्रक्रिया से हासिल हुई है।


तो ?

बह्र [A] अगर मिसरा उला 221-[ अख़रब] - से शुरु हुआ है तो मिसरा सानी में 222-[ तख़नीक के अमल से] लाने की इज़ाजत है। और मिसरा सानी में इसके साथ

के अर्कान यानी 212--122 भी निभाना ज़रूरी होगा। बहर का नाम नहीं बदलेगा मात्रा भार Same ही रहेगा यानी 16 का 16 ही रहेगा।


बह्र [B] अगर मिसरा अख़रम से शुरु हुआ है तो फिर ऐसी कोई सुविधा इसमें हासिल नहीं होगी और तमाम मिसरा उला-या सानी सब इसी वज़न में निभाने होंगे ।

[ यह मेरा ख़याल है]


आप चाहे तो ग़ालिब की इस ग़ज़ल की पूरी तक्तीअ’ कर मुतमुईन हो सकते हैं।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर


-आनन्द पाठक ’आनन’-

Friday, March 27, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128] : तस्कीन-ए-औसत के बारे में

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128]  : तस्कीन-ए-औसत के बारे में


पिछले अंक में ’तस्कीन-ए-औसत’ पर एक चर्चा की थी। उसी चर्चा को ज़रा और विस्तार देते हैं।

उन पाठकों के लिए जो उस परिचर्चा से वंचित रह गए थे उनके लिए इस अमल की परिभाषा पुन: लिख रहा हूँ।

"---जब किसी -"एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न में तीन मुतहर्रिक एक साथ आ जाए तो *औसत* [ बीच वाला] मुतहर्रिक 

साकिन हो जाता है और एक नया रुक्न बनता है। यह फ़ारसी का अमल है मगर इसके साथ एक शर्त [rider]

भी  है कि इस अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से वह बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए--"


यह कोई नियमित [ रेगुलर]  ज़िहाफ़ नहीं हैं--बल्कि फ़ारसी का एक अमल मात्र  है। परिभाषा पर ध्यान दें--

एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न ? --क्या मतलब?

एकल रुक्न ही क्यों ?अगर दो मुज़ाहिफ़ रुक्न आमने सामने आ जाए तो? यानी दो adjacent रुक्न आ जाए और तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ आ जाएँ तो?

तो क्या ? तब भी तस्कीन ए औसत का अमल हो सकता है । मगर फिर उसे तस्कीन-ए-औसत का अमल न कह कर ’ तख़्नीक़ का अमल’ कहेंगे।

इस पर कभी बाद में चर्चा करेंगे।

एक बार फिर परिभाषा पर ध्यान दें--

मुज़ाहिफ़ रुक्न ही क्यों ? सालिम रुक्न पर इसका अमल क्यों नही कर सकते?? देखते हैं

हम जानते है कि सालिम अर्कान में सिर्फ़ दो ही एकल रुक्न ऐसे है जिसमे 3- मुतहर्रिक एक साथ आते हैं--

[1] बह्र-ए-कामिल का 1 1 2 1 2 [ मु त फ़ा इ लुन] यानी [मीम-ते-फ़े -तीन मुतहर्रिक-एक साथ]

[2] बह्र-ए-वाफ़िर  का 1 2 1 1 2 [ मु फ़ा इ ल तुन ] यानी [ ऐन-लाम- ते  तीन मुतहर्रिक--एक साथ]

अब एक एक कर के देखते है ।

इस बह्र को तो आप पहचानते होंगे

11212---11212----11212---11212

बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम ।


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

बह्र-ए-कामिल की शकल कुछ निम्न लिखित हो जाएगी

2212---2212---2212-------2212


अरे यह क्या हो गया ?? यह तो बह्र ही बदल गई। यह तो  बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम हो गई । और वही शर्त [rider] 

सामने आ गई कि अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए]

