Wednesday, April 8, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : बह्र 221--2121--1221--212 पर एक चर्चा

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :[क़िस्त130] : 221--2121--1221--212  पर एक चर्चा 


[यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं और अरूज़ से जौक़-ओ-शौक़फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ]
मेरे एक मित्र ने अपनी ग़ज़ल का एक मतला बाँधा -

हर शै के दाम तय हुए बाज़ार के बग़ैर
हमने कही कहानियाँ किरदार के बग़ैर ।

[ आगे के अश’आर में - के बग़ैर- रदीफ़ क़ायम रखा गया ]

मित्र ने इस मतले का वज़न 221--2121---1221---212 लिखा [ बह्र का नाम नहीं लिखा]
यह बहुत ही मानूस और मक़्बूल [ परिचित और लोकप्रिय ] बह्र है सब लोग इस बह्र का नाम जानते है
और अमूमन सभी शो’अरा नें इस बह्र में शायरी की है।
इस बह्र का नाम है ---
बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ और अर्कान के नाम हैं
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु--मफ़ाईलु--फ़ाइलुन 

ख़ैर
अगर मतला को आप ध्यान से देखें तो अर्कान 221---2121--1221--212{ 1) ठहरता है। 
तो क्या 2121 को 212 कहना उचित ठहरता है? आज इसी पर विचार करेंगे।
मित्र की [ और अन्य मित्रों की भी] धारणा है या मान्यता है --""मिसरा के अन्त में 1+ की छूट जायज है।

[Poetic Liscence] है। आज इसी पर भी विचार करते है

आप 212 और 2121 [ जो शे’र के अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर है] में क्या फ़र्क़ है?
212 --हज़्फ़ ज़िहाफ़ के अमल से  "महज़ूफ़" है 2122 का और नाम है --फ़ाइलुन-
212[1] - कस्र ज़िहाफ़ के अमल से " मक्सूर" है 2122 का और नाम है --म्फ़ाइलान -

दोनो हॊ रेगुलर ज़िहाफ़ है अत: दो अलग अलग नाम भी होगा --

[अ ] 221---2121---1221--212 = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
[ब] 221---2121---1221--212(1) = बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्सूर

यह दोनों हॊ रेगुलर बह्र हैं मान्य बह्र है और अरूज़ के ऐन मुताबिक से हासिल हुए हैं।’

 यह बात अलग है कि  अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो -महज़ूफ़ या मक्सूर- दिख रहा है इनका आपस में ख़्ल्त जायज है यानी इनका आपस में अदला बदली किया जा सकता है ।
 मगर कब? 
बह्र के नाम का निर्धारण --मतला के मिसरा सानी से ही तय होता है और जब आप ने मिसरा सानी में मक्सूर [2121] बाँध ही दिया है तो फ़िर
इसका वज़न -212-[ अरूज़/जर्ब] दिखाने का कोई मतलब ही नही। 
हाँ अगर आप 212--लाना ही चाहते है तो अब मिसरा ऊला में ही लाया जा सकता है -जो जायज भी है और अलाऊ भी है ।
ठीक इसका उल्टा केस भी सोचें--
अगर मतला के मिसरा सानी में -212--बाँधा है तो --फ़िर मिसरा उला ही बचा जहाँ आप 2121 ला सकते हैं -जो जायज भी है और अलाऊ भी है 
क्यों कि मिसरा सानी से बहर फ़िक्स हो गई --रदीफ़ क़ायम हो गया --तो फिर जो भॊ अदल-बदल करना होगा वह मिसरा ऊला में होगा। सानी में नहीं।

शकील बदायूनी-की ग़ज़ल के 2-3 अश’आर देखते हैं

221---2121---1221--2121
[1] आँखें उनको देखती है नज़ारा किए बग़ैर
पर्दे में छुप गए हैं वो परदा किए  बग़ैर ।-1 [मतला]

हरचंद दर्द-ए-इश्क़ का दरमा नहीं मगर
बनती नहीं है फ़िक्र-ए-मदावा किए बग़ैर । -2

[ बाक़ी अश"आर मिसरा सानी के  221---2121---1221--2121  वज़न पर ही निभाया गया है]

मगर शे’र 2 के मिसरा उला का वज़न तो  221--2121-1221--212 है।

 जब कि  मिसरा सानी का वज़न तो          221---2121---1221--2121 है।

मतलब बात यह कि --212 [ महज़ूफ़] --मिसरा उळा मे ही लाया गया है --सानी में नहीं। क्योंकि मिसरा सानी का तो बह्र 
/वज़न तो पहले से ही तय है। जो भी खल्त करना है वह अब मिसरा उला के मुक़ाम पर ही होगा।

अब इसका उल्टा केस लेते है-- [शकील बदायूनी साहब की ग़ज़ल का ]

221--2121-1221--212
[2] मंज़िल की धुन में होश-ओ-ख़बर से गुज़र गए
सौ बार तेरी राहगुज़र से  गुज़र गए ।          -1 [मतला ]

