Friday, March 27, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128] : तस्कीन-ए-औसत के बारे में

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128]  : तस्कीन-ए-औसत के बारे में


पिछले अंक में ’तस्कीन-ए-औसत’ पर एक चर्चा की थी। उसी चर्चा को ज़रा और विस्तार देते हैं।

उन पाठकों के लिए जो उस परिचर्चा से वंचित रह गए थे उनके लिए इस अमल की परिभाषा पुन: लिख रहा हूँ।

"---जब किसी -"एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न में तीन मुतहर्रिक एक साथ आ जाए तो *औसत* [ बीच वाला] मुतहर्रिक 

साकिन हो जाता है और एक नया रुक्न बनता है। यह फ़ारसी का अमल है मगर इसके साथ एक शर्त [rider]

भी  है कि इस अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से वह बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए--"


यह कोई नियमित [ रेगुलर]  ज़िहाफ़ नहीं हैं--बल्कि फ़ारसी का एक अमल मात्र  है। परिभाषा पर ध्यान दें--

एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न ? --क्या मतलब?

एकल रुक्न ही क्यों ?अगर दो मुज़ाहिफ़ रुक्न आमने सामने आ जाए तो? यानी दो adjacent रुक्न आ जाए और तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ आ जाएँ तो?

तो क्या ? तब भी तस्कीन ए औसत का अमल हो सकता है । मगर फिर उसे तस्कीन-ए-औसत का अमल न कह कर ’ तख़्नीक़ का अमल’ कहेंगे।

इस पर कभी बाद में चर्चा करेंगे।

एक बार फिर परिभाषा पर ध्यान दें--

मुज़ाहिफ़ रुक्न ही क्यों ? सालिम रुक्न पर इसका अमल क्यों नही कर सकते?? देखते हैं

हम जानते है कि सालिम अर्कान में सिर्फ़ दो ही एकल रुक्न ऐसे है जिसमे 3- मुतहर्रिक एक साथ आते हैं--

[1] बह्र-ए-कामिल का 1 1 2 1 2 [ मु त फ़ा इ लुन] यानी [मीम-ते-फ़े -तीन मुतहर्रिक-एक साथ]

[2] बह्र-ए-वाफ़िर  का 1 2 1 1 2 [ मु फ़ा इ ल तुन ] यानी [ ऐन-लाम- ते  तीन मुतहर्रिक--एक साथ]

अब एक एक कर के देखते है ।

इस बह्र को तो आप पहचानते होंगे

11212---11212----11212---11212

बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम ।


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

बह्र-ए-कामिल की शकल कुछ निम्न लिखित हो जाएगी

2212---2212---2212-------2212


अरे यह क्या हो गया ?? यह तो बह्र ही बदल गई। यह तो  बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम हो गई । और वही शर्त [rider] 

सामने आ गई कि अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए]

यहां तो बह्र कामिल से चल कर रजज़ में चली गईं। यही कारण है तस्कीन का अमल ’सालिम रुक्न/सालिम बह्र-पर नहीं की जाती है


अब दूसरी बह्र वाफ़िर को देखते है 

12112 ---12112---12112---12112 को देखते है

[ बह्र-ए-वाफ़िर मुसम्मन सालिम ]


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

 1222---1222--1222---1222 हो गई

अरे यह क्या हो गया?? यहाँ तो बह्र ही बदल गई। यह बहर तो हज़ज में चली गई।


इसीलिए तस्कीन के अमल के साथ एक Rider ,एक शर्त लगा दिया गया है जिससे बह्रों का आपस में गडमगड न हो, ख़्ल्तमल्त न हों।

यही कारण है कि इस का अमल ’सालिम रुक्न’ पर नही करते हैं। जब भी करते है तो किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न पर ही करते हैं, एकल रुक्न पर करते हैं।


अगली चर्चा में इसी अमल पर अभी कुछ और चर्चा करेंगे,  दिलचस्प बात करेंगे।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

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