Tuesday, October 27, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत क़िस्त 146: रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [ भाग -01]

 

उर्दू बह्र पर एक बातचीत क़िस्त 146: रुबाई-बनाम-क़ता-बनाम मुक्तक [ भाग -01]

पिछली क़िस्त 009 में त्रिपदी बनाम मुसल्लस [3-पंक्तियों वाली रचना/काव्य] पर चर्चा किया था।

आज 4-पंक्तियों वाली रचना पर चर्चा करेंगे जैसे रुबाई-क़ता--मुक्तक- आदि।

 फ़ारसी में रुबाई कहने का रिवाज़ बहुत पुराना है। उमर ख़ैयाम और हाफ़िज़ की रुबाईयात 

फ़ारसी काव्य की अमूल्य निधि है जिसका विश्व के हिंदी सहित कई भाषाओं में [रुबाई का बहुवचन] 

अनुवाद हो चुका है। 

रुबाई  फ़ारसी साहित्य से होते हुए उर्दू साहित्य में आई और बहुत से पुराने शायरों ने ग़ज़ल नज़्म के साथ साथ रुबाईयाँ भी कहीं  और लिखीं । मुशायरों/महफ़िलों को गर्म करने के लिए ग़ज़ल पढ़ने से पहले शायर लोग2-4 रुबाईयाँ ज़रूर पढ़ते थे। मगर आजकल रुबाईयाँ बहुत कम लिखी या पढ़ी जा रही है -लगभग न बराबर।आजकल महफ़िल /मुशायरॊ को गर्म करने के लिए 4-लाईन की क़ता या 4-लाइन का मुक्तक या फिर 1-मतला1-शे’र का रिवाज़ चल पड़ा है। 

सवाल यह कि कि तो क्या रुबाई, क़ता, मुक्तक, 1-मतला 1-शेर या चार लाइना क्या सब एक ही चीज़ हैं? प्रथम दॄष्टया तो ऐसा ही लगता है , मगर ऐसा है नहीं। इसमे बारीक़ फ़र्क भी है । आज इन्ही सब पर चर्चा करेंगे।

रुबाई : रुबाई अरबी शब्द -अर्बा’ से बना है जिसका शब्दकोशीय अर्थ चार या चार की संख्या होती है ।अत: रुबाई4-लाइनों कॊ एक काव्य रचना होती है। एक बात और इसी अर्बा’ शब्द से :मुरब्ब:" भी बना है यानी शे’र का वह स्वरूप जिसके दोनों मिसरों में कुला मिला कर 4-अर्कान होते हैं [ यानी एक मिसरा में 2-अर्कान --ऐसे शे’र को मुरब्ब: कहते हैं।

रुबाई की एक ख़ास बह्र होती है जो बहर-ए-हज़ज से निकलती है या बनती है। और इसके 24-वैकल्पिक औज़ान होते है। रुबाई के चारों मिसरा एक ही वज़न में हो सकते या फिर हर मिसरा इन्ही 24-औज़ान के  किसी एक वज़न पर हो सकता ।

रुबाई के मिसरों को एक मतला एक शे’र नहीं बल्कि ’मिसरीन’[ मिसरा का बहुवचन] कहते है।

इसके बारे में विशेष  मेरे ब्लाग उर्दू बह्र पर एक बातचीत 

www.arooz.co.in 

क़िस्त 60 पर या यहाँ पढ़ सकते हैं--

https://www.arooz.co.in/2020/06/60_2.html

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 रुबाई का पहला ,दूसरा और चौथा मिसरा हमक़ाफ़िया होता है। तीसरा मिसरा भी हम क़ाफ़िया हो सकता है पर न ही हो तो बेहतर

कुछ मशहूर शायरों के 1-2 रुबाई यहां उदाहरण के तौर पर लगा रहा हूं--


बुतखाने से दिल अपने उठाए न गए

का’बे की तरफ़ मिजाज़ लाए न गए

तौर-ए-मसजिद्न्को बिरहमन क्या जाने

याँ मुद्दत-ए-उम्र में हम आए न गए ।

--मीर तक़ी ’मीर’-


करते नहीं कुछ तो काम करना क्या आए

जीते जी जान से गुजरना क्या आए 

रो रो के मौत माँगने वालों को

जीना नहीं आ सका तो मरना क्या आए।

-फ़िराक़ गोरखपुरी-


ये रुबाईयां एक ख़ास औज़ान [रुबाई की बह्र ] में होती है जो बहर-ए-हज़ज से निकलती या बनती है।

ध्यान से देखे तो पहलॊ, दूसरी  और चौथी लाइन -हम क़ाफ़िया है।

रुबाई [या क़ता यहाँ तक की मुक्तक भी ] कहने के लिये सिर्फ़ यही शर्त काफी नहीं बल्कि और भी कुछ है

जो ज़रूरी होता है। अख़्तर अंसारी साहब फ़रमाते हैं--

पहले मिसरे मे जो बात कही गई उसे अगला मिसरा आगे बढ़ाए और चौथे मिसरे तक जाते जाते विषय 

की गहराई और प्रभाव ऊँचा से ऊँचा होता जाए। ख़याल बुलंद से बुलंदतर होता जाए  -भाव की दॄष्टि से और काव्य 

सौष्ठव की दॄष्टि से भी । यह नहीं कि शायर आखिरी मिसरा कह कर ऊपर तीन मिसरा चिपका दे। 

अगर ऊपर के दो मिसरे को हटा दे और उसके बाद भी अगर रुबाई [या क़ता ] का मफ़हूम या प्रभाव नष्ट या बेअसर नही होता है तो इसका मतलब या हुआ कि रुबाई या क़ता बेकार व्यर्थ औए कलाहीन है।यह एक स्वयं में इकाई की हैसियत रखता है। रुबाई या तो सब कुछ है या कुछ भी नहीं।

ख़ैर

पुराने ज़माने में कई शायरों ने रुबाईयाँ कहीं है जिसमे मीर , अकबर इलाहाबादी, अनीस लखनवी, शाद अजीमाबादी, फ़ानी बदायूनी,  जोश मलीहाबादी, आसी ग़ाज़ीपुरी फ़िराक़ गोरखपुरी आदि उल्लेखनीय है।

आजकल रुबाई कहने के प्रचलन कम हो गया है उसकी जगह एक मतला एक शे’र या चार लाइना या मुक्तक सुनाने का प्रचलन बढ़ रहा है।दौर-ए-हाज़िर में अभी भी  कुछ लोग हैं जो इस विधा को जीवित या पुन: प्रचलन में लाने का काम कर रहे है-जिसमे हमारे एक मित्र राम अवध विश्वकर्मा जी [ग्वालियर] इस दिशा में विशेष रूप से सक्रिय हैं और हाल ही में उनका एक रुबाई संग्रह--जदीद रुबाईयात-

प्रकाशित हुआ है।

तो फिर क़ता क्या है ??

इस पर अगले अंक में चर्चा करेंगे--

[ सिलसिला जारी है----]


-आनन्द कुमार पाठक ’आनन’-

8800927181

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