यहां तो बह्र कामिल से चल कर रजज़ में चली गईं। यही कारण है तस्कीन का अमल ’सालिम रुक्न/सालिम बह्र-पर नहीं की जाती है


अब दूसरी बह्र वाफ़िर को देखते है 

12112 ---12112---12112---12112 को देखते है

[ बह्र-ए-वाफ़िर मुसम्मन सालिम ]


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

 1222---1222--1222---1222 हो गई

अरे यह क्या हो गया?? यहाँ तो बह्र ही बदल गई। यह बहर तो हज़ज में चली गई।


इसीलिए तस्कीन के अमल के साथ एक Rider ,एक शर्त लगा दिया गया है जिससे बह्रों का आपस में गडमगड न हो, ख़्ल्तमल्त न हों।

यही कारण है कि इस का अमल ’सालिम रुक्न’ पर नही करते हैं। जब भी करते है तो किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न पर ही करते हैं, एकल रुक्न पर करते हैं।


अगली चर्चा में इसी अमल पर अभी कुछ और चर्चा करेंगे,  दिलचस्प बात करेंगे।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

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Tuesday, March 24, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [127] : एक परिचर्चा = बह्र 1121--2122 // 1121--2122 पर

 एक परिचर्चा = बह्र 1121--2122  // 1121--2122 पर


किसी मंच पर एक तरही मुशायरे का अयोजन चल रहा था जिसमें मंच के सदस्य बड़े उत्साह से भाग ले रहे थे।

मुशायरे का तरही मिसरा था --*मिरी ज़िंदगी है नग़मा, मिरी ज़िंदगी तराना*--

और वज़न लिखा था   --1121--2122 // 1121-2122

और नाम दिया गया था- मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन //मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन और बह्र का नाम लिखा गया थ 

बह्र-ए-रमल मुसम्मन मश्कूल सालिम मुज़ाइफ़

-----

[गुस्ताख़ी मुआफ़ी के तहत --

 मेरे हिसाब से वज़न का सही नाम होता -

  फ़ इला तु--फ़ाइलातुन //फ़ इला तु--फ़ाइलातुन 

और यह वज़्न मुसम्मन तो है, मगर *मुज़ाइफ़* नहीं है ]

यह बह्र कैसे बनती है यह आप सब जानते है--मैं आज इस पर चर्चा नहीं करुँगा।

 बल्कि इस बह्र के एक दिलचस्प पहलू पर चर्चा करना चाहता हूँ

।हो सकता है मंच के बहुत से लोग वह दिलचस्प पहलू  जानते है। यह परिचर्चा उन पाठकों के लिए है जो वह नहीं जानते है।

आप सभी ’तस्कीन-ए-औसत ’ के बारे में जानते होंगे। बहुत आसान अमल है 

जब किसी -"एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न में तीन मुतहर्रिक एक साथ आ जाए तो *औसत* [ बीच वाला] मुतहर्रिक साकिन हो जाता है और एक नया रुक्न बनता है। यह फ़ारसी का अमल है मगर इसके साथ एक शर्त [rider]भी  है कि इस अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से वह बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए]


1121--2122 // 1121--2122 पर लगा कर देखते है । लग सकता है 

1121-- फ़ इला तु--  में तीन मुतहर्रिक हर्फ़ [ फ़े-ऐन-लाम ] एक साथ जो आ गए

और फ़ इ लातु - वैसे भी एक मुज़ाहिफ़ रुक्न ही है [ फ़ाइलातुन की] तो लग सकता है

तो इस 1121 को 221 कर सकते है 

 तो उक्त बह्र की  शकल हो जाएगी

221---2122  // 221--2122 

अरे यह क्या हो गया ? यह बह्र तो बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अखरब हो गई।

