Monday, June 1, 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 14 [ ज़िहाफ़ात 05 ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 14 [ज़िहाफ़ात]

[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]
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- कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ [हरकत+साकिन] पर  लगते है 

...पिछली कड़ी [क़िस्त 13] में उन ज़िहाफ़ात की चर्चा कर रहे थे जो ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़  पर लगते हैं। और इस सिलसिले में हम 3-ज़िहाफ़ मसलन ज़िहाफ़ ’ख़ब्न’...तय्यी....कब्ज़ ..की चर्चा कर चुके हैं । इस आलेख में 8-और ज़िहाफ़ कफ़्फ़्......क़स्र्.......ह्ज़्फ़्.........रफ़’अ........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़......की चर्चा करेगे

ज़िहाफ़ क़फ़्फ़  :- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म हो रहा है तो ’कफ़्फ़ ज़िहाफ़’ सातवें मुकाम पर साकिन को गिरा देता है और मुज़ाहिफ़ रुक्न का नाम ’मकूफ़्/मौकूफ़्’ कहलाता है
ज़ाहिर है कि रुक्न में  सातवां मुक़ाम तभी सम्भव है जब वो ’सुबाई रुक्न’[7-हर्फ़ी रुक्न] हो और अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता हो यानी [वतद(3)+सबब(2)+सबब-ए-ख़फ़ीफ़(2)  हो या सबब(2)+वतद(3)+सबब-ए-ख़फ़ीफ़(2)
और सातवें  मक़ाम पर ’साकिन’ ही होगा। बस इसी साकिन को गिराने का काम ज़िहाफ़ ’कफ़्फ़’ करता है । यह एक आम ज़िहाफ़ है
आप अगर 8-सालिम रुक्न[जिनकी चर्चा मैं पहले भी कर चुका हूं~) को ध्यान से देखे तो आप को ऐसे 2-रुक्न ऐसा है जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है और वो रुक्न हैं
                                  मफ़ा ई लुन् [1 2 2 2 ] ........फ़ाइलातुन् [  2 1 2 2]  [ ....लुन्...तु्न्....सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है जिसमें पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक है और दूसरा हर्फ़ साकिन है]
मफ़ा ई लुन् [1 2 2 2 ]+ कफ़्फ़     = मफ़ा ई लु  [1 2 2 1] यानी सातवें मक़ाम का ’न’ गिरा दिया रो बाक़ी बचा मफ़ा ई लु [यानी लाम मय हरकत]
फ़ा इला तुन् [ 2 1 2  2 ] क़फ़्फ़     = फ़ा इला तु      [2 1 2 1  ] यानी सातवें मुक़ाम से ’न’ गिरा दिया तो बाक़ी बचा  फ़ा इला तु   [यानी ’ते’ मय हरकत
यह ’आम ज़िहाफ़ ’ है
एक बात और जब किसी रुक्न पर[ख़ब्न और कफ़ ज़िहाफ़ एक साथ अमल करते है तो हम उसे ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ ’ कहते है और इस मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ का नाम है ’शकल’ और मुज़ाहिफ़ का नाम होगा ’मश्कूल’ - मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ [यानी मिश्रित ज़िहाफ़] की चर्चा बाद में करेंगे ।बात निकली तो बात याद आ गई} अभी तो हम ’मुनफ़र्द’ [यानी एकल] ज़िहाफ़ की चर्चा कर रहे है। अगला मुनफ़र्द ज़िहाफ़ है ’क़स्र’ जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगता है

ज़िहाफ़ क़स्र   :-अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है तो ज़िहाफ़ ’क़स्र’ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के ’साकिन’ को गिरा देता है और उस से पहले आने वाले ’मुतहर्रिक ’ को साकिन कर देता है और इस तरह बरामद होने वाली मुज़ाहिफ़ रुक्न को ’मक़्सूर’ कहते हैं।
 हम जानते ही हैं कि सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = हरकत+साकिन होता है तो कस्र ज़िहाफ़ साकिन को गिरा देगा और हरकत को साकिन कर देगा } एक उदाहरण से समझाते है -----लुन्-- या ---तुन् -- सबब-ए-खफ़ीफ़ है जिसमें --लु-- तु-- तो मय हरकत [मुतहर्रिक] है और --न्-- साकिन है । ज़िहाफ़ ’कस्र’ इसी साकिन --न्-- को गिराएगा और --लु---तु-- को साकिन [यानी -लु को ल् और -तु  को -त्--]कर देगा । यानी मुतहर्रिक को ’साकिन’ कर देगा।
हम जानते है  8-अर्कान में से 4-अर्कान ऐसे हैं जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होते हैं और वो हैं

