Monday, June 1, 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 58 [ बह्र-ए-मुशाकिल]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 58 [ बह्र-ए-मुशाकिल]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

बह्र-ए-मुशाकिल , उन 19-बह्रों में से एक है जो उर्दू शायरी में प्रचलित तो है परन्तु  शायरी में यह बहुत लोकप्रिय दिलकश और आहंगखेज़ नही है । उर्दू शायरों ने इस बह्र में बहुत कम ही कलाम कहे हैं

मुशाकिल भी एक मुरक़्क़ब बह्र है -जो 3-अर्कान से मिल कर बना है। इस का बुनियादी  अर्कान हैं-
फ़ाइ’लातुन----मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन
2122-------1222----------1222
यहाँ भी ध्यान देने की बात है -फ़ाइ’लातुन [2122] अपनी मुन्फ़सिल शकल में है--यानी फ़ाइ’-- [ -फ़े --अलिफ़--ऐन ] वतद-ए-मफ़रूक़ की शकल में है [यानी हरकत+साकिन+हरकत] --ऐन को मैने -इ’- से दिखाया है।
 इसपर ’ज़िहाफ़ात’ लगाते हुए इस बात का ख़याल रखेंगे 

इन अर्कान पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात देख लेते हैं

फ़ाइ’लातुन [2122] + कफ़ = मक्फ़ूफ़ फ़ाइ’लातु [2121]   [ -लु--तु-- का मतलब मुतहर्रिक 
फ़ाइ’लातुन [2122 ] + क़ब्ज़     = मक़्बूज़    मुफ़ त इलुन [2112] [ -तु- मुतहर्रिक ]

मफ़ाईलुन  [1222]  + कफ़      = मक्फ़ूफ़  मफ़ाईलु   [1221]
मफ़ाईलुन  [1222]   + हज़्फ़    = महज़ूफ़   फ़ऊलुन  [122 ] 
मफ़ाईलुन  [1222 ]  + क़स्र       = मक़्सूर  फ़ऊलान् [1221]
मफ़ाईलुन [1222 ] + तब्सीग़      = मुस्बीग़  मफ़ाईलान [ 12221]

चूँकि यह बह्र उर्दू शायरी में बहुत मानूस नहीं है और उर्दू शायरों ने इसे बहुत कम ही इस्तेमाल किया है। फिर भी इसके कुछ आहंग देख लेते है

[1]  बह्र-ए-मुशाकिल मुसद्द्स सालिम/ मुस्बीग़
फ़ाइ’लातुन----मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन / मफ़ाईलान
2122--------1222---------1222   / 12221
कमाल अहमद सिद्दिकी साहब के हवाले से

मैकदे  में  नहीं कोई गदा साक़ी
हाथ में जाम जिसके है वही जम है
तक़्तीअ’भी देख लेते हैं -
2 1  2  2  / 1  2  2  2/ 1 2 2 2
मैकदे  में /  नहीं कोई /गदा साक़ी 2122---1222---1222
2 1   2  2/ 1  2   2   2   / 1 2 2 2        =  2122---1222---1222
हाथ में जा /म जिस के है /वही जम है

मिसरा सानी में ज़र्ब के मुक़ाम पर ’मफ़ाईलान [12221] है जो मफ़ाईलुन का  मुज़ाहिफ़ ’मुस्बीग़’ है -जो लाया जा सकता है

उन्ही के हवाले से एक इसका भी उदाहरण  देख लें
पास मत जा सबा वो ज़ुल्फ़-ए-बरहम है
और बिखरी तो वो हो जायेगा नाराज़ 
तक़्तीअ भी देख लें---

पास मत जा /सबा वो ज़ुल् / फ़ बरहम है = 2122----1222----1222
और बिखरी  /तो वो  हो जा / येगा  नाराज़ = 2122--1222----12221

 यूँ तो यह बह्र अपने मुसद्दस शकल में ही प्रचलित है मगर मुसम्मन शकल में शायरी करने में कोई मनाही भी नहीं है
मुसम्मन का आहंग निम्न तरीक़े से होगा
[2] बह्र-ए-मुशाकिल मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ \  मक़्सूर 
फ़ाइ’लातु---मफ़ाईलु-----फ़ाइ’लातु----फ़ऊलुन\ फ़ऊलान
2121--------1221---------2121-----122     \ 1221
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से  एक शे’र देखते हैं

हमने प्यार किया तुमको  ये हमारा है एह्सान
तुम ने लूट लिया हमको ये  तुम्हारा है एहसान