बस यहीं Rider [शर्त ] सामने आ गई । तस्कीन के अमल से बह्र नहीं बदलनी चाहिए।

अत: 1121--2122 // 1121--2122 पर यह अमल नहीं किया जा सकता।

मतलब कि इस बह्र में

एक मिसरा -1121--2122 // 1121--2122 

दूसरा मिसरा 221---2122  // 221--2122  में नहीं कह सकते इस आधार पर कि  तस्कीन-ए-औसत का अमल किया है।

 नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।]

्सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

8800927181


Saturday, February 21, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [126] : 221--2121--1221--122 वज़न पर एक चर्चा


क़िस्त [126] : 221--2121--1221--122 वज़न पर एक चर्चा

[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ़

प्रश्न : मेरे एक मित्र ने एक प्रश्न किया कि क्या

221---2121---1221---122

यह बह्र मान्य है अस्तित्व में है? क्या इस बहर में कुछ लिखा जा सकता है ?

साथ ही मान्यवर मित्र ने यह भी बताया कि उनके कुछ शायर मित्र ने उन्हे बताया था कि हाँ इस वज़न पर शायरी की जा सकती है ।

उत्तर : इसका एक शब्दीय उत्तर है --नही [ मेरे हिसाब से]

उनके कुछ शायर मित्रों ने उन्हें कहा/ बताया कि हाँ इस वज़न पर शे’र/ग़ज़ल कहे या लिखे जा सकते है। उनके मित्रों के कहे हुए कथन पर कोई टिप्पणी तो नहीं कर सकता, उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकता। यहाँ

हर मोड़ पर किरदार बहुत हैं।

मगर मैं अरूज़ के नियम क़ायदे क़ानून से ही यहाँ बात करूँगा।

हाँ अगर ग़ालिब, मीर, ज़ौक़, दाग़ इक़बाल जौसे शायरों ने अगर इस वज़न और बह्र में कुछ कहा हो उदाहरण हो तो अवश्य विचारणीय ्होगा ।

ख़ैर

अब प्रश्न पर आते है--। इस वज़न पर गज़ल या शे’र क्यों नहीं कहे जा सकते ?

पहला तो यह कि किसी भी वज़न क्रम पर आप कोई मिसरा या शे’र कह सकते है मगर इसका तात्पर्य यह नही कि वह किसी मुस्तनद मान्य बह्र में ही होगा। और यह भी इस उमीद से कह रहें हों कि यह वज़न किसी न किसी बह्र से टकराएगा ही -नाम भले न मालूम हो।


ख़ैर अब प्रश्न पर आते हैं।

[क] -A-- -B--- -C- -D-

221--2121---1221---122

आप यहाँ बस --D- पर ध्यान दें

इसलिये कि नीचे लिखे , हम आप सभी एक बहुत लोकप्रिय मानूस बह्र से पहले से परिचित है और पहले से ही प्रचलन में है।

[ख} -A’-- - D'--- -C'- -D'-

221-- -2121-- -1221---212 जिस पर आप लोगो ने शायरी भी की होगी।

मफ़ऊलु--फ़ाअ’लातुन---मफ़ऊलु---फ़ाअ’लुन और नाम है

बह्र-ए-मुज़ारे’मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़-महज़ूफ़

आप यहाँ -D-[ 122 ] AND D' [ 212 ] पर ध्यान दें ।

सवाल यह कि क्या हम D' [ 212 ] को -D-[ 122 ] कर सकते हैं ?

जवाब है नहीं । क्यों?

कारण की बह्र [ख] बह्र मुज़ारे से विधिवत ज़िहाफ़ लगा कर अरूज़ के ऐन मुताबिक़ हासिल हुआ है [ इसकी चर्चा मै पहले कहीं कर चुका हूँ।

यहाँ पुन: लिखन उचित नही ।

बह्र-ए-मुज़ारे एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम बह्र [ 1222]+ [2122] के योग से बनता है और इसकी मुसम्मन शकल

