क़िस्त : वा’दा -इरादा- जैसे क़ाफ़िया -पर एक चर्चा
किसी मंच पर मेरे एक मित्र ने परवीन शाकिर का एक मतला लिखा--
उसने भी लौटने का इरादा नही किया
हमने भी भूल जाने का वा’अद: नहीं किया।---परवीन शाकिर
और सवाल किया कि मतले का क़ाफ़िया क्या ठीक है?
मेरे एक अन्य मित्र ने क़ाफ़िया [और इस ग़ज़ल का दिगर कवाफ़ी--
यानी लबादा--बादा--ज़ियादा--सादा-- वग़ैरह] को दुरुस्त ठहराया।
मेरे मित्र का सवाल था क्यों और कैसे?
आज की चर्चा इसी सवाल पर।
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इक़बाल साहब का एक शे’र है=--
ख़ामोश ऎ दिल! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला क़रीना है , मुहब्बत के क़रीनों में ।‘-अल्लामा इक़बाल
[इस ग़ज़ल की बह्र है -1222---1222--1222--1222]
यानी -क़री्ना और क़रीनो- दोनों का वज़न -122- है।
साथ ही कुछ और दीगर शब्द ख़याल में रखें जैसे--पर्दा--परवाना --आदि।
ये सभी शब्द [और ऐसे हज़ारो शब्द [उर्दू-अरबी-फ़ारसी में ] के इमला में
आख़िरी हर्फ़ हा-ए-हूज़ [छोटॊ -हे-यानी गोल -हे-आती है} से लिखे जाते हैं।
[मैं यहाँ --उर्दू हा-ए-हुत्ती[ बड़ी हे] --हा-ए- हूज़ , हा-ए-हूज़ की कितनी किस्में होती हैं
हा-ए-मल्फ़ूज़ी--हा-ए-मख्फ़ूफ़ी--दो चश्मी हे-आदि , इनके शब्द पर क्या असरात होते हैं--discuss -नहीं करूँगा -ये उर्दू व्याकरण का विषय है और विस्तार में यहां discuss करने से विषय बोझिल और दुरूह हो जाएगा]
संक्षेप में आप यह समझ लें--
[क[-- जिस लफ़्ज़ के आखिर में हा-ए-हूज़ [ छोटी हे] लगी हो वो अपने पहले आने वाले हर्फ़ को
मुतहर्रिक[1] कर देता है।
जैसे वा’दा = वा’द: [21]
पर्दा = पर्द: [21]
परवाना= परवान: [21]
क़रीना = क़रीन: [21]
[ख] -हा-ए-हूज़ की आवाज़ कुछ कुछ -अलिफ़ की आवाज़- के समान होता है । अगर इस को खींच कर [तवील कर] पढ़ा जाए तो--आ- की आवाज़ सुनाई देगा
जैसे
वा’द: = वादा [22]
पर्द: = पर्दा [22]
परवान: = परवाना [222]
करीन: = करीना [22 ]
और ऐसे ही बहुत से हज़ारो लफ़्ज़
मेरे मित्र को इसी बात पर शंका थी और उन्हे
इरादा--और वा’द: हमक़ाफ़िया नही लग रहा था।
ऐसे शब्द कभी- 21- की हैसियत रखते है तो कभी 22 की--जैसी बह्र और अर्कान की डिमांड हो।
इक़बाल साहब ने [ क़रीना ]और शाकिर साहिबा ने [वादा ] अपनी ग़ज़ल में इसे -22- पर बरता है ।
एक बात और--
चूंकि ग़ज़ल उर्दू की विधा है- बह्र-वज़न -रुक-अर्कान अरूज़ आदि सब उर्दू से ही प्रतिपादित है
तो थोड़ा बहुत उर्दू व्याकरण -इमला आदि की भी जानकारी हो तो बेहतर।
[ इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी
निशानदिहि फ़रमा दें ताकि मैं खुद को दुरुस्त कर सकूँ
-सादर-
-आनन्द.पाठक ’आनन-
8800927181
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