उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 145 : त्रिपदी -बनाम- मुसल्लस
किसी मंच पर मैने अपनी एक दो त्रिपदी लगाई थी--
प्यार मुहब्बत इश्क़ वफ़ा सब
सुनने में लगता है अच्छा
कहाँ कभी मिलता है सच्चा ।
अमर प्रेम तुम तब समझोगी
डूबोगी तुम जब गहराई में
सोचोगी जब तनहाई में ।
त्रिपदी - 3-लाइनों की कविता/रचना। कुछ पाठकगण इस त्रिपदी के बारे में विशेष जानकारी जानना चाहते थे।
यह चर्चा उसी संदर्भ में है।
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वैसे -तीन पंक्तियों की कविता/रचना का अस्तित्व हिंदी/उर्दू/पंजाबी/जापानी साहित्य में पहले से ही
3 [तीन] -पंक्तियों की रचना/कविता/काव्य साहित्य या अदब में पहले से ही मौज़ूद है। मेरा प्रयोग कोई नया प्रयोग नहीं है।
उर्दू में ऐसी रचनाओं को [3-मिसरों पर आधारित] को ’मुसल्लस’ कहते है, पंजाबी में ’टप्पा’, जापानी में ’हाइकू’ हिंदी में
’त्रिवेणी या त्रिपदी’[ त्रिपदिका भी] कहते हैं या कह सकते हैं। गो, ये सभी विधाएँ 3- मिसरा या 3- पंक्तियों पर आधारित है
मगर इन सबमें कुछ कुछ न भिन्नता है ।
आज इसी पर हम संक्षेप में चर्चा करेंगे।
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मुसल्लस = यह उर्दू शायरी की एक काव्य विधा है। मुसल्लस -नज़्म में हर एक पदबंध 3-मिस्रों पर आधारित होता है
-उर्दू शायरी मे ऐसी रचना को ’मुसल्लस’ कहते हैं। मगर इसकी बह्र कुछ भी हो सकती है
स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं अपितु किसी नज़्म के समान पद बंध में का एक पद होता है। पहले बंध में तीनो मिसरे हमक़ाफ़िया होते है
वैसे बहुत से शायरों ने मुसल्लस नज़्में कही हैं-जैसे अख़्तर इरानी -सलाम मछली शहर-कैफ़ी आज़मी--मज़ाज लखनवी आदि।
कैफ़ी आज़मी का वो मशहूर नज़्म आप ने ज़रूर सुना होगा- हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा -जो फ़िल्म ’हक़ीक़त [1964] में लिखा गया था और उसे मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद मन्ना डे वग़ैरह ने अपनी आवाज़ दी थी।
उसी नज़्म का एक बंध यहाँ लगा रहा हूँ--
मुसल्लस = यह उर्दू शायरी की एक काव्य विधा है। मुसल्लस -नज़्म में हर एक पदबंध 3-मिस्रों पर आधारित होता है
-उर्दू शायरी मे ऐसी रचना को ’मुसल्लस’ कहते हैं। मगर इसकी बह्र कुछ भी हो सकती है
स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं अपितु किसी नज़्म के समान पद बंध में का एक पद होता है। पहले बंध में तीनो मिसरे हमक़ाफ़िया होते है
वैसे बहुत से शायरों ने मुसल्लस नज़्में कही हैं-जैसे अख़्तर इरानी -सलाम मछली शहर-कैफ़ी आज़मी--मज़ाज लखनवी आदि।
कैफ़ी आज़मी का वो मशहूर नज़्म आप ने ज़रूर सुना होगा- हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा -जो फ़िल्म ’हक़ीक़त [1964] में लिखा गया था और उसे मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद मन्ना डे वग़ैरह ने अपनी आवाज़ दी थी।
उसी नज़्म का एक बंध यहाँ लगा रहा हूँ--
दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क आँखों ने पिए और न बहाए होंगे
बंद कमरे में जो ख़त मेरे जलाए होंगे ।
एक एक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा ।
हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा ।
[यह नज़्म /फ़िल्म यू-ट्यूब पर मिल जाएगी]
मुखल्ल्स में -क़ाफ़िया -की पाबंदी तो है मगर बह्र की पाबंदी नही। मगर सभी पदबंध नज़्म के एक ही भाव को प्रगट करते चलते हैं।
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’टप्पा’ : पंजाबी मे भी 3-लाइन की - रचना अस्तित्व में है।
इसी का उर्दू [हिंदी संस्करण] माहिया है । जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का गाया हुआ टप्पा यू-ट्यूब पर भी सुन सकते हैं=--
कोठे ते आ माहिया
मिलना ता मिल आ के
नही ता खसमा नू खा माहिया।
माहिया :माहिया भी टप्पे की तरह हिंदी/उदू में 3-लाइन की एक काव्य विधा है
जिसमें पहली लाईन और तीसरी लाइन हमक़ाफ़िया होते है। यह मात्रिक छंद है।
इसके भी दो भेद होते हैं
[अ] इसकी तीनो लाइने एक ही मात्रा भार [12] की होती है ।
पहली और तीसरी लाइन हमक़ाफ़िया होती है। दूसरी लाइन हम काफ़िया हो
ज़रूरी नही। न हो तो बेहतर।
[ब] दूसरी शकल में पहली और तीसरी लाइन 12 मात्रा भार की और दूसरी लाइन
10 मात्रा भार की। और काफ़िया की शर्त वही जो ऊपर। चूंकि ये लाइने उर्दू
की खास बह्र का अनुसरण करती है अत: उर्दू अरूज़ के रूल
जैसे मात्रा पतन--हर्फ़-ज़ाइद] आदि भी लग सकते हैं
हर माहिया भाव की दृष्टि से अलग होता है अत: एक माहिया में एक भाव पूर्ण
होना चाहिए [ बए अक्स मुसल्लस]
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हाइकू : यह तीन लाइनों की जापानी काव्य विधा है जिसे हिंदी कविता ने अपना लिया है। यह एक वार्णिक छंद है
शब्दांश या वर्ण क्रम: यह 3 पंक्तियों की कविता होती है जिसमें कुल 17 अक्षर या शब्दांश होते हैं।
पहली पंक्ति में 5, दूसरी में 7 और तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर (5-7-5) होते हैं। इसमें क़ाफ़िया की कोई बंदिश नहीं मगर एक हाइकू रचना में -एक पूर्ण भाव की बंदिश ज़रूर है
त्रिपदी : हिंदी में यह भी 3-लाइन की काव्य रचना है। यह एक मात्रिक छंद है । कुछ लोग इसे त्रिवेणी , त्रिपदिका भी कहते है।
कुछ त्रिपदी में पहली और तीसरी लाइन हम काफ़िया होती है। मैने अपने त्रिपदी [ त्रिपदिका ] में दूसरी और तीसरी लाइन को सानुप्रास [हमकाफ़िया] रखा है। पहली लाइन सानुप्रास होना ज़रूरी नहीं। न ही हो तो बेहतर।
हर त्रिपदी भाव के लिहाज़ से स्वयं में पूर्ण होना चाहिए यानी किसी त्रिपदी का भाव समझने के लिए किसी अन्य या अगले पर निर्भर नहीं होना चाहिए। मैने अपनी इस त्रिपदी के सभी लाइनों में 16-मात्रा भार का प्रयोग किया है। आप चाहे तो किसी
अन्य मात्रा भार [ 12 या 18] का प्रयोग कर सकते हैं।
अन्य गुणीजन या अन्य छंद शास्त्री इस विधा पर और प्रकाश डाल सकते हैं।
तबतक लीजिए मेरी दो-तीन त्रिपदी का आनन्द उठाएँ--
;1;
ढूँढ रहा है जिसको प्राणी
मंदिर,मसजिद ,गिरजाघर में
वो तेरे मन के अन्दर में ।
:2:
ये बस कहने भर की बातें
प्रेम हमारा नभ से ऊँचा
और समंदर से भी गहरा ।
:3:
वह झूठ सदा बोला करता
क्या कोई आस करे उस पर
कैसे विश्वास करे उस पर ।
सादर
-आनन्द पाठक ’आनन’-
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