मफ़ा ई लुन्.......फ़ा इला तुन्........मुस तफ़अ लुन्......फ़ऊ लुन्

मफ़ा ई लुन्  [ 12 2 2 ] +क़स्र      =  मफ़ा ई ल् [12 2 1]     = यानी आखिरी --लुन्-- का --न्..--गिरा दिया और इस से पहले जो--लु--को साकिन --ल्--कर दिया

फ़ा इला तुन् [ 2 12 2 ] +क़स्र     = फ़ा इला त् [ 2 12 1]    = यानी आखिरी  --तुन्--का  --न्’- गिरा दिया और  --तु-- को साकिन - त्--कर दिया

मुस तफ़’अ लुन् [ 2 21 2] +क़स्र  = मुस तफ़’अ ल् [2 2 2]  = यानी आखिरी --लुन्-- का --न्-गिरा दिया और --लु--को साकिन --ल्--कर दिया । ध्यान देने की बात है कि यहाँ तफ़’अ में --’अ-- मुत्तहर्रिक है और --ल-- साकिन बचा तो दोनो मिल कर
[हरकत=साकिन] फिर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ बना लेते है इसी से इसका वज़न ’2’ लिखा यानी मुज़ाहिफ़ रुक्न को अब पढ़ेगे ’ मुस तफ़ अल’  जो किसी हम वज़न मानूस रुक्न --मफ़ ऊ लुन[2 2 2 ] से बदल लिया
फ़ऊ लुन्        [ 12 2     ] +क़स्र    = फ़ऊ ल      [12 1]     = यानी आखिरी --लुन्-- का --न् -गिरा दिया और --लु--को साकिन --ल्--कर दिया

ज़िहाफ़ हज़्फ़  :- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है तो ज़िहाफ़ ’हज़्फ़’ उसे साकित [खत्म ]कर देता है और मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’महज़ूफ़’ कहते हैं [
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से 5-रुक्न ऐसे हैं जो ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पर खत्म होता है और वो रुक्न  हैं
मफ़ा ई लुन्......फ़ा इला तुन्......फ़ा’अ ला तुन्....मुस तफ़’अ लुन्.... ....फ़ऊ लु न् [ यहा..’अ को ऐन मय हरकत समझें ]
मफ़ा ई लुन् [ 12 2 2 ] + हज़्फ़  = मफ़ा ई [ 12 2] यानी मफ़ाईलुन् का ’लु न्’ गिरा दिया बाक़ी बचा मफ़ा ई [12 2 } और इसे किसी मानूस हम वज़न रुक्न ’फ़ऊ लुन् [122] से बदल लिया
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2]+ हज़्फ़   = फ़ा इला [ 2 12] यानी फ़ा इला तु न् का ’तुन्’ गिरा दिया बाक़ी बचा फ़ा इला [2 12] और इसे किसी मानूस हम वज़्न रुक्न ’फ़ा इलु न् [ 2 1 2] से बदल लिया
मुस तफ़’अ  लु न् [ 2 21 2 ]+ह्ज़्फ़ = मुस तफ़’अ [ 2 21] यानी मुस तफ़’अ लु न् का ’लु न्’ गिरा दिया बाक़ी बचा मुस तफ़’अ [2 21]
फ़ऊ लुन्   [12 2 ]+हज़्फ़         =  फ़ऊ [ 12 ] यानी फ़ऊ लुन से ’लुन’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’फ़ऊ’ जिसे किसी मानूस हम वज़न ’फ़ ’अल[1 2] से बदल लिया
यह् ज़िहाफ़् ’अरूज़/ज़र्ब ’ के लिए मख़्सूस है

ज़िहाफ़ रफ़’अ  :-अगर कोई रुक्न दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है तो ज़िहाफ़ ’रफ़’अ ’ पहले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को साकित [गिरा देना/मिटा देना/हटा देना} कर देता है और जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे मरफ़ू’अ कहते है। हम जानते हैं कि 8 सालिम रुक्न मे से सिर्फ़ 2-रुक्न ही ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होते हैं और वो रुक्न हैं
मुस् तफ़् इलुन्.............मफ़् ऊ लातु
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 1 2]+ रफ़’अ = तफ़् इलुन् [ 2 12] यानी मुस् तफ़् इलुन् से पहला सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मुस् को साकित् कर् दिया बाक़ी बचा तफ़् इलुन् जिसे मानूस् बहर् फ़ाइलुन् [2 12] से बदल् लिया ।यह् ज़िहाफ़् अरूज़् और जर्ब् के अलावा शे’र् के हर मुक़ाम् पर् आ सकता है
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 21] + रफ़’अ = ऊ लातु [2 21] यानी मफ़् ऊ लातु से पहला सबब-ए-ख़फ़ीफ़् मफ़् को साकित् कर दिया बाक़ी बचा ऊ लातु जिसे मानूस बहर् मफ़् ऊ ल [2 2 1  ल मय् हरकत्] से बदल लिया ।   यह ज़िहाफ़् अरोज़् और् जर्ब् के अलावा शे’र के हर् मुकाम पर आ सकता है