यूँ होगी

--A--- --B--- --C-- -D-

1222---2122---1222----2122

यहाँ भी -D- [2122] पर ध्यान दें।

2122 = फ़ा इला तुन = पर अगर हज़्फ़ का ज़िहाफ़ लगा दें तो [ जो ज़र्ब/ अरूज़ मुक़ाम के लिए ख़ास हैं] तो हासिल होगा महज़ूफ़ 212


मगर इस सालिम रुक्न [2122 ] में ऐसा कोई ज़िहाफ़ नज़र नही आया जो 2122--को-- 122 कर दे।

अत: मेरे हिसाब से

221---2121--1221--122 से अरूज़ के क़ायदे से कोई मान्य बह्र नही बनती या बन सकती ।


सिर्फ़ किसी भी वज़न के क्रम/अनुक्रम पर शे’र कहना अलग बात है, मनाही नहीं, कर सकते है। कौन रोकता है।

मगर अरूज़ से निर्धारित तय बह्र में शे’र कहना अलग बात है। मरजी आप की।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

Wednesday, January 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [125] : एक शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल और उसकी बह्र ??


क़िस्त : एक शायरा ताजवर सुलताना की एक ग़ज़ल और उसकी बह्र ?
[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।
यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है
अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात
हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।

इसी मंच पर मेरे एक मित्र ने यह सवाल किया था कि -
ताजवर सुल्ताना साहिबा की नीचे लिखी ग़ज़ल किस बह्र में है?
बह्र इन दो बह्रों में से कौन सी बह्र में है।
[क] =बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
या
[ख] =बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
२१२१-२२२-२१२१-२२२

[ नोट = स्थान की कमी के कारण शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल के 2-3 शे’र ही यहाँ पर लगा रहे है पूरी ग़ज़ल इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]
ग़ज़ल [ शायरा :ताजवर सुलताना ]
हुस्न-ओ-इश्क़ का संगम देर तक नहीं रहता
कोई भी हसीं मौसम देर तक नहीं रहता
लौट जाओ रस्ते से तुम नए मुसाफ़िर हो
प्यार का सफ़र हमदम देर तक नहीं रहता
कौन जाने कब किस पर ज़िंदगी ठहर जाए
कोई रुस्तम-ए-आज़म देर तक नहीं रहता

