क़िस्त : एक शायरा ताजवर सुलताना की एक ग़ज़ल और उसकी बह्र ?
[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।
यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है
अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात
हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।
इसी मंच पर मेरे एक मित्र ने यह सवाल किया था कि -
ताजवर सुल्ताना साहिबा की नीचे लिखी ग़ज़ल किस बह्र में है?
बह्र इन दो बह्रों में से कौन सी बह्र में है।
[क] =बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
या
[ख] =बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
२१२१-२२२-२१२१-२२२
[ नोट = स्थान की कमी के कारण शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल के 2-3 शे’र ही यहाँ पर लगा रहे है पूरी ग़ज़ल इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]
ग़ज़ल [ शायरा :ताजवर सुलताना ]
हुस्न-ओ-इश्क़ का संगम देर तक नहीं रहता
कोई भी हसीं मौसम देर तक नहीं रहता
लौट जाओ रस्ते से तुम नए मुसाफ़िर हो
प्यार का सफ़र हमदम देर तक नहीं रहता
कौन जाने कब किस पर ज़िंदगी ठहर जाए
कोई रुस्तम-ए-आज़म देर तक नहीं रहता
______ताजवर सुल्ताना---
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उत्तर : इस ग़ज़ल की बह्र [मेरे ख़याल से और मेरे हिसाब से]
मुक्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक़्तूअ’ है।
अगर आप इस उत्तर से सन्तुष्ट हैं तो आगे बढ़ें, अन्यथा आगे पढ़े ।
किसी ग़ज़ल की बह्र क्या है यह तो शायर खुद ही सही सही बता सकता है, मगर ग़ज़ल के ऊपर बह्र या वज़न लिखने की परम्परा नहीं है। परम्परा अपनी जगह -Inspectory अपनी जगह।
ख़ैर।
फिर भी मित्र के सवाल का जवाब ब नुक़्त-ए-नज़र यथा संभव यथा शक्ति देने की एक कोशिश कर रहा हूँ।
अगरचे ऊपर दिए हुए दोनो वज़न से इस ग़ज़ल की तक़्तीअ की जा सकती है .शायद उन्होने किया भी होगा। दिए हुए वज़न से तक्तीअ’ तो हो सकती है मगर देखना होगा कि उस वज़न से कोई मान्य मुस्तनद बह्र होती भी है क्या? बनती भी हैं क्या ? देखते है--
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[क] बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
यह तो आप जानते ही हॊंगे बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम का वज़न होता है-
= 1222---1222---1222--1222
अगर इस पर -शतर - का ज़िहाफ़ लगाएँ तो ? शतर एक मुरक़्कब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ [ खरम+ क़ब्ज़ ] से मिलकर बना है
और खरम --एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के मुक़ाम सदर/इब्तिदा पर ही लगता है हस्व या ज़र्ब के मुकाम पर नहीं।
1222 + शतर = अश्तर 212 [ फ़ाइलुन ]
अत: हज़ज के मुसम्मन सालिम से निम्न बहर
212--1222---1222--1222 तो बन सकती है जिसमे हस्व के मुक़ाम पर -212-पर नहीं लाया जा सकता।
अत: निम्न बह्र
212--1222---212---1222 वज़न से एक मान्य बहर नहीं बन सकती।अत: इससे उक्त ग़ज़ल की तक़्तीअ’ करने का कोई अर्थ नहीं।
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अब दूसरी बह्र देखते है
[ख] बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
= २१२१-२२२-२१२१-२२२
मुक्तज़िब एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम रुक्न [ 2221+ 2212 ] से मिल कर बनता है
और इसका मुसम्मन सालिम बहर होगा--
-A-- --B- ---C--- --D--
=2221---2212----2221----2212
[ यहाँ -A- और -C- एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यहाँ -B- और -D एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यानी 2221= मफ़ ऊ लातु = [ बह्र-ए-मुक़्तज़िब का बुनियादी रुक्न ]
इस पर कुछ ज़िहाफ़ लगा कर देखते है--
A= 2221+ तय्यी = मुतव्वी 2121 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो यहाँ सदर के मुक़ाम पर आया है
B= 2212 + तय्यी = मुतव्वी 2112 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो जो यहाँ हस्व के मुक़ाम पर आया है
अगर इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल [ तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए हैं किया जाए
तो 2112= 222 हो जायेगा और इसे "मुतव्वी मुसक्किन" बोलेंगे।
C = A= 2121
D = 2212 + क़तअ’= मक्तूअ" 222 = मक्तूअ’ एक खास ज़िहाफ़ है जो अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है जो यहाँ अरुज़/ज़र्ब के मुक़ाम पर
= आया है
अत: बह्र [ख] का स्वरूप हो गया
-a-- ---b--- --c-- --d---
[ख] = 2121---222----2121---222- जिससे मित्र ने तक्तीअ’ करने की कोशिश की।
ध्यान रहे-----b-- और --d--- का वज़न समान है पर दोनो का वज़न भिन्न भिन्न अमल से प्राप्त हुआ है।
और इस बह्र क नाम होगा
बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक्तूअ’ --जो एक मुस्तनद[प्रामाणिक] बह्र है।
अच्छा यह बह्र इत्तिफ़ाक़न -बह्र-ए-शिकस्ता भी है । यानी
2121---222-//-2121---222-
अब ताजवर सुलताना की ग़ज़ल की तक़्तीअ इस वज़न पर कर के देखते है। अगर तक़्तीअ’ इस बह्र और इस वज़न पर सही सही उतर जाए
तो ग़ज़ल की बहर यह हो सकती है।
सादर
-आनन्द पाठक ’आनन’
[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
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