 ज़िहाफ़ जद्द’अ :- अगर किसी ्सालिम रुक्न के शुरु में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को ’एक साथ’ गिरा देने का [साकित करने का ] काम ज़िहाफ़ जद्द’अ करता है और इस से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’मज्दू’अ’ कहते हैं } आप जानते ही हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 2-रुक्न ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है और वो है
मुस् तफ़् इलुन् .....और्....... मफ़् ऊ लातु

मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12]+ जद्द्’अ   = इलुन् [12] यानी मुस् तफ़् इलुन् से दोनो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मुस् ...तफ़् दोनो साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा ’इलुन्’(12] जिसे किसी मानूस् रुक्न्  ’फ़’अल् [12] से बदल् लिया।ख़याल् रहे यहाँ --’अ- मय् हरकत् है जो -ल्-के साथ् मिल् कर् -’अल्- सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्  बन् गया । यह् ज़िहाफ़् अरूज़./जर्ब के लिए मख़्सूस् है यानी ख़ास् तौर् पर् निर्धारित् है।
मफ़् ऊ लातु    [2 2 2 1]+ जद्द्’अ  = लातु [2 1] यानी मफ़्ऊलातु से दोनो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मफ़् ..ऊ दोनो साकित् कर दिया तो बाक़ी बचा ’लातु’[ 2 1] जिसे मानूस् रुक्न्  फ़्’अ लु [2 1] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहां -’अ’ मय साकिन् है और् अ-लु-बज़ाहिर् मुतहर्रिक् है ।ज़ाहिर् है कि यह् ज़िहाफ़् किसी शे’र् के अरूज़् और् जर्ब् के मुक़ाम् पर् नही आ सकता कारण कि --लातु--में -तु- मुतहर्रिक् है और् उर्दू में कोई मिसरा/शे’र मुतहर्रिक् पर् ख़त्म् नही होता

ज़िहाफ़् जब्ब’अ :-अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आए तो ज़िहाफ़ ’जब्ब’अ इन दोनो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ को ’साकित’ [गिरा/मिटा/हटा] देता है और उस से बरामद मुज़ाहिफ़ रुक्न का नाम मजबूब है
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ 2-सालिम् रुक्न् ऐसे हैं जिसके आखिर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो सालिम रुक्न हैं
मफ़ा ई लुन.........और......फ़ा’अ ला तुन  [यानी लुन और तुन ]
मफ़ा ई लुन् [12 2 2]+जब्ब्  = मफ़ा [12] यानी आखिर् के दो अस्बाब्-ए-ख़फ़ीफ़् --ई--लुन्.. को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा .. मफ़ा[12]  जिसे मानूस् रुक्न् ’फ़’अल् (12] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहाँ -’अ मुतहर्रिक् है जो --ल् साकिन् से मिल् कर् ’अल् बना लिया यानी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़
फ़ा’अ ला तुन् [21 2 2]+जब्ब् = फ़ा’अ [2 1] यानी आखिर् के दो अस्बाब्-ए-ख़फ़ीफ़् --ला---तुन् को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा फ़ा’अ [21] जिसे किसी मानूस् रुक्न् फ़’अ लु (21] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहाँ भी --’अ मय् हरकत् है
यह् ज़िहाफ़् भी अर्रोज़्/जर्ब् से मख़सूस् है
एक बात आप नोटिस कर रहे होंगे कि दोनो ज़िहाफ़ --ज़िहाफ़ जद्द’अ और ज़िहाफ़ जब्ब में अमल तो दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ एक साथ पर अमल कर रहा है बस फ़र्क इतना कि एक में अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ सालिम रुक्न के शुरु में आ रहा है [ जद्द’अ में ] तब अमल करता है जब कि दूसरे में सालिम रुक्न के आखिरी में आ रहा है जब्ब में]तब अमल करता है ।