______ताजवर सुल्ताना---
------- -------------------------------- ---
उत्तर : इस ग़ज़ल की बह्र [मेरे ख़याल से और मेरे हिसाब से]
मुक्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक़्तूअ’ है।
अगर आप इस उत्तर से सन्तुष्ट हैं तो आगे बढ़ें, अन्यथा आगे पढ़े ।
किसी ग़ज़ल की बह्र क्या है यह तो शायर खुद ही सही सही बता सकता है, मगर ग़ज़ल के ऊपर बह्र या वज़न लिखने की परम्परा नहीं है। परम्परा अपनी जगह -Inspectory अपनी जगह।
ख़ैर।
फिर भी मित्र के सवाल का जवाब ब नुक़्त-ए-नज़र यथा संभव यथा शक्ति देने की एक कोशिश कर रहा हूँ।
अगरचे ऊपर दिए हुए दोनो वज़न से इस ग़ज़ल की तक़्तीअ की जा सकती है .शायद उन्होने किया भी होगा। दिए हुए वज़न से तक्तीअ’ तो हो सकती है मगर देखना होगा कि उस वज़न से कोई मान्य मुस्तनद बह्र होती भी है क्या? बनती भी हैं क्या ? देखते है--
--- --- ------
[क] बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
यह तो आप जानते ही हॊंगे बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम का वज़न होता है-
= 1222---1222---1222--1222
अगर इस पर -शतर - का ज़िहाफ़ लगाएँ तो ? शतर एक मुरक़्कब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ [ खरम+ क़ब्ज़ ] से मिलकर बना है
और खरम --एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के मुक़ाम सदर/इब्तिदा पर ही लगता है हस्व या ज़र्ब के मुकाम पर नहीं।
1222 + शतर = अश्तर 212 [ फ़ाइलुन ]
अत: हज़ज के मुसम्मन सालिम से निम्न बहर
212--1222---1222--1222 तो बन सकती है जिसमे हस्व के मुक़ाम पर -212-पर नहीं लाया जा सकता।
अत: निम्न बह्र
212--1222---212---1222 वज़न से एक मान्य बहर नहीं बन सकती।अत: इससे उक्त ग़ज़ल की तक़्तीअ’ करने का कोई अर्थ नहीं।
********** ******
अब दूसरी बह्र देखते है
[ख] बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
= २१२१-२२२-२१२१-२२२
मुक्तज़िब एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम रुक्न [ 2221+ 2212 ] से मिल कर बनता है
और इसका मुसम्मन सालिम बहर होगा--
-A-- --B- ---C--- --D--
=2221---2212----2221----2212
[ यहाँ -A- और -C- एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यहाँ -B- और -D एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यानी 2221= मफ़ ऊ लातु = [ बह्र-ए-मुक़्तज़िब का बुनियादी रुक्न ]
इस पर कुछ ज़िहाफ़ लगा कर देखते है--
A= 2221+ तय्यी = मुतव्वी 2121 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो यहाँ सदर के मुक़ाम पर आया है
B= 2212 + तय्यी = मुतव्वी 2112 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो जो यहाँ हस्व के मुक़ाम पर आया है
अगर इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल [ तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए हैं किया जाए
तो 2112= 222 हो जायेगा और इसे "मुतव्वी मुसक्किन" बोलेंगे।
C = A= 2121
D = 2212 + क़तअ’= मक्तूअ" 222 = मक्तूअ’ एक खास ज़िहाफ़ है जो अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है जो यहाँ अरुज़/ज़र्ब के मुक़ाम पर
= आया है
अत: बह्र [ख] का स्वरूप हो गया
-a-- ---b--- --c-- --d---
[ख] = 2121---222----2121---222- जिससे मित्र ने तक्तीअ’ करने की कोशिश की।
ध्यान रहे-----b-- और --d--- का वज़न समान है पर दोनो का वज़न भिन्न भिन्न अमल से प्राप्त हुआ है।
और इस बह्र क नाम होगा
बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक्तूअ’ --जो एक मुस्तनद[प्रामाणिक] बह्र है।
अच्छा यह बह्र इत्तिफ़ाक़न -बह्र-ए-शिकस्ता भी है । यानी
2121---222-//-2121---222-

अब ताजवर सुलताना की ग़ज़ल की तक़्तीअ इस वज़न पर कर के देखते है। अगर तक़्तीअ’ इस बह्र और इस वज़न पर सही सही उतर जाए
तो ग़ज़ल की बहर यह हो सकती है।
सादर
-आनन्द पाठक ’आनन’
[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
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Tuesday, January 13, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [124]: बह्र का वज़न एक और नाम दो

उर्दू बह्र पर एक बातचीत: क़िस्त 124  : बह्र का वज़न एक और नाम दो

[ यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है 

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात 

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।


मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया था कि बह्र-ए-मदीद क्या एक शिकस्ता: बह्र है ?

मैने इसका जवाब तो उन्हे दे दिया वह सन्तुष्ट हुए या नहीं  मालूम नहीं, पर जवाब देने और अध्ययन के दौरान एक

दिलचस्प वाक़िया भी पेश नज़र आया । और वह यह कि दो बह्र की वज़न तो एक है मगर नाम मुख्तलिफ़ है।

ऐसा ही एक वाक़िया पहले भी नज़र आया था जिसको मैने अपने ब्लाग 

www.arooz.co.in  [क़िस्त 74 ] लिखा था।आप वहाँ पढ़ सकते हैं

ऐसा ही एक मसला  -22--22--22--22- वाली बह्र पर उठता है ।


मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि सिर्फ़ यह वज़न मात्र लिख देने से ही काम न चलेगा। लोग बह्र का नाम नहीं लिखते बस इसी  numerical system से ग़ज़ल लिख लेते हैं । मगर मेरे एक सवाल है कि  आप के सभी मिसरे 22--22--22--22 पर होते हैं क्या? मिसरे मे कहीं -1- नहीं आता क्या ? तो फिर 22--22--22--22 का मतलब क्या?

