: बह्र 212--212--212-2122 पर एक चर्चा
मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया था कि बह्र
212---212---212---2122 एक वैध और मान्य बह्र है या हो सकती है ?
यह आलेख उसी संदर्भ में लिखा गया है ।
Technically and strictly यह बह्र और यह वज़न मुमकिन तो है मगर
pragmatically और व्यावाहारिक रूप से इस बह्र के साथ कुछ संकोच भी है।
तरफ़ैल-एक ज़िहाफ़ का नाम है जिसका इस्तेमाल 212 पर किया जा सकता है।
यह ज़िहाफ़ ख़ास तौर से शे’र के अरूज़/ज़र्ब मुक़ाम के लिए होता है यानी शे’र के आख़िरी रुक्न के मुक़ाम के लिए। अगर इसका अमल 212 पर करें तो।
212 + तरफ़ैल = मुरफ़्फ़ल 2122 होगा और ऐसा अमल किया तो जा सकता है मनाही नही।
मगर--
-तरफ़ैल- ज़िहाफ़ वस्तुत: अरबी का ख़ास ज़िहाफ़ है, फ़ारसी में इसका इस्तेमाल बहुत कम हुआ है और उर्दू में भी इसका रिवाज नहीं है, लगभग -न- के बराबर । अरूज़ मे इस बह्र में यह ज़िहाफ़’मतरूक’ [ छोड़ा हुआ ,त्यागा हुआ] की हैसियत रखता है। अत: यह बह्र और यह वज़न बहुत प्रचलन में नहीं है। लोकप्रिय भी नही है।
लोग इस बह्र में शायरी करने से गुरेज़ करते है।
प्रचलन में या रिवाज़ में होना न होना अलग बात है। और अरूज़ के ऐन क़ायदे के मुताबिक वज़ूद में होना अलग बात है।
अगर आप इस वज़न/ बह्र में शायरी कर सकते है तो कर सकते है -मनाही नहीं।
" लीक छाड़ि तीनौ चलें--’शायर’-सिंह -सपूत
[ नोट- असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही फ़रमा दे जिससे
मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।
सादर
आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181
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