ज़िहाफ़् हत्म्  :-अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आये तो ज़िहाफ़ ’हत्म’ आखिरी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को गिरा देता है [यानी साकित कर देता है ] और उस से पहले वाले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ केत साकिन को गिरा देता है और हरकत को साकिन कर देता है और् इस से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न हासिल होता है उसे ’अहतम’ कहते हैं ।
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 2-रुक्न ही ऐसे है जिसके आख़िर में 2-अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो हैं
मफ़ा ई लुन.........और......फ़ा’अ ला तुन [यानी लुन और तुन]
मफ़ा ई लुन् [ 12 2 2]+ हत्म्     = मफ़ा’अ [12 1] यानी मफ़ा ई लुन् से  आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् --लुन्- को साकित् कर् दिया और् उस् से पहले जो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् -ई [ऎन्+ये] बचा उसमें से -ये - गिरा दिया और् उस् से पहले जो -ऎन् [जो अभी मुतहर्रिक् है ] को साकिन् कर् दिया तो हासिल् हुआ मफ़ा’अ [12 1] यहाँ -’अ- साकिन् है -ख़याल् रहे । इसे किसी मानूस् बहर्  फ़ऊल् [12 1] से बदल् लिया
फ़ा’अ ला तुन् [2 1 2 2] +हत्म्   = फ़ा’अ ल् [ 21 1] यानी फ़ा’अ ला तुन्  से आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् --तुन्- को साकित् कर दिया और् इस् से पहले के सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् [ला --लाम् अलिफ़्] से अलिफ़् साकिन् को गिरा दिया और् लाम् [ [ल] अभी मुतहर्रिक् है ] को साकिन् कर् दिया तो  हासिल् हुआ --फ़ा’अ ल् [22 ] जिसे किसी मानूस् रुक्न् - फ़’अ लुन  [2 2] -[-’अ साकिन है ] से बदल लिया

ज़िहाफ़ तस्बीग् :-अभी तक जितने ज़िहाफ़ात हमने देखे सब के अमल से सालिम रुक्न के हर्फ़ में नुक़सान ही नुक़सान ही हुआ ...कहीं सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का हर्फ़-ए-साकिन गिर गया [साकित[ हो गया ,,कभी हर्फ़-ए-हरकत ्साकिन हो गया तो कहीं खुद सबब ही साकित हो गया --यानी  हर्फ़/हरूफ़ का नुक़सान ही हुआ ऐसे ज़िहाफ़ात को ज़िहाफ़ बनुक़सान भी कह सकते हैं \
मगर ऐसा नहीं है कि हए ज़िहाफ़ हर्फ़ का नुक़सान ही करता है } कुछ ज़िहाफ़ ऐसे भी हैं जो हर्फ़ का इज़ाफ़ा भी करते है ।तस्बीग़ एक ऐसा ही ज़िहाफ़ है जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगता है
किसी रुक्न के आख़िर में अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [हरकत+साकिन] है  तो हरकत और साकिन के बीच में एक ’साकिन’ का इज़ाफ़ा कर देते है } इस अमल को तस्बीग़ कहते है और मुज़ाहिफ़ को ’मुस्बीग़’ कहते है और यह ज़िहाफ़ सिर्फ़ ’अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस [निर्धारित है
वो सालिम रुक्न जिसके अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है वो हैं
मफ़ा ई लुन्.............फ़ा इला तुन्....फ़ा’अ ला तुन्....मुस तफ़’अ लुन्...फ़ऊलुन्  [यानी लुन् ....तुन् ...]
मफ़ा ई लुन् [ 1 2 2 2]  + तस्बीग़ = मफ़ा ई लान् [ 1 2 2 2 1] यानी आखिरी  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ लुन्  [लाम्,,नून्  ] के बीच् एक् साकिन् ’अलिफ़्’ का इज़ाफ़ा कर् देते है तो लान् हो जायेगा
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2 ]  +तस्बीग़्  =  फ़ा इला तान् [ 2 12 2 1] यानी आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् तुन् [ ते,,,नून्  ] के बीच् एक् साकिन् ’अलिफ़्’ का इज़ाफ़ा कर् देते है तो  --तान्- हो जायेगा
फ़ा’अ ला तुन् [ 21 2 2 ] -तस्बीग़्  =  फ़ा’अ ला तान् =       -----------तदैव----
मुस् तफ़्’अ लुन् [2 2 1 2 ]+तस्बीग़् = मुस् तफ़् इ लान्  =-----------तदैव----
फ़ऊलुन् [ 12 2]   +तस्बीग़्               = फ़ऊ लान् [ 12 21]     -----तदैव

