उर्दू बहर पर एक बातचीत :क़िस्त 147: : रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [भाग -02]
पिछली क़िस्त में , रुबाई क्या है - इसकी विशेषता क्या है- पर चर्चा की थी। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज क़ता पर चर्चा करेंगे।
क़ता क्या है - ,इसकी विशेषता क्या है -आदि पर प्रकाश डालने की एक कोशिश करेंगे ।
सामान्यतया क़ता भी चार लाइन की रुबाई की ही तरह एक रचना है जो अपना स्वत्नन्त इकाई की हैसियत रखता है। क़ता’का लगवी [शब्दकोशीय] अर्थ टुकड़ा, कटा हुआ, होता है यानी ग़ज़ल के अंश का एक असंबद्ध टुकड़ा जो ग़ज़ल के भाव भूमि से अलग हो , कटा हुआ हो।
लेकिन रुबाई और क़ता में थोड़ा फ़र्क है-
- रुबाई के लिए ख़ास वज़न बह्र मुकर्रर है जब कि क़ता के लिए ऐसी कोई बंदिश नहीं । क़ता ग़ज़ल के किसी भी बह्र में कही जा सकती है।
-रुबाई में पहली ,दूसरी और चौथी लाइन हम क़ाफ़िया होती है। यह एक लाज़िमी शर्त है । मगर क़ता में दो स्थित होती है
--[1] किसी किसी क़ता में भी पहली दूसरी और चौथी लाइन [रुबाई की तरह] हमक़ाफ़िया होती है । इस स्थित में फिर वह शे’र का मतला और एक शे’र हो जाता हओ
जिसे कुछ शायर मुशायरे में अपनी ग़ज़ल के पहले यह कह कर सुनाते हैं--हज़रात एक मतला एक शे’र पेश कर रहा हूँ--
या फिर
--[2] किसी किसी क़ता में दूसरी और चौथी लाइन ही हम क़ाफ़िया होती है।
-बाक़ी जहाँ तक भाव ख़याल और बुलंदी का सवाल है वह बिलकुल रुबाई की तरह ही होता है।
--[3] एक स्थिति यह भी होती है कि ग़ज़ल कहते हुए कोई भाव एक शे’र में न आ सका तो मजबूर् उसे चार या उससे अधिक मिसरों में बाँधा जा सकता है
और भाव को पूर प्रगट करने वाले ऐसे अश’आर क़ता लिख कर ग़ज़ल के साथ ही लिखते पढ़ते है, जिनका अपना अलग मगर कटा हुआ स्वयं में एक अस्तित्व होता है।
ज़ाहिर है कि ऐसे कता’त [ क़ता का बहुवचन] कही जा रही ग़ज़ल के बह्र और वज़न के अनुरूप ही होंगे।
---क़ताअ’ 4- लाइनों का ही यह ज़रूरी नहीं है। कुछ क़ताअ’ 10-12 लाइनों का या उससे भी जियादा का भी हो सकता है।
अब कुछ उदाहरणों के साथ इन को देखते हैं--
[1] क़ता जिसमें पहली दूसरी और चौथी लाइन हम क़ाफ़िया होती है--
वक़्फ़-ए-हिर्मान-ओ-आस रहता है
दिल है अकसर उदास रहता है
तुम जो ग़म दे के भूल जाते हो
मुझको एहसां का पास रहता है ।
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-
इसमे पहली दूसरी और चौथी लाइन का --आस--उदास--पास-- हमक़ाफ़िया और बह्र 2122--1212--22 का [ यह रुबाई की बह्र नहीं है]
इक मौज़ मचल जाए तो तूफ़ाँ बन जाए
इक फूल अगर चाहे गुलिस्तां बन जाए
इक ख़ून के क़तरे में है तासीर इतनी
इक क़ौम की तारीख़ का उन्वां बन जाए ।
अब्दुल हमीद ’अदम’-
इसमे पहली दूसरी और चौथी लाइन का --तूफ़ां--गुलिस्तां--उन्वां --हम क़फ़िया और बह्र रुबाई की बह्र नहीं है।
[2] क़ता जिसमें दूसरी और चौथी लाइन हम क़ाफ़िया होती है--
ज़िंदगी की तवील राहों में
मुतकलन पेचो-ख़म नहीं होंगे
एक ऐसा भी वक़्त आएगा
जब ए दैर-0 हरम नहीं होंगे।
- नरेश कुमार शाद-
इसमे पहली और चौथी लाइन का -- ख़म -हरम हम क़ाफ़िया है और इस रचना की बह्र --रुबाई की बह्र नहीं है।
[3} ग़ज़ल के रंग से असंबद्ध भाव --जिसमे क़ता लिखा गया---
ग़ालिब की एक ग़ज़ल है-
दिले-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
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क़ता’अ
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौज़ूद
फिर ये हंगामा, ऎ ख़ुदा ! क्या है ।
ये परी लोग चेहरा कैसे हैं
ग़म्ज़ा-0-इश्वा-0-अदा क्या है
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुर्मा सा क्या है
[ 2-3 शे’र और ---]
मतलब क़ताअ’ सिर्फ़ 4- लाइनों का ही नहीं --चार से भी जियादा लाइनों का भी हो सकता है
। चूँकि यह ग़ज़ल के बीच में कताअ" है अत: लाजिमन इसकी बह्र वही है जो ग़ज़ल की है यानी
2122---1212---22
[ब] कोई ज़रूरी नहीं कि कताअ’ ग़ज़ल के बीच में ही हो। स्वतन्त्र रूप से भी कताअ’ कहे जाते है या
कहे जा सकते है।
ग़ालिब का ही एक INDEPENDENT कताअ’ देखते हैं--6- लाइन की क़ता है---
लख़नऊ आने का बाइस नहीं खुलता यानी
हवस-ए-सैरो-तमाशा सो वो कम है हमको
मक़त-ए-सिलसिला-ए-शौक़ नहीं है ये शहर
अज़्म-ए-सैरे नज़फ़ तौफ़-हरम है हमको
लिए जाती है कहीं एक तवक़्को ”ग़ालिब’
ज़ादा-ए-रह कशिश-ए-क़ाफ़े-करम है हमको।
ग़ालिब-
[यहाँ भी -कम-हरम-करम - सब हम क़ाफ़िया है।
-रुबाई और क़ताअ’ के हैय्यत [बुनावट] में इतनी समानता है कि अगर 4-लाइन की रुबाई और 4-लाइन की क़ता एक साथ सामने हो तो कभी कभी भ्रम पैदा हो जाता है। मगर जो जानकार है वो फ़र्क समझ लेते हैं
अच्छ यह सब तो ठीक है।
तो फिर मुक्तक क्या है ?
मुक्तक की चर्चा अगले क़िस्त में करेंगे_
सिलसिला जारी है-----
-आनन्द पाठक ’आनन’--
8800927181
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