 तक़्तीअ भी कर के देख लेते है--आसान है
  2   1  2  1 /  1 2   2  1    / 2  1 2  1 / 1 2 2 1
हम ने प्यार / किया तुम कू / ये  हमारा / है एह्सान
2     1   2 1 / 1  2  2  1   / 2  1  2  1 /  1 2 2 1
तुम ने लूट/   लिया हम  कू / ये तुम्हारा  / है एहसान

अच्छा -- है एहसान’  [1221 ] को --है ’एहसाँ [122] कर दीजिए --देखिए क्या होता है? कर सकते हैं । एहसान  और एहसाँ में अर्थ के लिहाज़ से कोई फ़र्क नही --मगर तक़्तीअ’ के लिहाज़ से फ़र्क़ हो जायेगा और तब शे’र -फ़ाइ’लातु---मफ़ाईलु-----फ़ाइ’लातु----फ़ऊलुन यानी [2121---1221---2121---122 ] हो जायेगा यानी -बह्र-ए-मुशाकिल मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़

[3]  बह्र-ए-मुशाकिल मुसद्दस मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ \ मक़्सूर
फ़ाइ’लातु----मफ़ाईलु----फ़ऊलुन \फ़ऊलान
2121-------1221-------122     \ 1221
सरवर राज़ सरवर साहब के हवाले से -एक शे’र देखते हैं

 दर्द-ए-दिल की  करे हाय ! दवा कौन ? 
चारागर है बना तेरे सिवा  कौन ?
-नामालूम-
इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
2    1   2    1   / 1 2 2 1   / 1 2 2 1   = 2121---1221---1221
दर् द दिल की / करे हाय ! / दवा कौन ?
2  1  2    1   /  1 2 2 1 / 1 2 2  1     = 2121-----1221---1221
चार:गर है / बना तेरे    / सिवा  कौन ?
यह ’मक़्सूर’ की शुद्ध मिसाल है --दोनो मिसरों में .मक़्सूर’ ही इस्तेमाल हुआ है
हालाँकि अरूज़ और ज़र्ब में महज़ूफ़ और मक़्सूर का ख़ल्त जायज़ है यानी अरूज़ में ’फ़ऊलुन’ लाया जा सकता है --इजाज़त है

[4] मुशाकिल मुसद्दस मक़्बूज़ मक्फ़ूफ़ सालिम\मुस्बीग़
मुफ़ त इलुन----मफ़ाईलु---मफ़ाईलुन
2112-----------1221--------1222
 एक बात ध्यान देने की है
मफ़ाईलु--में    --लाम-- मुतहर्रिक है
मफ़ाईलुन में      मीम और फ़े --मुतहर्रिक है यानी 3- मुतहर्रिक एक साथ [पर दो adjacent रुक्न में ] तो इस पर ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और एक नई बह्र बरामद हो सकती है जैसे

मुफ़ त इलुन------मफ़ाईलुन--फ़ाईलुन [ मफ़ऊलुन]
2112-------------1222-----222
एक बात ध्यान देने की है जब भी तस्कीन-ए-औअसत या तख़्नीक़ का अमल मुज़ाहिफ़ रुक्न पर करते है तो ध्यान रहे आप के इस अमल से बह्र न बदल जाये। यह एक ज़रूरी शर्त है

इस बह्र की मुरब्ब: शकल भी हो सकती है और अर्कान होंगे
[5] मुशाकिल मुरब्ब: सालिम
फ़ाइ’लातुन-----मफ़ाईलुन
2122---------1222
 उदाहरण आप सोचे --आसान है।
एक खुदसाख़्ता शे’र लिख रहा हूँ - तक्तीअ’ आप कर के देख लें

तुम से माँगू तो क्या माँगू
प्यार की बस दुआ माँगूँ

आप जो मिल गए मुझको
या ख़ुदा और क्या माँगू


यूँ तो कुछ और भी बह्र मुमकिन है मगर इन सब की चर्चा करना यहाँ न ज़रूरी है न मुनासिब  है। यूँ भी बह्र-ए-मुशाकिल में शायरों ने कम ही कलाम कहे हैं
इस तरह बह्र-ए-मुशाकिल का बयान ख़तम हुआ और उर्दू में राइज़ 19-बह्रों की चर्चा भी ख़त्म हुई
अब अगले क़िस्त में किसी और बात पर चर्चा करेंगे।
अस्तु

{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

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