हरचंद फ़र्श-ए-राह थी उनके लिए निगाह
फिर भी ख़बर नहीं वो किधर से गुज़र गए। -2

क्या पूछते हो लुत्फ़-ए-हुजूम-ए-नज़र ’शकील’
कुछ तीर थे जो कल्ब-ए-नज़र से गुज़र गए । -3

[ [ बाक़ी अश"आर के मिसरा सानी में 221---2121---1221--212 यही वज़न निभाया गया है]

शे’र 2 और शे’र 3 पर मिसरा उला [ अरूज़ के मुक़ाम पर ध्यान दें]
तो वज़न 2121 उतरेगा।

यानी कहने का मतलब यह है कि महज़ूफ़/मक्सूर [ 212/2121] का जो भी खल्त [ अदल बदल ] होगा वह मिसरा ऊला में ही होगा--मिसरा सानी में नहीं।
क्योकि मिसरा सानी का वज़न और बह्र तो मतला से Already fix हो चुकी है --उसे ही पूरी ग़ज़ल में निभाना होगा । जो छूट की बात होगी वह मिसरा उला
में ही होगी।
वैसे यहाँ इस वज़न में [1+] वाली छूट की ज़रूरत नहीं है,। जो भी उला-सानी में बदलाव दिख रहा है वह =’ज़िहाफ़’ के अमल के कारण है न कि छूट के कारण है
 आप कोशिश करेंगे तो और भी शायरों के सुखन में भी यह बात मिल जाएगी/नज़र आएगी।
ऐसी ही स्थिति कुछ अन्य बह्रों में भी होती है।

जहाँ तक मिसरा के एक हर्फ़ 1+] के छूट वाली बात है वह भी मिसरा ’उला में होगी। सही पूछें तो वह हर्फ़ मिसरा के आख़िर में --एक हर्फ़-ए-साकिन - 
ज़ाइद की बात होती है--किसी मुतहर्रिक हर्फ़ की बात नहीं होती। 
ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि हर शे’र का मिसरा का आख़िर हर्फ़ -साकिन हर्फ़- पर गिरता है । अगर मिसरा के आख़िर में आप एक साकिन हर्फ़ और बढ़ा देंगे तो क्या होगा?
कुछ नहीं--मिसरा के अन्त में -दो हर्फ़-ए-साकिन -एक साथ हो जायेंगे} कोई बात नहीं।
जब मिसरा के आख़िर में -दो हरफ़-ए- साकिन एक साथ आ जाता है तो तक़्तीअ में एक ही हर्फ़-ए-साकिन शुमार होता है--अत: बह्र वही की वही रहती है।

[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 
ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


Monday, March 30, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : [क़िस्त 129]: बह्र 221--1212--122 के बारे में

 

बह्र : 221--1212---122 के बारे में

ग़ालिब की एक ग़ज़ल है [पूरी ग़ज़ल गूगल पर मिल जाएगी]

चर्चा की सुविधा के लिए यहाँ मात्र उसके 3 शे’र ही लगा रहा हूँ


फ़रियाद की कोई लै नहीं है

नाला पाबंद-ए-नै नहीं है [मतला]


हरचन्द हर एक शै में तू है

पर तुझ-सी तो कोई शै नहीं है।


हस्ती है न कुछ अदम है ’ग़ालिब’

आख़िर तू क्या है,’ऎ’ नहीं है । [मक़्ता ]


अगर मतला की तक्तीअ’ किया जाए तो

मिसरा ऊला की बह्र = 221--1212--122 पर ठहरती है [
बह्र-ए-हज़ज मुसद्द्स अख़रब मक़्बूज़ महज़ूफ़]


जब कि

मिसरा सानी की बह्र = 222---212--122 पर ठहरती है

इसी मंच के एक मित्र ने यह सवाल किया है -


-क्या दोनों मिसरों की बह्र अलग अलग है? क्या मिसरा सानी में बह्र बदल रही है

और वो भी ग़ालिब की ग़ज़ल में।


आज इसी पर विचार करते है।

-----

- प्रथम दृष्टया देखने में तो ऐसा ही लगता है । मगर ऐसा है नहीं।


बहर-ए-हज़ज का बुनियादी रुक्न 1222 [ मफ़ाईलुन ] है । इस सालिम रुक्न के साथ एक समस्या है या कहें कि एक ख़ूबी है ।

इस सालिम रुक्न [1222 ] पर ख़र्ब का भी ज़िहाफ़ लग सकता है और ख़रम का भी ज़िहाफ़ लग सकता है और इत्तिफ़ाक़न दोनो हॊ ज़िहाफ़ ’सदर/इब्तिदा-

के लिए मख्सूस [ निर्धारित है] यानी मिसरा के प्रथम मुक़ाम पर ही ये दोनों ज़िहाफ़ लग सकते हैं। यानी


1222+ ख़र्ब से = अख़रब 221[ मफ़ ऊ लु ] हासिल हो सकता है ।


1222+ ख़्ररम से = अख़रम 222 [ मफ़ ऊ लुन]हासिल हो सकता है

और एक बात और

इस बह्र का मिसरा अख़रब से भी शुरु हो सकता है और अख़रम से भी।


[A] अगर मिसरा ’अखरब ’ से शुरु होगा तो

221--1212--122 वज़्न होगा और नाम होगा बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस अखरब मक़बूज़ महज़ूफ़

