Tuesday, July 7, 2026

उर्दू बहर पर एक बातचीत [क़िस्त 135]: बह्र 2121--222---2121---222 और बह्र 212---1222----212--1222 में अन्तर

  [क़िस्त 135]:  बह्र  2121--222---2121---222  और बह्र   212---1222----212--1222 में अन्तर

सवाल : मेरे एक मित्र ने सवाल किया था नीचे लिखे हुए बह्रों में क्या अन्तर है ?

 [अ] 2121--222---2121---222

[ब]   212---1222----212--1222

उत्तर सीधा है  -यह दो अलग अलग [मुख्तलिफ़] बह्र हैं और दोनों के अलग अलग अरूज़ी नाम भी हैं

[अ]  -यह एक मुरक़्क़ब बहर है जो बह्र-ए-मुक्तज़िब से निकलती या बरामद होती है

[ब] -- यह सालिम बह्र, बह्र-ए- हज़ज से निकलती है।

 मगर--मेरे मित्र को यह दुविधा क्यों उत्पन्न हुई?

- हो सकता है कि उन्होने या उनके  किसी अन्य मित्र ने  ग़ज़ल की तक्तीअ’ दोनों बहरों से कर दी हो और दोनो का वज़न सही उतरा हो 

- शायद उन्होने सोचा हो कि बह्र [अ] का 2121 का -1- अगर सामने वाले रुक्न से जोड़ दिया जाए तो बह्र[ब] बरामद हो जाएगी। तो अन्तर क्या?

 इस आलेख में इन्हीं सब बातों की चर्चा करेंगे। यह लेख उन अहबाब के मद्दे नज़र लिखा गया है जो अरूज़ से ज़ौक़-0-शौक़ फ़रमाते है

अरूज़ आशना है।

उर्दू वाले रुक्न को उनके नाम से --जैसे फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन--जानते पहचानते पुकारते  हैं

हम हिंदी वाले  212--1222 से जानते पहचानते है ।  ऐसे Numerical अलामत एक रुक्न की नुमाईंदगी करते है

1- 2 फ़ार्म में दिखाना-- आसान लगता है -लघु-दीर्घ-दीर्घ --

[ हमा्री भोजपुरी भाषा में एक कहावत है---अन्हरा बिना रहियो न जाय, अन्हरा से अँखियों पिराय। 

इसका अर्थ/भाव/मतलब आप सब जानते होंगे]


ख़ैर अपनी अपनी सुविधा है। कभी कभी हम इस पर Mathematical Operation भी कर देते हैं

1+1=2 कर देते हैं । हाँ कर सकते [ विशेष परिस्थितियों में] 

मगर -2-को हम 1 -1 नहीं कर सकते। क्यों ? इसकी चर्चा कभी बाद में करेंगे।

हाँ मूल विषय पर आते हैं-

[अ] 2121--222---2121--222  बह्र  पर चर्चा करते है

यह एक मुरक़्कब बह्र है और यह दो-सालिम रुक्न से बनता है

2221  + 2212 यानी मफ़ऊलातु + मुस तफ़ इलुन

और इस पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगाने से 

2121---222---2121---222 बरामद होती है 

फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन--फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन

और नाम है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी, मुतव्वी मुसक्किन, मुतव्वी, मक़्तूअ’

[ इस बह्र में और भी कुछ नुकते की बात है जो अभी या यहाँ ज़िक्र करना न ज़रूरी है, न मुनासिब है। 


अब दूसरी बह्र पर आते हैं।

[ब] : 212--1222--212--1222

यह बह्र , बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम से बरामद होती है यानी

1222---1222--1222--1222- पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगा दें तो 


  221---1222---221---1222

मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन--मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन

यानी   हज़ज मुसम्म्न अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुसम्मन सालिम अलअखिर

[ इस बह्र में और भी कुछ नुकते की बात है जो अभी या यहाँ ज़िक्र करना न ज़रूरी है, न मुनासिब है। ]

सवाल का जवाब यही तक ।


मगर एक सवाल मेरा --

अगर किसी ग़ज़ल या शे’र की तक्तीअ दो या दो से अधिक तरीके से की जा सकती है तो कौन सा तक्तीअ सही

मानना चाहिए क़ुबूल करना चाहिए।

मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा। ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ

सादर 

-आनन्द पाठक ’आनन’-