Tuesday, January 13, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [124]: बह्र का वज़न एक और नाम दो

उर्दू बह्र पर एक बातचीत: क़िस्त 124  : बह्र का वज़न एक और नाम दो

[ यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है 

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात 

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।


मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया था कि बह्र-ए-मदीद क्या एक शिकस्ता: बह्र है ?

मैने इसका जवाब तो उन्हे दे दिया वह सन्तुष्ट हुए या नहीं  मालूम नहीं, पर जवाब देने और अध्ययन के दौरान एक

दिलचस्प वाक़िया भी पेश नज़र आया । और वह यह कि दो बह्र की वज़न तो एक है मगर नाम मुख्तलिफ़ है।

ऐसा ही एक वाक़िया पहले भी नज़र आया था जिसको मैने अपने ब्लाग 

www.arooz.co.in  [क़िस्त 74 ] लिखा था।आप वहाँ पढ़ सकते हैं

ऐसा ही एक मसला  -22--22--22--22- वाली बह्र पर उठता है ।


मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि सिर्फ़ यह वज़न मात्र लिख देने से ही काम न चलेगा। लोग बह्र का नाम नहीं लिखते बस इसी  numerical system से ग़ज़ल लिख लेते हैं । मगर मेरे एक सवाल है कि  आप के सभी मिसरे 22--22--22--22 पर होते हैं क्या? मिसरे मे कहीं -1- नहीं आता क्या ? तो फिर 22--22--22--22 का मतलब क्या?

मैं बार बार कहत हूँ कि 22--22--22--22 खुद में बह्र नहीं ।अपितु मात्र किसी मूल बह्र का एक वज़न /एक स्वरूप मात्र है  यही वज़न दो- मुख्तलिफ़ मूल बह्र से बरामद हो सकती है।


[क] --मुतक़ारिब खानदान से भी

[ख] -- मुतदारिक खानदान से भी


मात्र 22--22--22--22-- लिख देने से यह पता नहीं चलता कि आप किस खानदान वाली बह्र की बात कर रहे है या ग़ज़ल लिख रहे हैं और उस पर अफ़सोस यह कि कुछ दोस्त इसे मीर की बह्र कह देते है या से मन्सूब कर देते है।

ख़ैर इस विषय पर कभॊ बाद में विस्तार से बात करेंगे।

अरूज़ एक बहुत आसान विषय है और जब आप इससे खेलते हैं तो ऐसे ही दिलचस्प वाक़ियात नमूद [ प्रगट] होते रहते है।

आज का आलेख इसी विषय पर है। आप भी आनन्द उठाएँ और अपनी राय दें ।  

अब अपने मित्र के मूल प्रश्न पर आते है  बह्र-ए-मदीद के बारे में

 आप जानते है कि बह्र-ए-मदीद उर्दू के प्रचलित बह्रों में से एक मान्य बह्र है । यह बात अलग है कि इस बह्र[मदीद] में बहुत कम शायरी 

हुई } मगर मान्य बहर तो है ही।

 बह्र-ए-मदीद एक मुरक़्कब बहर है और इसका बुनियादी  वज़न होता है--

2122---212  [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन ]

और इसकी सालिम मुसम्मन  शकल होती है 


[क] 2122--212---2122---212 = नाम होगा बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम

अच्छा 2122---2122 [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ] इस  बह्र को आप ज़रूर पहचानते होंगे? 

अरे वही बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम

अच्छा अब आख़िरी वाले [ ज़र्ब/अरूज के मुकाम वाले] 2122 पर एक ज़िहाफ़[ हज़्फ़ का ज़िहाफ़ ]लगा कर देखते है --क्या होता है

2122+ हज़फ़ = 212 [ फ़ाइलुन ] महज़ूफ़  होगा

यानी 

बह्र 2122 -2122  अब 

2122-212 हो गई । मतलब बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ हो गई

अब इसे दोगुना कर दें यानी मुज़ाइफ़ कर दे तो क्या होगा "?

[ख]   2122-212- 2122--212

बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ मुज़ाइफ़

फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन // फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन  

और इसका नाम होगा      

अब [क] और [ख] की तुलना कीजिए

क्या दोनो बह्र  का वज़न एक नहीं है ? और नाम मुख्तलिफ़ नहीं है ?

इसी लिए कहता हूँ कि सिर्फ़ वज़न लिख देने से ही काम नहीं चलेगा --बह्र का नाम भी लिख दे तो बेहतर।

और न लिखें तो और भी बेहतर?