[B] अगर मिसरा ’अख़रम’ से शुरु होगा तो

222---1212--122 होगा और नाम होगा -बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रम मक़्बूज़ महज़ूफ़

यह दोनॊ बह्रें ज़िहाफ़ के ऐन मुताबिक [विधिवत अमल ] से हासिल हुई है । मान्य है।


अब बह्र [A] को ध्यान से देखें--- इस बह्र में दो adjacent रुक्न [ 221 + 1212 ] में दो 1-1- आमने सामने आ गए यानी तीन मुतहर्रिक हर्फ़

[लाम-मीम-फ़े ] एक साथ आ गए तो ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और दो नया रुक्न 222 --212 बन सकता है और यही बना भी है इस वज़न में।


मगर यह रुक्न- 222 --अख़रम से नही बना है यानी यह अख़रम वाले 222 से जुदा है अलग है, मुख्तलिफ़ है । अगरचे देखने में दोनो की शकल एक जैसी है --जैसे सीता-गीता फ़िल्म में।

कभी कभी अरूज़ में ज़िहाफ़ के अमल से ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक बरामद होते रहते है, जो भ्रम पैदा करते रहते हैं।

सामान्य जन धोखा खा जाते है मगर जो सत्य जानते है, फ़ितरत पहचानते है वो बख़ूबी जानते है कि कौन सीता है कौन गीता है। इन मुज़ाहिफ़ अर्कान पैदाइश कैसे हुई है।

मगर ऐसे अर्कान नाम एक जैसा ही रखा जाता है । इन दोनों केस में -222- का नाम - मफ़ऊलुन-ही रहेगा , बरामद चाहे जैसे हुआ हो। आप को मुतमुईन होना है कि ’रामनरायन’--गाजियाबाद वाले हैं --या बनारस वाले।

ख़ैर

अब बह्र [B] को ध्यान से देखें 222---1212---122 इस वज़न में तख़्नीक़ के अमल की कोई स्थिति ही नही है, न गुंजाइश है, न ज़रूरत है। यह सामान्य प्रक्रिया से हासिल हुई है।


तो ?

बह्र [A] अगर मिसरा उला 221-[ अख़रब] - से शुरु हुआ है तो मिसरा सानी में 222-[ तख़नीक के अमल से] लाने की इज़ाजत है। और मिसरा सानी में इसके साथ

के अर्कान यानी 212--122 भी निभाना ज़रूरी होगा। बहर का नाम नहीं बदलेगा मात्रा भार Same ही रहेगा यानी 16 का 16 ही रहेगा।


बह्र [B] अगर मिसरा अख़रम से शुरु हुआ है तो फिर ऐसी कोई सुविधा इसमें हासिल नहीं होगी और तमाम मिसरा उला-या सानी सब इसी वज़न में निभाने होंगे ।

[ यह मेरा ख़याल है]


आप चाहे तो ग़ालिब की इस ग़ज़ल की पूरी तक्तीअ’ कर मुतमुईन हो सकते हैं।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर


-आनन्द पाठक ’आनन’-

Friday, March 27, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128] : तस्कीन-ए-औसत के बारे में

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त[128]  : तस्कीन-ए-औसत के बारे में


पिछले अंक में ’तस्कीन-ए-औसत’ पर एक चर्चा की थी। उसी चर्चा को ज़रा और विस्तार देते हैं।

उन पाठकों के लिए जो उस परिचर्चा से वंचित रह गए थे उनके लिए इस अमल की परिभाषा पुन: लिख रहा हूँ।

"---जब किसी -"एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न में तीन मुतहर्रिक एक साथ आ जाए तो *औसत* [ बीच वाला] मुतहर्रिक 

साकिन हो जाता है और एक नया रुक्न बनता है। यह फ़ारसी का अमल है मगर इसके साथ एक शर्त [rider]

भी  है कि इस अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से वह बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए--"


यह कोई नियमित [ रेगुलर]  ज़िहाफ़ नहीं हैं--बल्कि फ़ारसी का एक अमल मात्र  है। परिभाषा पर ध्यान दें--

एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न ? --क्या मतलब?

एकल रुक्न ही क्यों ?अगर दो मुज़ाहिफ़ रुक्न आमने सामने आ जाए तो? यानी दो adjacent रुक्न आ जाए और तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ आ जाएँ तो?