अब तक हम ने सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात ..........खब्न.....तय्य...  क़ब्ज़.....कफ़्फ़्......क़स्र्.......ह्ज़्फ़्.........रफ़’अ........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़ [11] ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर चुके हैं

अब ज़िहाफ़ के बारे में एक -दो सवाल आप के ज़ेहन में भी उठ रहे होंगे

एक तो यह कि-- कि सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगने के बाद जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है उसे किसी मानूस रुक्न में क्यों बदलते हैं ? अगर न बदलें तो क्या होगा? क्या यह बदलना mandatory है या obligatory ??
अरूज़ की किताबें इस मसले पर ख़ामोश हैं । मगर हमें लगता है कि ज़िहाफ़ लगाने के बाद भी रुक्न .’फ़े’ल [फ़े..एन..लाम] ही रहता है अत: मुज़ाहिफ़ शक्ल में भी कम-अज कम [फ़े ऐन लाम इन 3-हर्फ़ से 2 हर्फ़ तो ज़रूर ही आए। अत: हमने जितने मानूस बहर के नाम लिखे थे उसमे कम से कम 3 हर्फ़ [फ़े...’एन ...लाम ] में से 2-हर्फ़ तो ज़रूर ही हैं
हमें तो लगता है कि मुज़ाहिफ़ रुक्न को मानूस रुक्न में बदलना न तो mandatory लगता है न तो obligatory हाँ   discretionary हो सकता है ।कारण कि जब हम मुज़ाहिफ़ रुक्न को मानूस रुक्न से बदलते है हमवज़न से ही बदलते है ।जब तक वज़न बरक़रार है तो बदले न बदलें क्या फ़र्क़ पड़ता है कम अज़ कम शे’र के तक़्ती’अ में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
दूसरी बात यह कि हम इतने ज़िहाफ़ क्यों पढ़े क्यों समझे ??जब कि बहुत से लोग बिना पढ़े भी तो शायरी करते हैं और कुछ लोग तो अच्छी शायरी करते है । सवाल वही है ---एक अच्छा अरूज़ी ,अच्छा शायर हो ज़रूरी नहीं और न ही यह ज़रूरी है कि एक अच्छा शायर अच्छा अरूज़ी भी हो ।पर हाँ---अगर एक अच्छा शायर ..अच्छा अरूज़ी भी हो तो समझिए कि सोने पे सुहागा या सोने में सुगन्ध होगा।
आप इन ज़िहाफ़ात के बारे में अच्छी तरह समझ लें तो मयार की शायरी कर सकते है या समझ सकते है या कम से कम ये तो समझ सकते कि हम कहाँ पर ग़लत कर रहें है
तीसरी बात यह कि इन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र इस लिए कर रहे है कि जब उर्दू शायरी के 19 बहूर [मुफ़र्द बहूर या  ,मुरक्क़ब बहूर ] के मुरब्ब:....मुसद्दस...मुसम्मन की individually  तफ़्सीलात पेश करेंगे तो इन ज़िहाफ़ात का भी ज़िक़्र होगा जैसे
बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ .बहर-ए-कामिल मुसम्मन मुज़्मर ..वग़ैरह वग़ैरह तो उन्हे समझने में आसानी होगी
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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com


Reviewed by Shri Ram Awadh Vishwkarma ji on 24-09-21

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 13 [ ज़िहाफ़ात 04 ]

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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 13 [ज़िहाफ़ात]

[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]
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- कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ [हरकत+साकिन] पर  लगते है 

   फिछल कड़ी [क़िस्त 11 और 12] में ज़िहाफ़ात के बारे में कुछ चर्चा कर चुका हूँ कि ज़िहाफ़ क्या होते है उर्दू शायरी में इस की क्या अहमियत है ,ज़िहाफ़ात के बारे में जानना क्यों ज़रूरी है ,नहीं जानेंगे तो क्या होगा आदि आदि। साथ ही यह भी चर्चा कर चुका हूँ कि ज़िहाफ़ कितने प्रकार के होते हैं -मुफ़रद ज़िहाफ़ क्या होते है ,,मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ क्या होते हैं ,आम ज़िहाफ़ क्या होते है ख़ास ज़िहाफ़ क्या होते है  आदि आदि।
आज इस कड़ी में  ये ज़िहाफ़ सालिम रुक्न पर कैसे अमल करते है  पर चर्चा करेंगे

