Sunday, January 4, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [ क़िस्त 123 ] : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे में

 विषय : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे मे

यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से [ परिभाषाओं से] वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद [ लाभान्वित] होना चाहते है ।

---A-- --B-- -C-- -D-

बह्र 1212----1122--------1212---22

मेरे मित्र का इस बह्र के बारे में एक सवाल था -
क्या तीसरे मुक़ाम यानी C [हस्व] पर जो 1212 रुक्न दिखाई दे रहा है

क्या उसे -1122 - ले सकते हैं??

उत्तर : नहीं [ मेरे हिसाब से]

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फिर अगला सवाल यह होगा कि क्यों नहीं ले सकते?

तो जवाब ज़रा विस्तार से देना होगा ।


1212---1122---1212---22

इस बह्र को आप सब पहचानते होंगे। बड़ी लोकप्रिय और प्रचलित बहर है। अमूमन सभी शायरों ने [यह ख़ाकसार सहित] इस बह्र में शायरी की है

इस बह्र का नाम है -

बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़

हम जानते हैं कि बह्र-ए-मुज्तस एक मुरक़्कब [ मिश्रित ] बह्र है यानी दो सालिम रुक्न [2212+ 2122 ] से मिल कर बनती है और इसकी

मुसम्मन शकल होती है

-A--- --B-- --C- --D--

2212-- 2122-----2212---2122

मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन --मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन

[ मुस तफ़अ’ लुन --पर ध्यान दीजिएगा । इसकी चर्चा आगे करेंगे]

अगर इन सालिम अर्कान पर ज़िहाफ़ लगाते चले तो

A & C = 2212 + ख़ब्न = मख्बून 1212

B =2122 + ख़ब्न = मख़्बून 1122

D 2122 +ख़ब्न +हज़्फ़ = 22

यानी इस बह्र की शकल अब यूं हो जायेगी-

1212---1122----1212---22

और यही बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख्बून महज़ूफ़ है जिससे आप सभी परिचित है।

--- ---- --

मगर सवाल ?

सवाल तो अभी वहीं खड़ा है कि

C वाले मुकाम पर 2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] को 1122 कर सकते या ले सकते है या नहीं??

2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] --बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है और इस रुक्न पर ऐसा कोई ज़िहाफ़ नहीं है जो इसे

1122 कर सके ।

अत: 2212 को 1122 नहीं कर सकते।

[ चलते चलते एक बात और --मुसतफ़इलुन [2212 -पर

मुसतफ़इलुन [2212 को उर्दू इमला में लिखने की दो शकलें है

एक तो यह

2 2 12 [ सबब + सबब + वतद-ए-मजमुआ ] -12- पर ध्याद दें यह वतद ए मज्मुआ की शकल है [ मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक+ साकिन]

जिसे मुतस्सिल शकल कहते है यानी सभी हर्फ़ मिला कर, सिलसिले से लिखते हैं ।


दूसरी यह --

मुस तफ़अ’ लुन = 2 21 2 [ सबब + वतद-ए-मफ़रूक़ ]

-21 [ तफ़ अ’] पर ध्यान दे यह वतद -ए-मफ़रूक़ है [ मुतहर्रिक+ साकिन+ मुतहर्रिक]

यानी इसमे दो मुतहर्रिक में फ़र्क है बीच में साकिन हर्फ़ है इसी लिए इसे मफ़रूकी [ यानी फ़र्क़ वाली] शकल कहते है। इसमे इमला में वतद को फ़र्क दे कर लिखते है


अगरचे दोनो का वज़न और लगभग तलफ़्फ़ुज़ same है


तो यह बात बताने की क्या ज़रूरत थी?

ज़रूरत यह थी कि दोनॊ शकलों के ्ज़िहाफ़ अलग अलग होते है।


और मुज्तस में यही बतद अपने मफ़रूक़ी शकल में है यहाँ


एक बात और --उर्दू शायरी में ्बह्र-ए-मुज्तस अपनी सालिम शकल यानी [2212 + 2122]--[2212-+--2122 } में

प्रचलन में नहीं है।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


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