तो क्या ? तब भी तस्कीन ए औसत का अमल हो सकता है । मगर फिर उसे तस्कीन-ए-औसत का अमल न कह कर ’ तख़्नीक़ का अमल’ कहेंगे।

इस पर कभी बाद में चर्चा करेंगे।

एक बार फिर परिभाषा पर ध्यान दें--

मुज़ाहिफ़ रुक्न ही क्यों ? सालिम रुक्न पर इसका अमल क्यों नही कर सकते?? देखते हैं

हम जानते है कि सालिम अर्कान में सिर्फ़ दो ही एकल रुक्न ऐसे है जिसमे 3- मुतहर्रिक एक साथ आते हैं--

[1] बह्र-ए-कामिल का 1 1 2 1 2 [ मु त फ़ा इ लुन] यानी [मीम-ते-फ़े -तीन मुतहर्रिक-एक साथ]

[2] बह्र-ए-वाफ़िर  का 1 2 1 1 2 [ मु फ़ा इ ल तुन ] यानी [ ऐन-लाम- ते  तीन मुतहर्रिक--एक साथ]

अब एक एक कर के देखते है ।

इस बह्र को तो आप पहचानते होंगे

11212---11212----11212---11212

बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम ।


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

बह्र-ए-कामिल की शकल कुछ निम्न लिखित हो जाएगी

2212---2212---2212-------2212


अरे यह क्या हो गया ?? यह तो बह्र ही बदल गई। यह तो  बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम हो गई । और वही शर्त [rider] 

सामने आ गई कि अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए]

यहां तो बह्र कामिल से चल कर रजज़ में चली गईं। यही कारण है तस्कीन का अमल ’सालिम रुक्न/सालिम बह्र-पर नहीं की जाती है


अब दूसरी बह्र वाफ़िर को देखते है 

12112 ---12112---12112---12112 को देखते है

[ बह्र-ए-वाफ़िर मुसम्मन सालिम ]


अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल कर के देखते हैं । यानी दो adjacent 1 1 को =2 कर के देखते है क्या होता है?

 1222---1222--1222---1222 हो गई

अरे यह क्या हो गया?? यहाँ तो बह्र ही बदल गई। यह बहर तो हज़ज में चली गई।


इसीलिए तस्कीन के अमल के साथ एक Rider ,एक शर्त लगा दिया गया है जिससे बह्रों का आपस में गडमगड न हो, ख़्ल्तमल्त न हों।

यही कारण है कि इस का अमल ’सालिम रुक्न’ पर नही करते हैं। जब भी करते है तो किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न पर ही करते हैं, एकल रुक्न पर करते हैं।


अगली चर्चा में इसी अमल पर अभी कुछ और चर्चा करेंगे,  दिलचस्प बात करेंगे।


[नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके]

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

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Tuesday, March 24, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [127] : एक परिचर्चा = बह्र 1121--2122 // 1121--2122 पर

 एक परिचर्चा = बह्र 1121--2122  // 1121--2122 पर


किसी मंच पर एक तरही मुशायरे का अयोजन चल रहा था जिसमें मंच के सदस्य बड़े उत्साह से भाग ले रहे थे।

मुशायरे का तरही मिसरा था --*मिरी ज़िंदगी है नग़मा, मिरी ज़िंदगी तराना*--

और वज़न लिखा था   --1121--2122 // 1121-2122

और नाम दिया गया था- मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन //मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन और बह्र का नाम लिखा गया थ 

बह्र-ए-रमल मुसम्मन मश्कूल सालिम मुज़ाइफ़

-----

[गुस्ताख़ी मुआफ़ी के तहत --

 मेरे हिसाब से वज़न का सही नाम होता -

  फ़ इला तु--फ़ाइलातुन //फ़ इला तु--फ़ाइलातुन 

और यह वज़्न मुसम्मन तो है, मगर *मुज़ाइफ़* नहीं है ]

यह बह्र कैसे बनती है यह आप सब जानते है--मैं आज इस पर चर्चा नहीं करुँगा।

 बल्कि इस बह्र के एक दिलचस्प पहलू पर चर्चा करना चाहता हूँ

।हो सकता है मंच के बहुत से लोग वह दिलचस्प पहलू  जानते है। यह परिचर्चा उन पाठकों के लिए है जो वह नहीं जानते है।

आप सभी ’तस्कीन-ए-औसत ’ के बारे में जानते होंगे। बहुत आसान अमल है 

जब किसी -"एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न में तीन मुतहर्रिक एक साथ आ जाए तो *औसत* [ बीच वाला] मुतहर्रिक साकिन हो जाता है और एक नया रुक्न बनता है। यह फ़ारसी का अमल है मगर इसके साथ एक शर्त [rider]भी  है कि इस अमल से बह्र का नाम न बदल जाए[ यानी इस अमल से वह बह्र किसी दूसरे बहर में न चली जाए]


1121--2122 // 1121--2122 पर लगा कर देखते है । लग सकता है 

1121-- फ़ इला तु--  में तीन मुतहर्रिक हर्फ़ [ फ़े-ऐन-लाम ] एक साथ जो आ गए

और फ़ इ लातु - वैसे भी एक मुज़ाहिफ़ रुक्न ही है [ फ़ाइलातुन की] तो लग सकता है

तो इस 1121 को 221 कर सकते है 

 तो उक्त बह्र की  शकल हो जाएगी

221---2122  // 221--2122 

अरे यह क्या हो गया ? यह बह्र तो बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अखरब हो गई।

बस यहीं Rider [शर्त ] सामने आ गई । तस्कीन के अमल से बह्र नहीं बदलनी चाहिए।

अत: 1121--2122 // 1121--2122 पर यह अमल नहीं किया जा सकता।

मतलब कि इस बह्र में

एक मिसरा -1121--2122 // 1121--2122 

दूसरा मिसरा 221---2122  // 221--2122  में नहीं कह सकते इस आधार पर कि  तस्कीन-ए-औसत का अमल किया है।

 नोट- : इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।]

्सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

8800927181


Saturday, February 21, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [126] : 221--2121--1221--122 वज़न पर एक चर्चा


क़िस्त [126] : 221--2121--1221--122 वज़न पर एक चर्चा

[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ़

प्रश्न : मेरे एक मित्र ने एक प्रश्न किया कि क्या

221---2121---1221---122

यह बह्र मान्य है अस्तित्व में है? क्या इस बहर में कुछ लिखा जा सकता है ?