आप जानते ही हैं कि
1- ज़िहाफ़ हमेशा ’सालिम रुक्न’ पर ही अमल करते हैं और वो भी सालिम रुक्न के टुकड़े [ज़ुज़] पर ही लगते है और यह टुकड़े[अवयव] होते है --सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ,सबब-ए-सकील ,वतद-ए-मज्मुआ.वतद-ए-मफ़रुक़ । इन्ही  के combination , permutation से सालिम रुक्न बनते हैं। इन् टुकड़ों के बारे में पिछली क़िस्तों [अक़्सात] में चर्चा कर चुके है ।आगे बढ़ने  से पहले  एक बार आप उन्हे  देख लें तो अच्छा रहेगा।
2- ज़िहाफ़ कभी मुज़ाहिफ़ [जिस पर ज़िहाफ़ already लग चुका है पर न्हीं लगता ।यह अरूज़ के बुन्यादी असूल के ख़िलाफ़ है
आज हम उन ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे जो सालिम रुक्न  के ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पर लगते हैं
आप की सुविधा के लिए ,कुछ ज़िहाफ़ के नाम लिख रहा हूं
ख़ब्न.....तय्यी....कब्ज़्....कफ़्फ़्...क़स्र्...ह्ज़्फ़्....रफ़’अ.........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़
और इन्के मुज़ाहिफ़ नाम क्रमश: है 
मख़्बून्.......मुतव्वी.......मक़्बूज़्......मौकूफ़्.....मक़्सूर्.......महज़ूफ़्.....मरफ़ू’अ......मज्द’अ........मज्बूब्.......अहतम्......मुस्बीग़.
हम जानते हैं कि उर्दू शायरी में सालिम रुक्न्  की संख्या 8 है [जिसकी चर्चा हम् पहले भी कर चुके हैं] जिसमें  या तो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ आता है या सबब-ए-सकील आता है
सबब-ए-ख़फ़ीफ़ : वो दो हर्फ़ी कलमा जिसका  पहला हर्फ़ ’मुत्तहर्रिक और दूसरा हर्फ़ साकिन् हो । यानी  सबब-ए-ख़फ़ीफ़=हरकत+साकिन् जैसे  फ़ा....लुन्....तुन्...मुस्.....तफ़्..ई.[ऎन् + यी से मिलकर्] ..आदि या गम्.....दिल्...अब् ....तुम् ....हम्     ..ख़ुद् वग़ैरह् वग़ैरह् }आप ने हिन्दी फ़िल्म का एक गाना ज़रूर सुना होगा ---दिल् विल् प्यार् वार् मैं क्या जानू रे ! इसमे ’दिल्...विल्..प्या.....वा  सब सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् है
अब हम सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ के अमल की क्रमश: चर्चा करेंगे

ख़ब्न = अगर कोई सालिम रुक्न्  ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ’से शुरु होता है तो दूसरे मुक़ाम पर साकिन् हर्फ़ के गिराने  के अमल को ’ख़ब्न्’ कहते हैं। और इस अमल के बाद जो मुज़ाहिफ़ रुक्न् बरामद होती है उसे ’मख़्बून्’कहते है
सबब-ए-ख़फ़ीफ़ में दूसरा हर्फ़ यक़ीनन्  साकिन् ही होगा -परिभाषा ही है उस का ]
पिछली कड़ी में हम जिन 8-रुक्न्  की चर्चा कर चुके हैं उसमें से निम्न् लिखित अर्कान् ही सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है और् इसी ज़ुज [टुकड़े] पर ज़िहाफ़ का अमल होगा॥देखिए कैसे।

[फ़ा]इलुन्.......[फ़ा]इलातुन्......[मुस]तफ़ इलुन्.......[मफ़]ऊलात  ... जिस ज़ुज़ /टुकड़ा/अवयव पर ज़िहाफ़ ख़ब्न का अमल होता है उसे मै्ने कोसीन [कोष्ठक] [  ] में दिखा दिया है

फ़ाइलुन्        [2 1 2] + खब्न  = फ़े इ लुन्  [1 1 2 ]    यानी फ़ा से ’अलिफ़’ गिरा दिया तो  बाक़ी बचा ’फ़े’[1] मय हरकत---मुत्तहर्रिक
फ़ाइलातुन्     [2 1 2 2] + ख़न् = फ़ इलातुन् [1 1 2 2]  यान् फ़ा से ’अलिफ़’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’फ़े [1] मय हरकत.....मुतहर्रिक
मुस् तफ़् इलुन्[2 2 1 2] +ख़न्    = मु तफ़् इलुन्[ 12 1 2 ] यान् मुस से ’सीन्’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’मीम [1] मय हरकत ....मुत्तहर्रिक
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 2  1] + ख़न्  = म ऊ ला तु  [ 1 2 2 1 ] यान् मफ़ से ’फ़े’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’मीम[1] मय हरकत....मुत्तहर्रिक