मैं बार बार कहत हूँ कि 22--22--22--22 खुद में बह्र नहीं ।अपितु मात्र किसी मूल बह्र का एक वज़न /एक स्वरूप मात्र है  यही वज़न दो- मुख्तलिफ़ मूल बह्र से बरामद हो सकती है।


[क] --मुतक़ारिब खानदान से भी

[ख] -- मुतदारिक खानदान से भी


मात्र 22--22--22--22-- लिख देने से यह पता नहीं चलता कि आप किस खानदान वाली बह्र की बात कर रहे है या ग़ज़ल लिख रहे हैं और उस पर अफ़सोस यह कि कुछ दोस्त इसे मीर की बह्र कह देते है या से मन्सूब कर देते है।

ख़ैर इस विषय पर कभॊ बाद में विस्तार से बात करेंगे।

अरूज़ एक बहुत आसान विषय है और जब आप इससे खेलते हैं तो ऐसे ही दिलचस्प वाक़ियात नमूद [ प्रगट] होते रहते है।

आज का आलेख इसी विषय पर है। आप भी आनन्द उठाएँ और अपनी राय दें ।  

अब अपने मित्र के मूल प्रश्न पर आते है  बह्र-ए-मदीद के बारे में

 आप जानते है कि बह्र-ए-मदीद उर्दू के प्रचलित बह्रों में से एक मान्य बह्र है । यह बात अलग है कि इस बह्र[मदीद] में बहुत कम शायरी 

हुई } मगर मान्य बहर तो है ही।

 बह्र-ए-मदीद एक मुरक़्कब बहर है और इसका बुनियादी  वज़न होता है--

2122---212  [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन ]

और इसकी सालिम मुसम्मन  शकल होती है 


[क] 2122--212---2122---212 = नाम होगा बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम

अच्छा 2122---2122 [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ] इस  बह्र को आप ज़रूर पहचानते होंगे? 

अरे वही बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम

अच्छा अब आख़िरी वाले [ ज़र्ब/अरूज के मुकाम वाले] 2122 पर एक ज़िहाफ़[ हज़्फ़ का ज़िहाफ़ ]लगा कर देखते है --क्या होता है

2122+ हज़फ़ = 212 [ फ़ाइलुन ] महज़ूफ़  होगा

यानी 

बह्र 2122 -2122  अब 

2122-212 हो गई । मतलब बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ हो गई

अब इसे दोगुना कर दें यानी मुज़ाइफ़ कर दे तो क्या होगा "?

[ख]   2122-212- 2122--212

बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ मुज़ाइफ़

फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन // फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन  

और इसका नाम होगा      

अब [क] और [ख] की तुलना कीजिए

क्या दोनो बह्र  का वज़न एक नहीं है ? और नाम मुख्तलिफ़ नहीं है ?

इसी लिए कहता हूँ कि सिर्फ़ वज़न लिख देने से ही काम नहीं चलेगा --बह्र का नाम भी लिख दे तो बेहतर।

और न लिखें तो और भी बेहतर?

अच्छा तो एक सवाल -- हम पहचानेंगे कैसे कि

2122--212---2122--212  यह बह्र मदीद से हासिल हुआ कि रमल से हासिल हुआ ?