साथ ही मान्यवर मित्र ने यह भी बताया कि उनके कुछ शायर मित्र ने उन्हे बताया था कि हाँ इस वज़न पर शायरी की जा सकती है ।

उत्तर : इसका एक शब्दीय उत्तर है --नही [ मेरे हिसाब से]

उनके कुछ शायर मित्रों ने उन्हें कहा/ बताया कि हाँ इस वज़न पर शे’र/ग़ज़ल कहे या लिखे जा सकते है। उनके मित्रों के कहे हुए कथन पर कोई टिप्पणी तो नहीं कर सकता, उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकता। यहाँ

हर मोड़ पर किरदार बहुत हैं।

मगर मैं अरूज़ के नियम क़ायदे क़ानून से ही यहाँ बात करूँगा।

हाँ अगर ग़ालिब, मीर, ज़ौक़, दाग़ इक़बाल जौसे शायरों ने अगर इस वज़न और बह्र में कुछ कहा हो उदाहरण हो तो अवश्य विचारणीय ्होगा ।

ख़ैर

अब प्रश्न पर आते है--। इस वज़न पर गज़ल या शे’र क्यों नहीं कहे जा सकते ?

पहला तो यह कि किसी भी वज़न क्रम पर आप कोई मिसरा या शे’र कह सकते है मगर इसका तात्पर्य यह नही कि वह किसी मुस्तनद मान्य बह्र में ही होगा। और यह भी इस उमीद से कह रहें हों कि यह वज़न किसी न किसी बह्र से टकराएगा ही -नाम भले न मालूम हो।


ख़ैर अब प्रश्न पर आते हैं।

[क] -A-- -B--- -C- -D-

221--2121---1221---122

आप यहाँ बस --D- पर ध्यान दें

इसलिये कि नीचे लिखे , हम आप सभी एक बहुत लोकप्रिय मानूस बह्र से पहले से परिचित है और पहले से ही प्रचलन में है।

[ख} -A’-- - D'--- -C'- -D'-

221-- -2121-- -1221---212 जिस पर आप लोगो ने शायरी भी की होगी।

मफ़ऊलु--फ़ाअ’लातुन---मफ़ऊलु---फ़ाअ’लुन और नाम है

बह्र-ए-मुज़ारे’मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़-महज़ूफ़

आप यहाँ -D-[ 122 ] AND D' [ 212 ] पर ध्यान दें ।

सवाल यह कि क्या हम D' [ 212 ] को -D-[ 122 ] कर सकते हैं ?

जवाब है नहीं । क्यों?

कारण की बह्र [ख] बह्र मुज़ारे से विधिवत ज़िहाफ़ लगा कर अरूज़ के ऐन मुताबिक़ हासिल हुआ है [ इसकी चर्चा मै पहले कहीं कर चुका हूँ।

यहाँ पुन: लिखन उचित नही ।

बह्र-ए-मुज़ारे एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम बह्र [ 1222]+ [2122] के योग से बनता है और इसकी मुसम्मन शकल

यूँ होगी

--A--- --B--- --C-- -D-

1222---2122---1222----2122

यहाँ भी -D- [2122] पर ध्यान दें।

2122 = फ़ा इला तुन = पर अगर हज़्फ़ का ज़िहाफ़ लगा दें तो [ जो ज़र्ब/ अरूज़ मुक़ाम के लिए ख़ास हैं] तो हासिल होगा महज़ूफ़ 212


मगर इस सालिम रुक्न [2122 ] में ऐसा कोई ज़िहाफ़ नज़र नही आया जो 2122--को-- 122 कर दे।

अत: मेरे हिसाब से

221---2121--1221--122 से अरूज़ के क़ायदे से कोई मान्य बह्र नही बनती या बन सकती ।


सिर्फ़ किसी भी वज़न के क्रम/अनुक्रम पर शे’र कहना अलग बात है, मनाही नहीं, कर सकते है। कौन रोकता है।

मगर अरूज़ से निर्धारित तय बह्र में शे’र कहना अलग बात है। मरजी आप की।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

Wednesday, January 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [125] : एक शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल और उसकी बह्र ??