[मफ़् ऊ लातु ]-इस रुक्न् मे ध्यान देने की बात है कि हर्फ़ उल आखिर यानी  आखिरी हर्फ़ ’तु’ पर हरकत है अत: इसे किसी शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुकाम पर नही  लाया जा सकता कारण  कि उर्दू में कोई लफ़्ज़ मुत्तहर्रिक[यानी हर्फ़् हरकत ] पर नहीं ख़त्म होता है जब कि  अरूज़ और जर्ब किसी मिसरा का ’आखिरी’ मुक़ाम होता है
अब एक बात और ध्यान देने की है कि किसी ज़िहाफ़ की अमल से सालिम रुक्न -  मुज़ाहिफ़ शकल मे बदल जाती है और यह मुज़ाहिफ़ शकल हर वक्त किसी मानूस  [लोकप्रिय/राइज़/प्रचलित] फ़े’ल  की शक्ल में नहीं होता जैसे मस् तफ़् इलुन् के case मे ’मु तफ़् इलुन्’ हो गया जो मानूस [लोकप्रिय] फ़े’ल  नही  है और नही मफ़् ऊलातु का ’म ऊ लातु’। ऐसे case में हम इसे equivalent वज़न् से बदल लेते हैं जैसे म तफ़् इलुन् [1212 ] को प्रचलित फ़ाइल  ’मफ़ाइलुन् [1212 ] से और म ऊलातु [1 2 2 1] को प्रचलित वज़न् फ़ऊलातु [1 2 2 1] से बदल लिया

एक बात फ़े’अल् के बारे में में भी कर लेते है ---अगर आप ध्यान् से देखे तो 8-अर्कान् के हिज़्ज़े में  तीन् हर्फ़--फ़े...ऐन्....लाम....] invariably 1 या 2 हर्फ़  ज़रूर आता है इसी लिए इसे ’फ़े’अल्  कहते है
लगे हाथ  अरूज़ में उन 8-अर्कान् के अतिरिक्त  कुछ प्रचलित लोकप्रिय अफ़ाअ’ल [ब0ब0 फ़े’अल] [जिसे अर्कान् ,औज़ान् असूल या तफ़ा’अल भी कहते हैं ] के नाम मय वज़न् के जिसमे फ़े..एन्..लाम..आता है लिख रहा हूँ कि आगे काम आयेगा
1 मुफ़ ऊलुन् [2 2 2)
2 मफ़ऊल    [2 2  1) ...लाम मय हरकत
3 फ़ालुन्       [2 2    )
4 फ़े अ’लुन्  [1 1 2] --ऐन् मय हरकत
5 फ़ाइलातु    [2 1 2 1)  ते मय हरकत
6 मुफ़ त इलुन्[2 1 1 2)
7 फ़ाल          [2 1)
8 फ़ेअ’ल      [1 2)
9 मफ़ा इलुन् [1 2 2 1)
10  फ़ इला तुन् [1 12 2)
11       मु तफ़ा इलुन् [1 12 12 ) मीम और ते यहाँ मुत्तहर्रिक है
12  फ़ इ लातु     [1 1 2 1 )    ते मय हरकत  

चलिए ,अब दूसरे ज़िहाफ़ जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर अमल करते हैं ,की चर्चा करते है

तय्यी :- अगर किसी सालिम रुक्न के शुरु में दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो चौथे स्थान पे साकिन हर्फ़ के गिराने के काम जो ज़िहाफ़ करता है उसका नाम ’तय्यी’ है और  रुक्न की जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है उसे ’मुत्तवी’ कहते हैं
ज़ाहिर है कि जब रुक्न  दो सबब-ख़फ़ीफ़ [हरकत+साकिन,हरकत+साकिन]के साथ शुरु होगा तो चौ्थे स्थान पर  यक़ीनन और बज़ाहिर ’साकिन’ ही होगा और इसी को गिराने का अमल ’तय्यी’ ज़िहाफ़ करता है
पिछली कड़ी में जिन 8-सालिम अर्कान का ज़िक़्र कर चुके हैं उसमें से 2 ही रुक्न ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होते हैं और वह रुक्न हैं----मुस् तफ़् इलुन  और ...मफ़् ऊ लातु

