Wednesday, July 29, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 137: मफ़ऊलातु पर--[क्रमांक से आगे]

क़िस्त 137  : सालिम रुक्न मफ़ऊलातु पर--[ क्रमाकं से आगे]

पिछले चर्चा 002] में एक सालिम रुक्न -मफ़ऊलातु- पर चर्चा किया था जिसमें कहा था कि यह एक सालिम रुक्न होने के बावज़ूदइससे कोई सालिम बह्र नहीं बनती तो फिर इसको बनाया ही क्यों गया?

जी बिलकुल सही। सालिम बह्र में प्रयोग नहीं हो सकता मगर -’मुरक़्क़ब बह्र’-में तो हो सकता है और होता भी है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब में । यह रुक्न बह्र-ए-मुक्तज़िब का बुनियादी रुक्न है।

बह्र-ए-मुक़्तज़िब एक मुरक़्कब बहर है और यह दो सालिम बह्रों से मिलकर बनता है

 2221  + 2212 यानी

मफ़ऊलातु + मुसतफ़इलुन

इत्तिफ़ाक़न यह बह्र-ए-मुन्सरिअ’ बह्र का बरअक्स [ mirror image] बह्र है। ख़ैर

अब इस बह्र पर वो तमाम जायज़ ज़िहाफ़ लग सकते है जो 2221--और 2212 पर अलग अलग लग सकते है। 

यहाँ उन पर चर्चा नहीं करूँगा और न ही इससे बरामद होने वाली अन्य मुज़ाहिफ़ बह्रों की चर्चा करूँगा। वह किसी भी अरूज़ की किताब में मिल जाएगी।

मगर इससे बरामद एक मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा ज़रूर करना चाहूँगा  जो बहुत ही लोकप्रिय है ,मुतर्न्निम है, मानूस है और बहुत से कदीम-ओ- ज़दीद शो;अरा

ने इस मुतर्न्निम बह्र में ग़ज़ल कहीं है। 

वो बह्र है

121--22 / 121-22// 121-22/ 121-22 यानी

फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन यानी

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’ मख़्बून मरफ़ूअ’मुसक्किन मुज़ाइफ़

यह एक 16-रुक्नी बहर है। ध्यान रहे आठ रुक के बाद जो -//- निशान है वो बह्र-ए-शिकस्ता की अलामत नहीं

बल्कि लाज़िमन अरूज़ी वक़फ़ा की अलामत है।

यह बह्र कैसी बनती है --इस पर चर्चा नहीं करूँगा

और साथ ही यह बह्र विवादास्पद भी है

हकुछ लोग इसे -मुतक़ारिब - के तहत रखते है और कुछ लोग इसे -मुक्तज़िब- के। सबके अपनी अपनी

दलीले है। जहाँ तक मेरा सवाल है मैं इसे --मुक्तज़िब- के तहत ही रखता हूँ।

इस बह्र में दो ग़ज़लों के चन्द अश’आर पेश कर रहा हूँ आप भी गुनगुनाएँ--और लुत्फ़अंदोज़ हों

शकील बदायूनी साह्ब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर [पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी\


लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले

मुहब्बत आइना हो चुकी थी वज़ूदे-बज़्मे-जहाँ से पहले


समझ रहा था कि नाउमीदी, न पर्दादारे-उमीद होगी

नज़र उठा कर जो मैने देखा गुबार था कारवाँ से पहले ।


क़सम फ़रेबे-निगाह-ओ-दिल की, हमें तेरी जुस्तजू ने खोया

वहीं थी दरअस्ल अपनी मंज़िल क़दम उठे थे जहाँ से पहले


अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ किस्मत में जौर-ए-पैहम

खुली जो आँखें इस अंजुमन में नज़र मिली आसमां से पहले।


-शकील बदायूनी--

इसकी तक़्तीअ’ कर के आप  एक बार चेक कर लें कि यह ग़ज़ल इस बह्र मैं है भी कि नहीं?]

आप तलाश करेंगे तो इसी बह्र में और भी शायरों के कलाम मिल जाएँगे\


अब  अब्दुल हमीद ’अदम’ साहब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर  इसी बह्र में मुलाहिज़ा फ़रमाएँ--

[पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]


जुनूँ का जो भी मुआमला है वो शुस्ता-ओ-ख़ुशनिज़ाम होगा

बिला तकल्लुफ़ जो चल पड़ेगा, वो राहरौ तेज़गाम  होगा ।


जो हर ख़ताकार राहजन को दुआएँ दे कर चला गया है 

वो शख़्स मेरा ख़याल ये है,  बहुत ही आली-मुकाम होगा


हमे ग़रज़ क्या कि बज़्मे-महशर को हाऊ-हू-में शरीक़ होते

वहाँ गए हैं जो छुप छुपा कर, उन्हें वहाँ कोई काम होगा ।


चलो ये मंज़र भी देख ही लें ’अदम’ तकल्लुफ़ की गुफ़्तगू का

सुना है”मूसा’ से ’तूर’ पर आज फिर कोई हमकलाम होगा ।


-अब्दुल हमीद ’अदम’


इन ग़ज़लों को आप मन ही मन गुनगुनाइए --आनन्द उठाइए

-आनन्द.पाठक ’आनन’

880092 7181


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