क़िस्त : एक शायरा ताजवर सुलताना की एक ग़ज़ल और उसकी बह्र ?
[ यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।
यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है
अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात
हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।

इसी मंच पर मेरे एक मित्र ने यह सवाल किया था कि -
ताजवर सुल्ताना साहिबा की नीचे लिखी ग़ज़ल किस बह्र में है?
बह्र इन दो बह्रों में से कौन सी बह्र में है।
[क] =बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
या
[ख] =बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
२१२१-२२२-२१२१-२२२

[ नोट = स्थान की कमी के कारण शायरा ताजवर सुलताना की ग़ज़ल के 2-3 शे’र ही यहाँ पर लगा रहे है पूरी ग़ज़ल इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]
ग़ज़ल [ शायरा :ताजवर सुलताना ]
हुस्न-ओ-इश्क़ का संगम देर तक नहीं रहता
कोई भी हसीं मौसम देर तक नहीं रहता
लौट जाओ रस्ते से तुम नए मुसाफ़िर हो
प्यार का सफ़र हमदम देर तक नहीं रहता
कौन जाने कब किस पर ज़िंदगी ठहर जाए
कोई रुस्तम-ए-आज़म देर तक नहीं रहता

______ताजवर सुल्ताना---
------- -------------------------------- ---
उत्तर : इस ग़ज़ल की बह्र [मेरे ख़याल से और मेरे हिसाब से]
मुक्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक़्तूअ’ है।
अगर आप इस उत्तर से सन्तुष्ट हैं तो आगे बढ़ें, अन्यथा आगे पढ़े ।
किसी ग़ज़ल की बह्र क्या है यह तो शायर खुद ही सही सही बता सकता है, मगर ग़ज़ल के ऊपर बह्र या वज़न लिखने की परम्परा नहीं है। परम्परा अपनी जगह -Inspectory अपनी जगह।
ख़ैर।
फिर भी मित्र के सवाल का जवाब ब नुक़्त-ए-नज़र यथा संभव यथा शक्ति देने की एक कोशिश कर रहा हूँ।
अगरचे ऊपर दिए हुए दोनो वज़न से इस ग़ज़ल की तक़्तीअ की जा सकती है .शायद उन्होने किया भी होगा। दिए हुए वज़न से तक्तीअ’ तो हो सकती है मगर देखना होगा कि उस वज़न से कोई मान्य मुस्तनद बह्र होती भी है क्या? बनती भी हैं क्या ? देखते है--
--- --- ------
[क] बहरे-हज़ज मुसम्मन अशतर
२१२-१२२२-२१२-१२२२
यह तो आप जानते ही हॊंगे बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम का वज़न होता है-
= 1222---1222---1222--1222
अगर इस पर -शतर - का ज़िहाफ़ लगाएँ तो ? शतर एक मुरक़्कब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ [ खरम+ क़ब्ज़ ] से मिलकर बना है
और खरम --एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के मुक़ाम सदर/इब्तिदा पर ही लगता है हस्व या ज़र्ब के मुकाम पर नहीं।
1222 + शतर = अश्तर 212 [ फ़ाइलुन ]
अत: हज़ज के मुसम्मन सालिम से निम्न बहर
212--1222---1222--1222 तो बन सकती है जिसमे हस्व के मुक़ाम पर -212-पर नहीं लाया जा सकता।
अत: निम्न बह्र
212--1222---212---1222 वज़न से एक मान्य बहर नहीं बन सकती।अत: इससे उक्त ग़ज़ल की तक़्तीअ’ करने का कोई अर्थ नहीं।
********** ******
अब दूसरी बह्र देखते है
[ख] बहरे-मुक्तज़िब मुसम्मन मतवी मक़तवी
= २१२१-२२२-२१२१-२२२
मुक्तज़िब एक मुरक़्कब बह्र है जो दो सालिम रुक्न [ 2221+ 2212 ] से मिल कर बनता है
और इसका मुसम्मन सालिम बहर होगा--
-A-- --B- ---C--- --D--
=2221---2212----2221----2212
[ यहाँ -A- और -C- एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यहाँ -B- और -D एक ही है मगर मुक़ाम अलग अलग है
यानी 2221= मफ़ ऊ लातु = [ बह्र-ए-मुक़्तज़िब का बुनियादी रुक्न ]
इस पर कुछ ज़िहाफ़ लगा कर देखते है--
A= 2221+ तय्यी = मुतव्वी 2121 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो यहाँ सदर के मुक़ाम पर आया है
B= 2212 + तय्यी = मुतव्वी 2112 : तय्यी एक आम ज़िहाफ़ है जो किसी मुक़ाम पर आ सकता है जो जो यहाँ हस्व के मुक़ाम पर आया है
अगर इस पर तस्कीन-ए-औसत का अमल [ तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए हैं किया जाए
तो 2112= 222 हो जायेगा और इसे "मुतव्वी मुसक्किन" बोलेंगे।
C = A= 2121
D = 2212 + क़तअ’= मक्तूअ" 222 = मक्तूअ’ एक खास ज़िहाफ़ है जो अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है जो यहाँ अरुज़/ज़र्ब के मुक़ाम पर
= आया है
अत: बह्र [ख] का स्वरूप हो गया
-a-- ---b--- --c-- --d---
[ख] = 2121---222----2121---222- जिससे मित्र ने तक्तीअ’ करने की कोशिश की।
ध्यान रहे-----b-- और --d--- का वज़न समान है पर दोनो का वज़न भिन्न भिन्न अमल से प्राप्त हुआ है।
और इस बह्र क नाम होगा
बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मुतव्वी मुसक्किन मक्तूअ’ --जो एक मुस्तनद[प्रामाणिक] बह्र है।
अच्छा यह बह्र इत्तिफ़ाक़न -बह्र-ए-शिकस्ता भी है । यानी
2121---222-//-2121---222-