अच्छा तो एक सवाल -- हम पहचानेंगे कैसे कि

2122--212---2122--212  यह बह्र मदीद से हासिल हुआ कि रमल से हासिल हुआ ?

इसका जवाब कभी अगले क़िस्त में।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 

ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-






Sunday, January 4, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [ क़िस्त 123 ] : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे में

 विषय : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे मे

यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से [ परिभाषाओं से] वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद [ लाभान्वित] होना चाहते है ।

---A-- --B-- -C-- -D-

बह्र 1212----1122--------1212---22

मेरे मित्र का इस बह्र के बारे में एक सवाल था -
क्या तीसरे मुक़ाम यानी C [हस्व] पर जो 1212 रुक्न दिखाई दे रहा है

क्या उसे -1122 - ले सकते हैं??

उत्तर : नहीं [ मेरे हिसाब से]

----- ----

फिर अगला सवाल यह होगा कि क्यों नहीं ले सकते?

तो जवाब ज़रा विस्तार से देना होगा ।


1212---1122---1212---22

इस बह्र को आप सब पहचानते होंगे। बड़ी लोकप्रिय और प्रचलित बहर है। अमूमन सभी शायरों ने [यह ख़ाकसार सहित] इस बह्र में शायरी की है

इस बह्र का नाम है -

बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़

हम जानते हैं कि बह्र-ए-मुज्तस एक मुरक़्कब [ मिश्रित ] बह्र है यानी दो सालिम रुक्न [2212+ 2122 ] से मिल कर बनती है और इसकी

मुसम्मन शकल होती है

-A--- --B-- --C- --D--

2212-- 2122-----2212---2122

मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन --मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन

[ मुस तफ़अ’ लुन --पर ध्यान दीजिएगा । इसकी चर्चा आगे करेंगे]

अगर इन सालिम अर्कान पर ज़िहाफ़ लगाते चले तो

A & C = 2212 + ख़ब्न = मख्बून 1212

B =2122 + ख़ब्न = मख़्बून 1122

D 2122 +ख़ब्न +हज़्फ़ = 22

यानी इस बह्र की शकल अब यूं हो जायेगी-

1212---1122----1212---22

और यही बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख्बून महज़ूफ़ है जिससे आप सभी परिचित है।

--- ---- --

मगर सवाल ?

सवाल तो अभी वहीं खड़ा है कि

C वाले मुकाम पर 2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] को 1122 कर सकते या ले सकते है या नहीं??

2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] --बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है और इस रुक्न पर ऐसा कोई ज़िहाफ़ नहीं है जो इसे

1122 कर सके ।

अत: 2212 को 1122 नहीं कर सकते।

[ चलते चलते एक बात और --मुसतफ़इलुन [2212 -पर

मुसतफ़इलुन [2212 को उर्दू इमला में लिखने की दो शकलें है

एक तो यह

2 2 12 [ सबब + सबब + वतद-ए-मजमुआ ] -12- पर ध्याद दें यह वतद ए मज्मुआ की शकल है [ मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक+ साकिन]

जिसे मुतस्सिल शकल कहते है यानी सभी हर्फ़ मिला कर, सिलसिले से लिखते हैं ।


दूसरी यह --

मुस तफ़अ’ लुन = 2 21 2 [ सबब + वतद-ए-मफ़रूक़ ]

-21 [ तफ़ अ’] पर ध्यान दे यह वतद -ए-मफ़रूक़ है [ मुतहर्रिक+ साकिन+ मुतहर्रिक]

यानी इसमे दो मुतहर्रिक में फ़र्क है बीच में साकिन हर्फ़ है इसी लिए इसे मफ़रूकी [ यानी फ़र्क़ वाली] शकल कहते है। इसमे इमला में वतद को फ़र्क दे कर लिखते है


अगरचे दोनो का वज़न और लगभग तलफ़्फ़ुज़ same है


तो यह बात बताने की क्या ज़रूरत थी?

ज़रूरत यह थी कि दोनॊ शकलों के ्ज़िहाफ़ अलग अलग होते है।


और मुज्तस में यही बतद अपने मफ़रूक़ी शकल में है यहाँ


एक बात और --उर्दू शायरी में ्बह्र-ए-मुज्तस अपनी सालिम शकल यानी [2212 + 2122]--[2212-+--2122 } में

प्रचलन में नहीं है।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-