इसका जवाब कभी अगले क़िस्त में।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 

ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-






Sunday, January 4, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [ क़िस्त 123 ] : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे में

 विषय : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे मे

यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से [ परिभाषाओं से] वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद [ लाभान्वित] होना चाहते है ।

---A-- --B-- -C-- -D-

बह्र 1212----1122--------1212---22

मेरे मित्र का इस बह्र के बारे में एक सवाल था -
क्या तीसरे मुक़ाम यानी C [हस्व] पर जो 1212 रुक्न दिखाई दे रहा है

क्या उसे -1122 - ले सकते हैं??

उत्तर : नहीं [ मेरे हिसाब से]

----- ----

फिर अगला सवाल यह होगा कि क्यों नहीं ले सकते?

तो जवाब ज़रा विस्तार से देना होगा ।


1212---1122---1212---22

इस बह्र को आप सब पहचानते होंगे। बड़ी लोकप्रिय और प्रचलित बहर है। अमूमन सभी शायरों ने [यह ख़ाकसार सहित] इस बह्र में शायरी की है

इस बह्र का नाम है -

बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़

हम जानते हैं कि बह्र-ए-मुज्तस एक मुरक़्कब [ मिश्रित ] बह्र है यानी दो सालिम रुक्न [2212+ 2122 ] से मिल कर बनती है और इसकी

मुसम्मन शकल होती है

-A--- --B-- --C- --D--

2212-- 2122-----2212---2122

मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन --मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन

[ मुस तफ़अ’ लुन --पर ध्यान दीजिएगा । इसकी चर्चा आगे करेंगे]

अगर इन सालिम अर्कान पर ज़िहाफ़ लगाते चले तो

A & C = 2212 + ख़ब्न = मख्बून 1212

B =2122 + ख़ब्न = मख़्बून 1122

D 2122 +ख़ब्न +हज़्फ़ = 22

यानी इस बह्र की शकल अब यूं हो जायेगी-

1212---1122----1212---22

और यही बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख्बून महज़ूफ़ है जिससे आप सभी परिचित है।

--- ---- --

मगर सवाल ?

सवाल तो अभी वहीं खड़ा है कि

C वाले मुकाम पर 2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] को 1122 कर सकते या ले सकते है या नहीं??

2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] --बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है और इस रुक्न पर ऐसा कोई ज़िहाफ़ नहीं है जो इसे

1122 कर सके ।

अत: 2212 को 1122 नहीं कर सकते।

[ चलते चलते एक बात और --मुसतफ़इलुन [2212 -पर

मुसतफ़इलुन [2212 को उर्दू इमला में लिखने की दो शकलें है

एक तो यह

2 2 12 [ सबब + सबब + वतद-ए-मजमुआ ] -12- पर ध्याद दें यह वतद ए मज्मुआ की शकल है [ मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक+ साकिन]

जिसे मुतस्सिल शकल कहते है यानी सभी हर्फ़ मिला कर, सिलसिले से लिखते हैं ।


दूसरी यह --

मुस तफ़अ’ लुन = 2 21 2 [ सबब + वतद-ए-मफ़रूक़ ]

-21 [ तफ़ अ’] पर ध्यान दे यह वतद -ए-मफ़रूक़ है [ मुतहर्रिक+ साकिन+ मुतहर्रिक]

यानी इसमे दो मुतहर्रिक में फ़र्क है बीच में साकिन हर्फ़ है इसी लिए इसे मफ़रूकी [ यानी फ़र्क़ वाली] शकल कहते है। इसमे इमला में वतद को फ़र्क दे कर लिखते है


अगरचे दोनो का वज़न और लगभग तलफ़्फ़ुज़ same है


तो यह बात बताने की क्या ज़रूरत थी?

ज़रूरत यह थी कि दोनॊ शकलों के ्ज़िहाफ़ अलग अलग होते है।


और मुज्तस में यही बतद अपने मफ़रूक़ी शकल में है यहाँ


एक बात और --उर्दू शायरी में ्बह्र-ए-मुज्तस अपनी सालिम शकल यानी [2212 + 2122]--[2212-+--2122 } में

प्रचलन में नहीं है।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-