अब ताजवर सुलताना की ग़ज़ल की तक़्तीअ इस वज़न पर कर के देखते है। अगर तक़्तीअ’ इस बह्र और इस वज़न पर सही सही उतर जाए
तो ग़ज़ल की बहर यह हो सकती है।
सादर
-आनन्द पाठक ’आनन’
[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।
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Tuesday, January 13, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त [124]: बह्र का वज़न एक और नाम दो

उर्दू बह्र पर एक बातचीत: क़िस्त 124  : बह्र का वज़न एक और नाम दो

[ यह आलेख उनके लिए  है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ है 

अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात 

हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद होना चाहते है ।


मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया था कि बह्र-ए-मदीद क्या एक शिकस्ता: बह्र है ?

मैने इसका जवाब तो उन्हे दे दिया वह सन्तुष्ट हुए या नहीं  मालूम नहीं, पर जवाब देने और अध्ययन के दौरान एक

दिलचस्प वाक़िया भी पेश नज़र आया । और वह यह कि दो बह्र की वज़न तो एक है मगर नाम मुख्तलिफ़ है।

ऐसा ही एक वाक़िया पहले भी नज़र आया था जिसको मैने अपने ब्लाग 

www.arooz.co.in  [क़िस्त 74 ] लिखा था।आप वहाँ पढ़ सकते हैं

ऐसा ही एक मसला  -22--22--22--22- वाली बह्र पर उठता है ।


मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि सिर्फ़ यह वज़न मात्र लिख देने से ही काम न चलेगा। लोग बह्र का नाम नहीं लिखते बस इसी  numerical system से ग़ज़ल लिख लेते हैं । मगर मेरे एक सवाल है कि  आप के सभी मिसरे 22--22--22--22 पर होते हैं क्या? मिसरे मे कहीं -1- नहीं आता क्या ? तो फिर 22--22--22--22 का मतलब क्या?

मैं बार बार कहत हूँ कि 22--22--22--22 खुद में बह्र नहीं ।अपितु मात्र किसी मूल बह्र का एक वज़न /एक स्वरूप मात्र है  यही वज़न दो- मुख्तलिफ़ मूल बह्र से बरामद हो सकती है।


[क] --मुतक़ारिब खानदान से भी

[ख] -- मुतदारिक खानदान से भी


मात्र 22--22--22--22-- लिख देने से यह पता नहीं चलता कि आप किस खानदान वाली बह्र की बात कर रहे है या ग़ज़ल लिख रहे हैं और उस पर अफ़सोस यह कि कुछ दोस्त इसे मीर की बह्र कह देते है या से मन्सूब कर देते है।

ख़ैर इस विषय पर कभॊ बाद में विस्तार से बात करेंगे।

अरूज़ एक बहुत आसान विषय है और जब आप इससे खेलते हैं तो ऐसे ही दिलचस्प वाक़ियात नमूद [ प्रगट] होते रहते है।

आज का आलेख इसी विषय पर है। आप भी आनन्द उठाएँ और अपनी राय दें ।  

अब अपने मित्र के मूल प्रश्न पर आते है  बह्र-ए-मदीद के बारे में

 आप जानते है कि बह्र-ए-मदीद उर्दू के प्रचलित बह्रों में से एक मान्य बह्र है । यह बात अलग है कि इस बह्र[मदीद] में बहुत कम शायरी 

हुई } मगर मान्य बहर तो है ही।

 बह्र-ए-मदीद एक मुरक़्कब बहर है और इसका बुनियादी  वज़न होता है--

2122---212  [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन ]

और इसकी सालिम मुसम्मन  शकल होती है 


[क] 2122--212---2122---212 = नाम होगा बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम

अच्छा 2122---2122 [ फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ] इस  बह्र को आप ज़रूर पहचानते होंगे? 

अरे वही बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम

अच्छा अब आख़िरी वाले [ ज़र्ब/अरूज के मुकाम वाले] 2122 पर एक ज़िहाफ़[ हज़्फ़ का ज़िहाफ़ ]लगा कर देखते है --क्या होता है

2122+ हज़फ़ = 212 [ फ़ाइलुन ] महज़ूफ़  होगा

यानी 

बह्र 2122 -2122  अब 

2122-212 हो गई । मतलब बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ हो गई

अब इसे दोगुना कर दें यानी मुज़ाइफ़ कर दे तो क्या होगा "?

[ख]   2122-212- 2122--212

बह्र-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ मुज़ाइफ़

फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन // फ़ाइलातुन--फ़ाइलुन  

और इसका नाम होगा      

अब [क] और [ख] की तुलना कीजिए

क्या दोनो बह्र  का वज़न एक नहीं है ? और नाम मुख्तलिफ़ नहीं है ?