मुस् तफ़् इलुन् [2 2 1 2]+ तय्य    = मुस् त इलुन [2 1 1 2] यानी तफ़ से ’फ़े’ गिरा दिया बाक़ी बचा मुस त इलुन  ---’ते’ मय हरकत
मफ़् ऊ लातु    [2 2 2  1] +तय्य    =मुफ़्  ’अ लातु [ 2  1 2 1] यानी "ऊ’ [एन+वाव] से ’वाव’ गिरा दिया बाक़ी बचा ऎन --मय हरकत जिसे ’फ़ा ’अ लातु [2 1 2  1] हम वज़्न रुक्न से बदल लिया [यहां -’अ-ऐन मय हरकत  है
[मफ़् ऊ लातु ]  यद्दपि यह ज़िहाफ़ आम ज़िहाफ़ की श्रेणी में आता है  जो शे’र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है परन्तु यह शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर नही आ सकता कारण वह कि उर्दू में कोई लफ़्ज़/मिसरा  मुत्तहर्रिक[यानी हरकत  पर खत्म न्हीं होता] क्योंकि  अरूज़ और जर्ब किसी मिसरा का ’आखिरी’ मुक़ाम होता है और यहाँ तो हर्फ़ उल आख़िर ’तु’ मुत्तहर्रिक है

क़ब्ज़ :- अगर किसी सालिम रुक्न वतद [ वतद-ए-मज्मुआ या वतद-ए-मफ़रुक़] से शुरु होता है और उसके फ़ौरन बाद सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है पाँचवे मुक़ाम पे साकिन को गिराने का काम क़ब्ज़्  ज़िहाफ़् करता है । इस के बाद जो  मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’मक़्बूज़’ कहते है   । ज़ाहिर है कि वतद [3-हर्फ़ी कलमा] के बाद अगर सबब [2 हर्फ़ी कलमा ] आयेगा तो पाँचवे मक़ाम पर ’सबब का साकिन’ ही आयेगा और ज़िहाफ़ कब्ज़ इसी साकिन को गिराता है
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से 3-रुक्न ऐसे हैं जो वतद से शुरू होते हैं और फ़ौरन उसके बाद सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है जो निम्न हैं
मफ़ाईलुन्..........फ़ाअ’लातन्.........फ़ऊलन्

मफ़ाईलुन् {1 2 2 2 ] +कब्ज़   = मफ़ा इ लुन् [1 2 1 2]  यानी पाँचवें मक़ाम पर जो ’ये’ आ रहा है  [ऐन+ये (सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ] का ’ये’  गिरा दिया बाक़ी बचा ’ऐन’ मय हरकत
फ़ा’अलातुन् [2 1 2 2] +क़ब्ज़   = फ़ा’अ ल तुन् [2 1 1 2] यानी पाँचवें मुकाम पर ’ला’ का जो अलिफ़ आ रहा हैुसे गिरा दिया तो बाक़ी बचा फ़ा’अ ल तुन् [ लाम मय हरकत बचा ] इस मुज़ाहिफ़ को मानूस रुक्न मुफ़् त ’अ लुन् [21 1 2 ] से बदल लिया ।
फ़ऊ्लुन्     [ 1 2 2]  + क़ब्ज़    = फ़ऊ लु  [ 1 2 1]  यानी पाँचवें मुक़ाम पर जो ’लुन’ का ’नून’ आ रहा है गिरा दिया [यानी नून साकिन को साकित कर दिया ] तो बाक़ी बचा फ़ऊ ल[ 1 2 1]  लाम मय हरकत

इन ज़िफ़ाफ़ शुदा रुक्न्  [मफ़ाईलुन् 1222]-- बह्र-ए-हजज़  या फ़ाइलातुन् [2122] --बह्र-ए-रमल या फ़ऊलुन्[122]  -बह्र-ए- मुतक़ारिब ] पर् शे’र  आगे की क़िस्त में कभी  सुनाएँगे  जब इन बहर की अलग से तफ़्सील से पेश करेंगे
अभी तो बहर-ए-सबब पर लगने वाले बाक़ी ज़िहाफ़ ........कफ़्फ़...क़स्र....ह्ज़्फ़....रफ़अ.........जद्दअ.....जब्ब......हतम् ......तस्बीग़ की चर्चा तो बाक़ी है   अगली क़िस्त में शनै: शनै: चर्चा करेंगे
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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com


Reviewed by Shri Ram Awadh Vishwkarma ji on 24-09-21