Saturday, February 21, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [126] : 221--2121--1221--122 वज़न पर एक चर्चा


क़िस्त [126] : 221--2121--1221--122 वज़न पर एक चर्चा

[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ़

प्रश्न : मेरे एक मित्र ने एक प्रश्न किया कि क्या

221---2121---1221---122

यह बह्र मान्य है अस्तित्व में है? क्या इस बहर में कुछ लिखा जा सकता है ?

साथ ही मान्यवर मित्र ने यह भी बताया कि उनके कुछ शायर मित्र ने उन्हे बताया था कि हाँ इस वज़न पर शायरी की जा सकती है ।

उत्तर : इसका एक शब्दीय उत्तर है --नही [ मेरे हिसाब से]

उनके कुछ शायर मित्रों ने उन्हें कहा/ बताया कि हाँ इस वज़न पर शे’र/ग़ज़ल कहे या लिखे जा सकते है। उनके मित्रों के कहे हुए कथन पर कोई टिप्पणी तो नहीं कर सकता, उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकता। यहाँ

हर मोड़ पर किरदार बहुत हैं।

मगर मैं अरूज़ के नियम क़ायदे क़ानून से ही यहाँ बात करूँगा।

हाँ अगर ग़ालिब, मीर, ज़ौक़, दाग़ इक़बाल जौसे शायरों ने अगर इस वज़न और बह्र में कुछ कहा हो उदाहरण हो तो अवश्य विचारणीय ्होगा ।

ख़ैर

अब प्रश्न पर आते है--। इस वज़न पर गज़ल या शे’र क्यों नहीं कहे जा सकते ?

पहला तो यह कि किसी भी वज़न क्रम पर आप कोई मिसरा या शे’र कह सकते है मगर इसका तात्पर्य यह नही कि वह किसी मुस्तनद मान्य बह्र में ही होगा। और यह भी इस उमीद से कह रहें हों कि यह वज़न किसी न किसी बह्र से टकराएगा ही -नाम भले न मालूम हो।


ख़ैर अब प्रश्न पर आते हैं।

[क] -A-- -B--- -C- -D-

221--2121---1221---122

आप यहाँ बस --D- पर ध्यान दें

इसलिये कि नीचे लिखे , हम आप सभी एक बहुत लोकप्रिय मानूस बह्र से पहले से परिचित है और पहले से ही प्रचलन में है।

[ख} -A’-- - D'--- -C'- -D'-

221-- -2121-- -1221---212 जिस पर आप लोगो ने शायरी भी की होगी।

मफ़ऊलु--फ़ाअ’लातुन---मफ़ऊलु---फ़ाअ’लुन और नाम है

बह्र-ए-मुज़ारे’मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़-महज़ूफ़

आप यहाँ -D-[ 122 ] AND D' [ 212 ] पर ध्यान दें ।

सवाल यह कि क्या हम D' [ 212 ] को -D-[ 122 ] कर सकते हैं ?

जवाब है नहीं । क्यों?

कारण की बह्र [ख] बह्र मुज़ारे से विधिवत ज़िहाफ़ लगा कर अरूज़ के ऐन मुताबिक़ हासिल हुआ है [ इसकी चर्चा मै पहले कहीं कर चुका हूँ।

यहाँ पुन: लिखन उचित नही ।

बह्र-ए-मुज़ारे एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम बह्र [ 1222]+ [2122] के योग से बनता है और इसकी मुसम्मन शकल

यूँ होगी

--A--- --B--- --C-- -D-

1222---2122---1222----2122

यहाँ भी -D- [2122] पर ध्यान दें।

2122 = फ़ा इला तुन = पर अगर हज़्फ़ का ज़िहाफ़ लगा दें तो [ जो ज़र्ब/ अरूज़ मुक़ाम के लिए ख़ास हैं] तो हासिल होगा महज़ूफ़ 212


मगर इस सालिम रुक्न [2122 ] में ऐसा कोई ज़िहाफ़ नज़र नही आया जो 2122--को-- 122 कर दे।

अत: मेरे हिसाब से

221---2121--1221--122 से अरूज़ के क़ायदे से कोई मान्य बह्र नही बनती या बन सकती ।


सिर्फ़ किसी भी वज़न के क्रम/अनुक्रम पर शे’र कहना अलग बात है, मनाही नहीं, कर सकते है। कौन रोकता है।

मगर अरूज़ से निर्धारित तय बह्र में शे’र कहना अलग बात है। मरजी आप की।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

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