इसी लिए कहता हूँ कि सिर्फ़ वज़न लिख देने से ही काम नहीं चलेगा --बह्र का नाम भी लिख दे तो बेहतर।

और न लिखें तो और भी बेहतर?

अच्छा तो एक सवाल -- हम पहचानेंगे कैसे कि

2122--212---2122--212  यह बह्र मदीद से हासिल हुआ कि रमल से हासिल हुआ ?

इसका जवाब कभी अगले क़िस्त में।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही 

ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

 सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-






Sunday, January 4, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [ क़िस्त 123 ] : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे में

 विषय : बह्र 1212----1122----1212---22 के बारे मे

यह आलेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिखा गया है।

यह आलेख उनके लिए भी है जो अरूज़ के बुनियादी इस्तेलाहात से [ परिभाषाओं से] वाक़िफ़ है अरूज़ आशना हैं अरूज़ से जो जौक़-ओ-शौक़ फ़रमाते हैं .मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहते है, मुस्तफ़ीद [ लाभान्वित] होना चाहते है ।

---A-- --B-- -C-- -D-

बह्र 1212----1122--------1212---22

मेरे मित्र का इस बह्र के बारे में एक सवाल था -
क्या तीसरे मुक़ाम यानी C [हस्व] पर जो 1212 रुक्न दिखाई दे रहा है

क्या उसे -1122 - ले सकते हैं??

उत्तर : नहीं [ मेरे हिसाब से]

----- ----

फिर अगला सवाल यह होगा कि क्यों नहीं ले सकते?

तो जवाब ज़रा विस्तार से देना होगा ।


1212---1122---1212---22

इस बह्र को आप सब पहचानते होंगे। बड़ी लोकप्रिय और प्रचलित बहर है। अमूमन सभी शायरों ने [यह ख़ाकसार सहित] इस बह्र में शायरी की है

इस बह्र का नाम है -

बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़

हम जानते हैं कि बह्र-ए-मुज्तस एक मुरक़्कब [ मिश्रित ] बह्र है यानी दो सालिम रुक्न [2212+ 2122 ] से मिल कर बनती है और इसकी

मुसम्मन शकल होती है

-A--- --B-- --C- --D--

2212-- 2122-----2212---2122

मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन --मुस तफ़अ’ इलुन-फ़ाइलातुन

[ मुस तफ़अ’ लुन --पर ध्यान दीजिएगा । इसकी चर्चा आगे करेंगे]

अगर इन सालिम अर्कान पर ज़िहाफ़ लगाते चले तो

A & C = 2212 + ख़ब्न = मख्बून 1212

B =2122 + ख़ब्न = मख़्बून 1122

D 2122 +ख़ब्न +हज़्फ़ = 22

यानी इस बह्र की शकल अब यूं हो जायेगी-

1212---1122----1212---22

और यही बह्र-ए-मुज्तस मुसम्मन मख्बून महज़ूफ़ है जिससे आप सभी परिचित है।

--- ---- --

मगर सवाल ?

सवाल तो अभी वहीं खड़ा है कि

C वाले मुकाम पर 2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] को 1122 कर सकते या ले सकते है या नहीं??

2212 [ मुस तफ़अ’ इलुन ] --बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है और इस रुक्न पर ऐसा कोई ज़िहाफ़ नहीं है जो इसे

1122 कर सके ।

अत: 2212 को 1122 नहीं कर सकते।

[ चलते चलते एक बात और --मुसतफ़इलुन [2212 -पर

मुसतफ़इलुन [2212 को उर्दू इमला में लिखने की दो शकलें है

एक तो यह

2 2 12 [ सबब + सबब + वतद-ए-मजमुआ ] -12- पर ध्याद दें यह वतद ए मज्मुआ की शकल है [ मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक+ साकिन]

जिसे मुतस्सिल शकल कहते है यानी सभी हर्फ़ मिला कर, सिलसिले से लिखते हैं ।


दूसरी यह --

मुस तफ़अ’ लुन = 2 21 2 [ सबब + वतद-ए-मफ़रूक़ ]

-21 [ तफ़ अ’] पर ध्यान दे यह वतद -ए-मफ़रूक़ है [ मुतहर्रिक+ साकिन+ मुतहर्रिक]

यानी इसमे दो मुतहर्रिक में फ़र्क है बीच में साकिन हर्फ़ है इसी लिए इसे मफ़रूकी [ यानी फ़र्क़ वाली] शकल कहते है। इसमे इमला में वतद को फ़र्क दे कर लिखते है


अगरचे दोनो का वज़न और लगभग तलफ़्फ़ुज़ same है


तो यह बात बताने की क्या ज़रूरत थी?

ज़रूरत यह थी कि दोनॊ शकलों के ्ज़िहाफ़ अलग अलग होते है।


और मुज्तस में यही बतद अपने मफ़रूक़ी शकल में है यहाँ


एक बात और --उर्दू शायरी में ्बह्र-ए-मुज्तस अपनी सालिम शकल यानी [2212 + 2122]--[2212-+--2122 } में

प्रचलन में नहीं है।


[[note -: इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाए जिससे यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-